September 19, 2023

जलवायु परिवर्तन से जुड़े साझा प्रयासों में जी20 की भूमिका

जी20 में, सदस्य देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर, ग्लोबल साउथ में जलवायु अनुकूलन के लिए प्रयासों को महत्वपूर्ण रूप से आगे बढ़ाने की क्षमता है।
10 मिनट लंबा लेख

साल 2022 में, एशियाई क्षेत्र ने जलवायु परिवर्तन और बाढ़ से संबंधित कुल 81 आपदाओं का सामना किया। इस क्षेत्र में, इन आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में भारत तीसरे स्थान पर है जिसे बाढ़ के कारण 4.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 34 हज़ार करोड़ रुपए) से अधिक का नुक़सान झेलना पड़ा है। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी और लू के कारण भारत के 90 फ़ीसद लोगों को स्वास्थ्य समस्याओं और भोजन की कमी जैसी विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है। तापमान के असंगत रूप से बढ़ने का प्रभाव कृषि और निर्माण जैसे सेक्टरों पर भी पड़ा है और उन्हें 159 बिलियन अमेरिकी डॉलर (13 लाख करोड़ रुपए) का नुकसान हुआ है। इसके बावजूद, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुकूलन फंडिंग (अडाप्टेशन फंडिंग) कम ही मिल पा रही है। अनुकूलन फंडिंग, वह आर्थिक सहायता होती है जो जलवायु परिवर्तन के अपेक्षित प्रभावों जैसे अनियमित वर्षा, सूखा और औसत तापमान में परिवर्तन से होने वाले असर को कम करने से जुड़े प्रयासों के लिए दी जाती है।

ग्लोबल साउथ (दक्षिणी गोलार्ध में पड़ने वाले देश जिसमें भारत, चीन, ब्राज़ील, मैक्सिको वग़ैरह शामिल हैं) का अधिकांश हिस्सा खुद को कुछ ऐसी ही स्थिति में पाता है। जलवायु जोखिम सूचकांक के अनुसार एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देश जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसके बावजूद अनुकूलन प्रयासों के लिए दी जाने वाली फंडिंग पर, ख़ासतौर से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर, पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यहां तक कि विकासशील देशों को साल 2020 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का फंड उपलब्ध कराने की मंशा से स्थापित की गई संस्था ग्रीन क्लाइमेट फंड को भी साल 2019 तक कुल निर्धारित राशि का मात्र 10 फीसदी ही प्राप्त हो सका था।

इस संदर्भ में, जुलाई 2023 में जारी हार्नेसिंग फिलैंथ्रोपी फॉर क्लाइमेट एक्शन पॉलिसी ब्रीफ, ग्लोबल साउथ में अनुकूलन फंडिंग में समाजसेवियों (फिलैंथ्रोपिस्ट) की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है। यह इंगित करता है कि कैसे जी20 फोरम – जिसमें 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं – इन चुनौतियों को सामूहिक रूप से संबोधित करने के लिए सदस्य देशों के बीच सहयोग का एक अनूठा अवसर प्रदान कर सकता है। यह मंच ऐसी चर्चाओं, प्रतिबद्धताओं और सहयोगी कार्रवाइयों को सुविधाजनक बना सकता है जो विकासशील देशों की अनुकूलन आवश्यकताओं को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सकते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन की स्थिति में सार्थक प्रगति के लिए एक मंच तैयार होता है। यहां पॉलिसी ब्रीफ की परिकल्पना के बारे में बताया गया है:

1. उत्तरदक्षिण परोपकारी साझेदारी

चूंकि अनुकूलन उपाय आमतौर पर स्थानीय स्तर पर केंद्रित होते हैं, इसलिए विकासशील देशों में जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में निवेश के लिए उपयुक्त विकल्पों का अभाव दिखाई पड़ता है। अनुकूलन प्रयासों की अतिस्थानीय प्रवृति के कारण अंतर्राष्ट्रीय दाता भी अक्सर राज्य के प्रतिनिधियों और नीतियों को लागू करने वाले हितधारकों से अपरिचित होते हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए, जी20 के सदस्य एक निकटवर्ती ‘फिलैंथ्रोपी 20’ का निर्माण कर सकते हैं, जिसके जरिए वे वैश्विक फायनेंसर्स को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोगों से जुड़ने में मदद कर सकते हैं। बातचीत से जलवायु कार्रवाई से जुड़ी सामान्य जरूरतों को समझा जा सकता है और फिर उसके अनुसार धन का सही उपयोग किया जा सकता है।

