कच्छ के एक बाटिक शिल्पकार की दुविधा

Location Iconकच्छ जिला, गुजरात
शकील खत्री, एक बाटिक शिलकर कपड़े पर प्रिंट करने के लिए हैंड ब्लॉक का उपयोग करते हैं-बाटिक कच्छ

मैं गुजरात के कच्छ ज़िले के खत्री नामक शिल्पकार समुदाय से संबंध रखता हूँ। मेरे परिवार के लोग पिछले छह पीढ़ियों से बाटिक का काम करते हैं। बाटिक एक पारम्परिक ब्लॉक-प्रिंटिंग शिल्प है जिसमें मोम की मदद से रंगाई का काम किया जाता है।

कुछ दशक पहले तक इस इलाक़े में बाटिक का काम करने वाले ढ़ेर सारे शिल्पकार थे। लेकिन समय के साथ उनमें से ज़्यादातर शिल्पकारों ने अपने कारख़ाने बंद कर दिए और अब इस काम को करने वाले केवल थोड़े ही शिल्पकार रह गए हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। खत्री समुदाय बहुत अधिक प्रतिस्पर्धी होता है—नतीजतन कई शिल्पकारों को अपने उत्पादों की क़ीमत कम करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। एक समय के बाद गुणवत्ता से समझौता किए बिना क़ीमत को कम करना सम्भव नहीं होता है। और इसलिए ही वे निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने लग गए। जब ऐसा होने लगा तो धीरे-धीरे उनके ग्राहक आने बंद हो गए और अंत में उन्हें अपनी दुकान बंद करनी पड़ गई। इस प्रतिस्पर्धा के कारण कई कारख़ाने ठप्प पड़ गए।

इस स्थिति के पीछे का एक कारण और भी है। 2001 में कच्छ में आए भूकम्प के बाद मुंद्रा पोर्ट का निर्माण किया गया। सरकार ने भी 10 वर्ष तक आयकर की छूट की घोषणा कर दी, नतीजतन कई कम्पनियों ने इस इलाक़े में अपनी फैक्टरियां स्थापित कर लीं। इससे रोज़गार के नए अवसरों का निर्माण हुआ। युवा पीढ़ियों की पहली पसंद इन फैक्टरियों में मिलने वाला रोज़गार बन गया, क्योंकि उन्हें कम शारीरिक मेहनत में ही अच्छी तनख़्वाह भी मिलती है। शिल्पकारी से जुड़े काम में बहुत अधिक मेहनत होती है और इसके कारण युवा पीढ़ी शिल्प को अपना करियर बनाने से कतराते हैं।

इन सबके अलावा, बाटिक उत्पादन एक खर्चीली प्रकिया है। इसलिए इस काम को शुरू करने वाले किसी भी व्यक्ति को कड़ी मेहनत और बहुत अधिक धन निवेश के लिए तैयार होना पड़ता है। उदाहरण के लिए रंगों वाले केमिकल की क़ीमत में 25 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो गई है और कपड़े की क़ीमत हर साल प्रति मीटर 10 रुपए बढ़ जाती है। बाटिक के काम में बहुत अधिक मात्रा में मोम का इस्तेमाल किया जाता है जो एक पेट्रोलियम उत्पाद है। इसलिए जब भी पेट्रोलियम की क़ीमत बढ़ती है मोम भी महंगा हो जाता है। एक साल पहले मोम की क़ीमत 102 रुपए प्रति किलो था। आज इसका मूल्य 135 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है और इस पर ऊपर से 18 प्रतिशत जीएसटी भी लगता है। यह सब मिलकर हमारे लिए बहुत महंगा हो जाता है।

पहले जब शिल्पकारों की संख्या बहुत अधिक थी तब हमारा एक यूनियन था। उसकी मदद से हमें मोम ख़रीद पर सरकार से सब्सिडी मिलती थी। जैसे ही हमारी संख्या कम हुई हमारा यूनियन भंग हो गया और अब हमें सब्सिडी की सुविधा नहीं मिल सकती है।शिल्पकारों का एक बड़ा समूह ही सब्सिडी की मांग कर सकता है। हालांकि अब हम में से बहुत कम लोग बच गए हैं और परिस्थितियां ऐसी हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए बाटिक जैसे प्रतिस्पर्धी और बहुत अधिक मेहनत वाले व्यापार में शामिल होने के लिए शून्य के बराबर प्रोत्साहन बचा है। यह कुछ-कुछ कैच-22 जैसी स्थिति है।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

शकील खत्री रैंबो टेक्सटाइल्स और नील बाटिक के मैनेजिंग पार्ट्नर हैं। नील बाटिक 200 मिलियन आर्टिज़न्स के साथ काम करता है जो आईडीआर की #ज़मीनीकहानियां के लिए कंटेंट पार्ट्नर है।

अधिक जानें: पढ़ें कि भारत को अपने शिल्पकारों के समुदायों को सशक्त करने की ज़रूरत क्यों हैं।

अधिक करें: शकील खत्री के काम के बारे में विस्तार से जानने के लिए उनसे @shakil_ahmed_2292 पर सम्पर्क करें।


और देखें


दिल्ली की फेरीवालियों को समय की क़िल्लत क्यों है?
Location Icon पश्चिम दिल्ली जिला, दिल्ली

जलवायु परिवर्तन के चलते ख़त्म होती भीलों की कथा परंपरा
Location Icon नंदुरबार जिला, महाराष्ट्र

क्या अंग्रेजी भाषा ही योग्यता और अनुभवों को आंकने का पैमाना है?
Location Icon अमरावती जिला, महाराष्ट्र

राजस्थान की ग्रामीण लड़की यूट्यूब का क्या करेगी?
Location Icon अजमेर जिला, राजस्थान,जयपुर जिला, राजस्थान