आजीविका

आरा-तारी की सुई से आजीविका बुनता कलंदर समुदाय

टोंक जिला, राजस्थान

आरा-तारी एक खास तरह की कढ़ाई का काम है। इसे हमारे कलंदर समुदाय के लोगों ने अपनी जीविका चलाने के लिए सीखा है। कलंदर समुदाय, घुमंतू या विमुक्त जनजातियों के अंतर्गत आता है। पहले हमारे परिवार के पुरुष भालू का तमाशा दिखाकर लोगों का मनोरंजन करते थे और उसी से आजीविका कमाते थे। मगर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 लागू होने के बाद यह काम बंद हो गया। इसके बाद टोंक की कलंदर बस्ती की महिलाओं और लड़कियों ने परिवार की मदद करने के लिए आरा-तारी का काम सीखना शुरू किया।

साल 2006 में मेरे ससुर, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उन्होंने वाइल्डलाइफ एसओएस की मदद से इस आरा-तारी केंद्र की स्थापना की। इस नए कौशल को सीखने के बाद हमें जीविका का एक नया साधन मिला क्योंकि हमारा पुराना काम छिन चुका था। घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। हम में से अधिकतर ने पांचवीं या आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है, फिर हम काम पर लग गए। ज्यादातर परिवारों में किसी न किसी को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी है ताकि छोटे भाई-बहन पढ़ाई जारी रख सकें। मैंने भी अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई पूरी करवाई और अन्य कई लोगों ने भी ऐसा ही किया।

अब हम सिर्फ पैसे नहीं कमा रहे, बल्कि अपने परिवार और समुदाय से सम्मान भी पा रहे हैं, क्योंकि हम परिवार की आर्थिक मदद कर रहे हैं। इस काम से हमें प्रति पीस 300 से 400 रुपये तक की कमाई हो जाती है। हमें यह काम बेहद पसंद है, खासकर जब हम इसे एक साथ करते हैं। केंद्र में आमतौर पर दस से बारह लोग साथ काम करते हैं। कोई सेठ कच्चा माल लाता है जिसे फैक्ट्री में तैयार किया जाता है और हमें इसके बदले मजदूरी मिलती है। हम डिजाइन चुनते हैं, उत्पाद बनाते हैं, और फिर उसे वापस कर देते हैं। वे कपड़ा इकट्ठा करते हैं और हमें भुगतान करते हैं, जिससे हमारे परिवारों की जिंदगी थोड़ी आसान हो जाती है।

अब यह काम हमारे समुदाय में फैल चुका है। अगर इसी तरह के केंद्र अन्य बड़े घुमंतू समुदायों में भी स्थापित किए जाएं तो और युवाओं को रोजगार मिलेगा और हमारे समुदाय में बड़ा बदलाव आएगा। युवा खाली नहीं बैठेंगे, इधर-उधर घूमने या झगड़े में अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे। वे काम करेंगे, पैसे कमाएंगे और सम्मान के साथ अपने परिवार की आर्थिक मदद करेंगे। पहले जब हम तंबुओं या झुग्गियों में रहते थे, जहां न घर थे न शिक्षा, तब से अब तक काफी बदलाव आया है। हमारे भालू छिन जाने के बाद हमारे पास कोई काम नहीं बचा था, और आज भी कई लोग बिना काम के संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन आरा-तारी केंद्र जैसे प्रयासों से हमारी स्थिति में सुधार आ रहा है, और हमें उम्मीद है कि यह बदलाव और भी तेजी से आएगा।

नूरजहां कलंदर आरा-तारी का काम करती हैं और अपना परिवार चलाने में मदद करती हैं।
नूर मुहम्मद कलंदर, अपने समुदाय के हक के लिए आवाज उठाते हैं और घुमंतू साझा मंच के नाम से एक संगठन चलाते हैं।

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अधिक करें: लेखक के काम के बारे में अधिक जानने और उनका सहयोग करने के लिए [email protected] पर संपर्क करें।

लेखक के बारे में

  • नूरजहां कलंदर, एक कुशल आरा-तारी कढ़ाई कारीगर हैं। वे बचपन से ही सिलाई और बुनाई जैसी कलाओं को सीखकर अपने परिवार का सहयोग करती आई हैं। वर्तमान में वे अपने ससुराल में आरा-तारी का काम करती हैं और समाज की अन्य युवा लड़कियों को यह कला सिखा रही हैं ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
  • नूर मुहम्मद कलंदर, घुमंतू साझा मंच संगठन, टोंक (राजस्थान) का नेतृत्व करते हैं। वे 1980 से 2006 तक भालू के खेल-तमाशे के जरिए जीवन यापन करते थे। 2006 के बाद से उन्होंने वाइल्डलाइफ एसओएस, एक्शन ऐड और एमकेएसएस जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर घुमंतू समुदायों के लिए शिक्षा, रोजगार, और दस्तावेजीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम किया है।