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2. संयुक्त शोध

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जुड़े आंकड़ों का उपलब्ध न होना ग्लोबल साउथ में एक बड़ी चिंता का विषय है। ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ में, जलवायु परिवर्तन पर शोध का अनुपात 3:1 है। आंकड़ों की यह कमी ग्लोबल साउथ में जलवायु प्रयासों के लिए योजना निर्माण को बाधित करता है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसका असर अधिक दिखाई देता है। इस असमानता का मुख्य कारण सूक्ष्म-स्तरीय शोध के लिए वित्त और तकनीक की कमी है। हालांकि समाजसेवी प्रयास, जी20 के सदस्यों के बीच ज्ञान के पारस्परिक आदान-प्रदान पर केंद्रित सहयोगी शोध परियोजनाओं से जुड़ी आर्थिक कमियों को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। इस शोध से प्रभावी जलवायु कार्रवाई के लिए सबसे बेहतर तरीक़े तैयार करने में मदद मिल सकती है। इस अध्ययन में नागरिक समाज संगठन और इससे जुड़े काम करने वाली सभी इकाइयों को भी शामिल किया जा सकता है ताकि स्थानीय लोगों और उनके अनुभवों पर भी गौर किया जा सके।

3. मुख्यधारा की स्थानीय शब्दावली

स्थानीय भाषा और शब्दावली के आधार पर, जलवायु संवाद तैयार करना महत्वपूर्ण है। इससे समाजसेवियों को जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रयासों के लिए स्थानीय संदर्भों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। साथ ही, समुदायों के लिए अपने जीवन में दिख रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को पहचानना और समझना आसान हो सकता है। स्थानीय मीडिया, भारत सरीखे देशों जहां कई भाषाओं और विभिन्न संस्कृतियों वाली विविधता होती है, में स्थानीय जलवायु शब्दकोश को मुख्यधारा में लाने की ज़िम्मेदारी निभा सकता है। इसके बाद जी20 देश जलवायु परिवर्तन पर मानक वर्गीकरण तैयार करने के लिए अपनाए गये सबसे कारगर तरीक़ों (बेस्ट प्रैक्टिस) को एक-दूसरे के साथ साझा कर सकते हैं।

4. व्यापक व्यवहार परिवर्तन अभियान

संसाधनों के सजग उपयोग वाली जीवनशैली को बढ़ावा देने के क्रम में – जैसा कि भारत ने सीओपी27 के दौरान इसके लाइफ इनिशियेटिव के माध्यम से पेश किया था – जी20, व्यापक व्यवहार परिवर्तन अभियान चलाने से जुड़े प्रयासों को आगे बढ़ा सकता है। यह जीवनशैली में बदलाव जैसे कि उपयोग में ना होने पर इलेक्ट्रॉनिक्स को बंद करना, पानी का सोच-समझकर उपयोग करना और प्लास्टिक के उपयोग को प्रतिबंधित करने जैसी बातों को मुख्यधारा में शामिल कर सकता है। इन प्रस्तावों में, जो लाइफ इनिशियेटिव का हिस्सा हैं, 2030 तक वैश्विक स्तर पर 440 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बचत की क्षमता है। जी20 देशों के परोपकारी साझा उद्देश्यों को अपनाने और सामाजिक नेटवर्क की ताकत का लाभ उठाकर सस्टेनिबिलिटी के आसपास संवाद शुरू करने में मदद कर सकते हैं।

नाव खेते हुए कुछ लोग_जी20 में भारत
स्थानीय भाषाओं और शब्दावलियों के आधार पर जलवायु कथन को विकसित करना बहुत महत्वपूर्ण है | चित्र साभार: राजेश पमनानी / सीसी बीवाय

जी20 के लिए सुझाव

यहां जी20 के लिए परोपकारी वित्तपोषण को निर्देशित करने के लिए कुछ प्रमुख फोकस क्षेत्रों पर बात की गई है: 

1. क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर (सीएसए)

