लिंग और हिंसा की धारणाओं में परिवर्तन से पुरुषों की मानसिकता को बदलना
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2000 में, कोरो की हमारी टीम ने मुंबई के निम्न आय वर्ग वाले समुदायों के युवा पुरुषों के बीच मर्दानगी के भाव की संरचना के विकास को समझने के उद्देश्य से एक कार्य-आधारित शोध परियोजना तैयार की। हमने इसे समझने के लिए एक मौलिक सर्वेक्षण किया और चार साल के इस एंडलाइन सर्वेक्षण में हमें कुछ दिलचस्प निष्कर्ष देखने को मिले।

उन निष्कर्षों पर बात करने से पहले यह समझना महत्वपूर्ण है कि समुदाय के सदस्यों ने यारी दोस्ती कार्यक्रम में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा पर कैसे विचार दिए। हमारी टीम ने कुल 850 युवा पुरुषों (16 से 34 वर्ष की आयु वर्ग वाले) के साथ मिलकर काम किया था। इनमें से ज़्यादातर पुरुषों का यह मानना था कि औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा अपनी मर्दानगी दिखाने का एक तरीक़ा है। इसका मतलब यह है कि अपने साथी के साथ मार-पीट करने से उस पर अपना नियंत्रण बना रहता है, सड़कों पर महिलाओं के साथ छेड़खानी करना ‘मर्दाना’ होने की निशानी होती है और सहमति का असम्मान करना यौन रूप से ‘हावी’ होने का एक तरीका होता है।

ये वे पुरुष थे जिन्हें कभी भी उनके शरीर से जुड़ी शिक्षा नहीं दी गई थी। वे कभी भी ऐसी जगहों पर नहीं थे जहां मर्दानगी के उनके विचार पर किसी तरह का सवाल किया गया हो या फिर जहां वे अपनी असुरक्षाओं के बारे में खुल कर बात कर सकें। उदाहरण के लिए हमारे बेसलाइन सर्वे में भाग लेने वाले अधिकतर प्रतिभागियों का कहना था कि “यहां कोई हिंसा नहीं है/मैं हिंसक नहीं हूं”। उनकी इस मानसिकता को बदलने के लिए हमें उन पुरुषों का भरोसा जीतना पड़ा ताकि वे खुलकर अपने विचार और अपनी सोच हमें बता सकें। इन जगहों पर वे बातचीत कर सकते थे, अपने व्यवहार पर सवाल कर सकते थे और उस व्यवस्था को समझ सकते थे जिनसे उन्हें इन कामों के लिए साहस मिलता था। इन पुरुषों को मर्दानगी, संवेदनशीलता और देखभाल की वैकल्पिक समझ के बारे में बताया गया। बात जब लिंग-आधारित असमानता और हिंसा की आती है तब उनके व्यवहार परिवर्तन की प्रकृति कुछ इस प्रकार थी:

  1. अस्वीकृति: “यहां किसी प्रकार की हिंसा नहीं है।”
  2. कारण/औचित्य: “हो सकता है कि मैं हिंसक हो गया था, लेकिन इसमें मेरी गलती नहीं थी”
  3. हिंसा के साक्ष्य/घटनाओं पर विचार जो उन्होंने देखे हैं या जिनका हिस्सा रहे हैं
  4. आंशिक स्वीकृति: “शिक्षा में असमानता हो सकती है लेकिन यौन अभिव्यक्ति में नहीं”
  5. इस बात से इनकार करना कि लिंग-आधारित असमानता जीवन के सभी पहलुओं में मौजूद है
  6. पिछले बातों का दोहराव
  7. लिंग के प्रति उनके दृष्टिकोण का पुनर्निर्माण

इस कार्यक्रम में शामिल युवकों ने अपने समुदाय के अन्य लोगों से बातचीत करनी शुरू कर दी (जिनमें स्थानीय नेता और परिवार के सदस्य जैसे लोग भी शामिल थे) और उसी रास्ते पर उनका नेतृत्व करने लगे। ऐसा करने से हिंसा की परिभाषा को लेकर उनकी समझ व्यापक हुई और साथ ही वे हिंसा से जुड़ी किसी घटना पर प्रतिक्रिया करने के लिए संसाधनों के उपयोग के बारे में जानने लगे। अगर हम उनके समुदायों के भीतर ही इन लड़कों के लिए एक समर्थन प्रणाली के लिए अभियान नहीं चलाते तो हमें ऐसे परिणाम नहीं मिलते। लिंग के मानदंडों पर सवाल उठाने से मिलने वाली प्रतिक्रिया के कारण समुदाय के सदस्यों के साथ काम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हमारे अभियान ‘सोच सही मर्द वही’ का लक्ष्य यही था।

इस पूरी प्रक्रिया में हमने कुछ नया सीखा। विश्वास-निर्माण के इस आर्क और लिंग तथा हिंसा को लेकर लोगों की समझ का विस्तार किए बिना हम लोगों से एक बेसलाइन सर्वे में अपने आत्मीय रिश्तों को लेकर स्पष्ट होने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। और समुदाय में व्याप्त हिंसा का संबंध शक्ति के इस डायनमिक्स को समझने और उसकी पहचान से गहरा जुड़ा हुआ है। एंडलाइन सर्वे के समाप्त होते-होते हमें हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली। यहां हमने रिपोर्ट किए गए मामलों में वृद्धि को सकारात्मक परिणाम के रूप में देखा। क्योंकि इसका सीधा मतलब यह था कि लोग न केवल हिंसा को बेहतर ढंग से समझ रहे थे बल्कि इससे निपटने के लिए उनके पास अब पर्याप्त ज्ञान भी था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि समुदाय के युवा किशोरों और लड़कों ने यह समझ लिया था कि इस मामले में जहां वे समस्या को पैदा करने वाले हो सकते हैं वहीं वे इसे सुलझाने वाले भी हो सकते हैं।

महेंद्र रोकड़े कोरो के कार्यक्रमों के निदेशक हैं। नितिन कांबले कोरो में प्रोग्राम मैनेजर हैं।

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अधिक जानें: सामुदायिक प्रतिक्रिया का मुकाबला करते हुए लिंग प्रोग्रामिंग को लागू करने के कड़े कदम के बारे में यह लेख पढ़ें।


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