मध्य प्रदेश के हरदा जिले में एक छोटा सा कस्बा है—टिमरनी। इस कस्बे में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन एक बड़ी और बेहद सुरीली कहानी बुनी जा रही है। कुछ समय पहले यहां अपनी तरह की एक अनोखी संगीत लाइब्रेरी स्थापित की गयी है। इस लाइब्रेरी में न कोई फीस लगती है और न ही जाति, लिंग या वर्ग से जुड़ा कोई भेदभाव होता है। यहां दलित, आदिवासी समुदायों और ग्रामीण इलाकों से आने वाले बच्चे और युवा मिलकर संगीत सीखते हैं—जहां वे गिटार, हारमोनियम और ढोलक जैसे वाद्य भी बजाना सीखते हैं। इसके लिए कभी वे इन्हें लाइब्रेरी से इश्यू करवाकर ले जाते हैं, तो कभी यहीं लगने वाली कक्षाओं का हिस्सा बनते हैं।
लेकिन यह सिर्फ वाद्य यंत्रों की लाइब्रेरी नहीं है। यहां संगीत के जरिए समाज के बीच की दूरियां मिट रही हैं। लाइब्रेरी में आने वाले तमाम लोग सुर और ताल के जरिए आपस में संवाद करते हैं। वे सामाजिक पूर्वाग्रहों और हर तरह के भेदभाव को पाटने और अपनी कला के जरिए संविधान में निहित बंधुता, समता, न्याय और स्वतंत्रता के मूल्यों को जीवंत करते हैं। लाइब्रेरी के इस समुदाय का हिस्सा रहे सतीश बताते हैं कि पहले जिन लोगों को गांव में जातिगत भेदभाव के कारण सीखने का मौका नहीं मिलता था, वे अब साथ बैठकर सुर साधते हैं। यहां से मिले प्रोत्साहन के चलते ही, युवा कलाकार कामता अपने आदिवासी गीतों को नई पहचान दे पा रहे हैं और उन्हें रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। जो पहले सिर्फ उनका शौक था, अब वही उनकी पहचान बन रहा है।
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