सीएसए कृषि में स्थायी प्रथाओं को शामिल करता है और इसका लक्ष्य इसे जलवायु के प्रति अधिक लोचदार बनाता है। उदाहरण के लिए, यह फसल की उन क़िस्मों के उपयोग की बात करता है जिनमें अत्यधिक तापमान और अनियमित वर्षा पैटर्न के लिए अधिक प्रतिरोधक क्षमता हों। यदि इसे अपनाया जाता है तो यह कृषि प्रणालियों की दक्षता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य के परिणामों के लिए तैयार करने में मदद करता है। सरकारों को जहां सीएसए को बढ़ावा देने और अपनाने के लिए संस्थागत बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। वहीं समाजसेवी, भूमिधारकों – ख़ासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों – को, ऋण के साथ-साथ तकनीकी सहायता तक पहुंचने में मदद करने के लिए बहुत आवश्यक सहायता प्रदान कर सकते हैं। विशेष रूप से, जी20 के लिए दिये जाने वाले सुझाव निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं:

अ) ग्लोबल साउथ में सीएसए को लागू करने और बढ़ाने के लिए परोपकारी पूंजी का संयोजन: जलवायु के अनुकूल स्वदेशी किस्मों के शोध और विकास पर ध्यान केंद्रित करना और ऐसी फसलों के लिए बाजार और आपूर्ति श्रृंखला के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना।

ब) छोटे और सीमांत किसानों की ताकत का लाभ उठाने के लिए समुदाय-आधारित संगठनों का समर्थन: सीएसआर फंडिंग के साथ, परोपकारी अनुदान किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को तकनीकी जानकारी, बाजार संपर्क स्थापित करने और व्यवसाय योजनाएं विकसित करने में मदद कर सकते हैं ताकि वे छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय के स्थायी स्रोत बन सकें।

2. मिश्रित वित्त के माध्यम से छोटे उद्यमियों के लिए ऋण

कम आय वाले क्षेत्रों और हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए, अनुकूलन के लिए पर्याप्त धन की उपलब्धता एक बड़ी बाधा है। लेकिन मिश्रित वित्त इसका एक समाधान पेश करता है। इसका उपयोग प्रभाव-संचालित परियोजनाओं, जैसे कि जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित परियोजनाओं का समर्थन करने के लिए विभिन्न वित्तीय उपकरणों के साथ प्रयोग करने के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, बिना क्रेडिट ट्रेल वाले सूक्ष्म-उद्यमियों को पूंजी मुहैया करवाने या ऋण देने की स्थिति में बैंकों और निजी निवेशकों के सामने आने वाली समस्याओं के जोखिम को एक हद तक कम करने के लिए परोपकारी फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, लचीले और वापस किए जाने योग्य अनुदानों और फर्स्ट लॉस डिफ़ॉल्ट गारंटीज जैसे परोपकारी फ़ंडिंग उपकरणों का उपयोग, ऐसे जलवायु-केंद्रित सूक्ष्म व्यवसायों का समर्थन करने के लिए किया जा सकता है। निजी फाउंडेशन, प्रभावशाली निवेश को प्रोत्साहित करने और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी करने के लिए उत्प्रेरक वित्तपोषण का भी उपयोग कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, फिलैंथ्रोपिक फंडिंग सार्वजनिक क्षेत्र में नवाचार से जुड़े जोखिम को कम करने में सहायता प्रदान कर सकती है। इससे निजी क्षेत्र द्वारा निवेश के साथ-साथ नए समाधानों के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

3. जलवायु के मुताबिक ढलने वाला बुनियादी ढांचा

जलवायु-परिवर्तन-प्रेरित आपदाओं में हो रही वृद्धि के साथ, जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों के पुनर्वास और जलवायु-रिजिलियेंस वाले बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है। इसे सामाजिक सुरक्षा उपायों और परोपकारी पूंजी (फिलैंथ्रोपिक कैपिटल) को सरकारी योजनाओं के साथ एकीकृत करके किया जा सकता है। भारत में, मनरेगा एक ऐसा ही सहयोगी मार्ग प्रदान करता है। यह योजना 2006 से भारत में ग्रामीण परिवारों को अकुशल शारीरिक श्रम के अवसर प्रदान कर रही है और सूखे जैसे संकट के समय में समुदायों के लिए राहत का एक प्रमुख स्रोत है। इसके कई पर्यावरणीय लाभ भी हैं क्योंकि योजना के तहत आने वाली कई गतिविधियां जल, भूमि और पेड़ों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की बहाली से संबंधित हैं। समुदायों द्वारा इन परिसंपत्तियों के संरक्षण से उन्हें लंबी अवधि में अपनी आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है। ऐसे जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर तैयार किए गए बुनियादी ढांचे में परोपकारी निवेश महत्वपूर्ण है और इसे सरकारों के साथ-साथ निजी क्षेत्र द्वारा अन्य इलाक़ों में भी अपनाया और दोहराया जा सकता है।

