कच्छ के मवेशी लंपी वायरस से जूझ रहे हैं 

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खेत में मवेशी_मवेशी लंपी वायरस
मालधारी समुदाय के लोग अपनी संस्कृति के हिस्से के रूप में पीढ़ियों से कंकरेज मवेशियों को पाल रहे हैं। | चित्र साभार: आस्था चौधरी एवं दीप्ति अरोड़ा

बन्नी घास का मैदान, अपने समृद्ध वन्यजीव और जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। इस इलाक़े में मुख्य रूप से मालधारी समुदाय (पशुपालक) समुदाय के लोग रहते हैं जो बन्नी भैंस और कंकरेज मवेशियों सहित विभिन्न क़िस्म के मवेशियों को पालते हैं। मालधारी समुदाय के लोग अपनी संस्कृति और परंपरा के अनुसार पीढ़ियों से कंकरेज मवेशियों को पाल रहे हैं। ये अपने मवेशियों के चारा-पानी के लिए मौसमी प्रवास पर अपने घरों से दूर निकल जाते हैं।

हालांकि 1980 के दशक से क्षेत्र में दूध की डेयरी के आने के बाद इस इलाक़े में बहुत अधिक परिवर्तन आया है। अधिकांश पशुपालक और चरवाहे या तो बन्नी से बाहर जाकर बस गए हैं या फिर उन्होंने अपने पुराने मवेशियों को हटाकर उनकी जगह भैंसे पाल ली हैं। भैंस का दूध बेचने से मुनाफा अधिक होता है लेकिन इसके पीछे यही एक कारण नहीं है। दशकों से गैंडो बावर (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) नाम के खरपतवार के सेवन से गायों की आंत में होने वाली बीमारी से उनकी मौत हो जाती है। यह मामला तब और बदतर हो गया जब 2022 में बन्नी घास के मैदानों में होने वाली पहली बारिश से मवेशियों को गांठदार त्वचा रोग (लंपी स्किन डिजिज) होने लगा। इस बीमारी ने इलाक़े के पशुओं को बुरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया। कच्छ जिले के मिसरियादो गांव में इस दौरान लगभग 100 गायें मर गईं। 

मिसरियादो के निवासी मजना काका कहते हैं, ‘गायों को रखना बहुत मुश्किल हो गया है, क्योंकि मैंने अपने पूरे जीवनकाल में उन्हें इस तरह की बीमारी से पीड़ित नहीं देखा है।’ महज पांच से सात दिनों के अंतराल में उनकी 15-16 गायों की मौत हो गई। वे आगे जोड़ते हैं ‘इन गायों को पालना बहुत कठिन काम है – हम उनके लिए दूर-दूर तक यात्रा करते हैं, परिवार की तरह उनका पालन-पोषण करते हैं और दुर्भाग्य से फिर भी उन्हें बचा नहीं पाते हैं।’

पशु चिकित्सकों ने गायों को टीका लगाया, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। केवल 10 दिनों में अपनी 40 गायें खोने वाले पड़ोसी गांव नेरी के निवासी मियाल हेलपोत्रा बताते हैं कि ‘मैंने उन देसी उपचारों का सहारा लिया जिनका हम लम्बे समय से अभ्यास करते आ रहे हैं; लेकिन हम फिर भी उन्हें बचा पाने में असमर्थ हैं।’

वे अपनी गायों को चराने के लिए प्रवास की तैयारी कर रहे हैं लेकिन उन्हें लगता है कि वे बहुत कमजोर हो गई हैं। ‘गायें अब भी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हुई हैं और कुछ के तो घाव अब तक नहीं भरे हैं। उनके साथ लम्बी दूरी की यात्रा पर निकलना कठिन है क्योंकि उन्हें चलने में भी दिक़्क़त होती है।’

पशुपालकों का मानना है कि उनके मवेशियों को होने वाली इस बीमारी का कारण हवा और मौसम में आने वाला बदलाव है। पिछले कई सालों में उनके घास के मैदान के क्षेत्रफल, घास की गुणवत्ता और पानी में कमी आई है लेकिन राज्य सरकार से किसी भी प्रकार का समर्थन नहीं मिला है। उन लोगों ने जिले के कलेक्टर ऑफ़िस में मदद और मुआवजे के लिए आवेदन भी दिया है लेकिन अब तक कोई राहत नहीं मिली है। 

मालधारी बहुत ही प्रतिकूल परिस्थिति में रहते हैं। उनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं और बच्चों के लिए स्कूल का अभाव है। वे अब भी अपने मवेशियों की देखभाल कर रहे हैं क्यों यह उनकी परंपरा का हिस्सा है। लेकिन किसी भी तरह के समर्थन या प्रोत्साहन के बिना वे अपनी इस परम्परा को कब तक बचा कर रख सकते हैं?

आस्था चौधरी और दीप्ति अरोड़ा उत्तर प्रदेश में मानव-वन्यजीव संबंधों का अध्ययन करने वाली शोधार्थी हैं। वे दोनों कोएग्जिसटेंस कंसोर्टियम से जुड़ी हुई हैं।

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