4. जोखिम के लिए तैयार डिजिटल टूलकिट

जलवायु-संबंधी किसी भी परिदृश्य के लिए बेहतर ढंग से तैयार होने के लिए जोखिमों का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम एक जलवायु टूलकिट तैयार करना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ देशों के लिए जो इससे असंगत रूप से प्रभावित होते हैं। सदस्य इस टूलकिट के लिए एक डिजिटल डेटाबेस के विकास में अपना सहयोग दे सकते हैं जो बारीक डेटा को पकड़ने और सूक्ष्म स्तर के परिवर्तनों और किसी विशेष क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की सटीक भविष्यवाणी करने में मदद करता है। परोपकारी लोग इस शोध के लिए परियोजनाओं को फंड कर सकते हैं ताकि डेटाबेस वास्तविक समय में सूचना के आदान-प्रदान को सक्षम करने के साथ ही किसानों को नवीनतम जानकारी प्रदान कर सके। ऐसा डिजिटल टूलकिट सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों को भी सामने ला सकता है ताकि दानकर्ता इन क्षेत्रों को भी धन आवंटित कर सकें।

5. सामाजिक नवाचार हैकथॉन

सामाजिक नवाचार हैकथॉन समाजसेवकों, नागरिक समाज संगठनों, नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों को एक साथ आने और अपने-अपने ज्ञान साझा करने के माध्यम से अपने प्रभाव को अधिक से अधिक बढ़ाने का अवसर पैदा करते हैं। ऐसे मंच समाजसेवी संस्थाओं के लिए स्थानीय नवाचारों को आगे बढ़ाने और उन वैश्विक दानकर्ताओं से जुड़ने के लिए बेहद फायदेमंद हो सकते हैं, जिन तक उनकी पहुंच संभव नहीं होती। सोशल इनोवेशन हैकथॉन सभी जी20 देशों में, नए तरीक़े से काम करने या खोज करने वाले लोगों को मेंटरशिप प्रदान कर सकता है और जी20 स्तर पर इन नवाचारों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

6. शहरी केन्द्रों में स्थिरता

चूंकि शहरों में गर्मी की स्थिति बदतर होती जा रही है, इसलिए उनकी अनुकूलन क्षमताओं को बढ़ाने की योजना बनाते समय स्थायी और टिकाऊ अभ्यासों को शामिल करना महत्वपूर्ण है। इसलिए, शहरी विकास योजना पहलों को प्रकृति-आधारित समाधानों जैसे कि ग्रीन एंड ब्ल्यू स्पेसेज आदि को प्राथमिकता देनी चाहिए। सरकारी-निजी इकाइयां और समाजसेवी एक साथ मिलकर शहरी केंद्रों, विशेष रूप से ऊर्जा समाधान की आवश्यकता वाले निम्न-आय वाले क्षेत्रों में ऐसे संसाधनों को विकसित कर सकते हैं।

यह लेख सुखरीत बाजवा और दीपा गोपालकृष्णन द्वारा लिखित हार्नेसिंग फ़िलैंथ्रोपी फॉर क्लाइमेट एक्शन पॉलिसी ब्रीफ पर आधारित है।

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अधिक जानें

  • मैकआर्थर फाउंडेशन के भारत के उप निदेशक का यह साक्षात्कार पढ़ें और जानें कि भारत में जलवायु परोपकार को एक इक्विटी लेंस क्यों अपनाना चाहिए।
  • इस लेख के माध्यम से जानें कि परोपकार को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने की आवश्यकता क्यों है। 
  • जानें कि जी20 ने पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कैसे काम किया है।

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