बदलाव की रंगीन चूनर: बाड़मेर में विधवा महिलाओं का जीवन संवारती एक रस्म

समूह में बैठी कुछ महिलाएं_विधवा महिलाएं
विधवा महिलाओं को चटक रंग के कपड़े, मेहंदी, बिंदी या मेकअप के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होती है। | चित्र साभार: ईश्वर सिंह

राजस्थान के बाड़मेर जिले में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, आत्महत्या और जातिवाद अपेक्षाकृत अधिक है। मैं थार महिला संगठन नामक एक महिला समूह का हिस्सा हूं। यह घरेलू हिंसा, यौन शोषण, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, बाल विवाह और अशिक्षा जैसी समस्याओं का सामना करने वाली महिलाओं की मदद करता है। मेरा अनुभव है कि विधवा और अकेली महिलाओं के लिए स्थिति और भी खराब है क्योंकि उन्हें अधिक सामाजिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है।

बाड़मेर में हर जातिगत या धार्मिक समुदाय में यह परंपरा है कि विधवा महिलाओं को उनकी पहचान बताने वाले एक ख़ास तरह के कपड़े पहनने होते हैं। इन महिलाओं की चुनरी (चूंदड़ी) का रंग अक्सर गहरा और धूसर होता है। उन्हें चटक रंग के कपड़े, मेहंदी, बिंदी या मेकअप का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं होती है। विधवा महिलाएं शादी, जन्म-उत्सव या किसी और तरह के शुभ काम में हिस्सा नहीं ले सकती हैं, न ही वे मंदिरों या अन्य धार्मिक स्थानों में प्रवेश कर सकती हैं। उन्हें अशुभ माना जाता है।

एक महिला जिनसे मैंने बात की, वे अपनी बेटी की शादी में भी शामिल नहीं हुई थीं। वह कहती हैं कि “मैं अपनी बेटी की शादी में जाना चाहती थी। हम जैसे लोग इस पिछड़ी परंपरा का पालन नहीं करना चाहते हैं, लेकिन अगर हम विरोध करें तो समाज की निंदा का डर रहता है।”

संगठन का हिस्सा होने के चलते, हम उन विधवाओं को समर्थन और सहयोग प्रदान करते हैं जो अब इस परंपरा का पालन नहीं करना चाहती हैं। हम विधवाओं के प्रति, समाज की धारणा बदलने के लिए ‘चुनरी परिवर्तन’ नाम की एक रस्म करते हैं। यह एक तरह का विरोध प्रदर्शन है जिसमें हम इन महिलाओं को रंगीन चुनरियां पहनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कभी-कभी हम सामूहिक रूप से चुनरी परिवर्तन की रस्म करते हैं, और बाकी समय हम लोगों के घर जाकर यह करने में उनकी मदद करते हैं। चुनरी बदलने के साथ-साथ, संगठन की महिलाएं हिस्सा लेने वालों को मेहंदी लगाने के लिए भी प्रेरित करती हैं। हम महिलाओं और उनके परिवारों को समझाते हैं और उन्हें किसी भी तरह के सामाजिक प्रतिरोध का सामना करने के लिए मजबूत बनाने की तैयारी करते हैं।

विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों में संगठन की बैठकों के दौरान, हम इस परंपरा के पिछड़ेपन के बारे में बात करते हैं और लोगों को इसे अस्वीकार करने के लिए प्रेरित करते हैं। कभी-कभी इसके बारे में सुनकर अथवा अन्य महिलाओं की कहानियां जानकर, विधवा महिलाएं हमारे पास आती हैं और हमसे कहती हैं कि हम उनके घर पर भी यह रस्म करें। फिर हम उनके घर जाते हैं और रस्म करते हैं। हम अब तक सौ से अधिक बार यह कर चुके हैं।

इन बैठकों में अधिकतर महिलाएं होती हैं, लेकिन कभी-कभी पुरुष भी शामिल होते हैं। एक बार हमें एक पंचायत में बुलाया गया। पंचायत के कुछ पुरुष सदस्य जो हमसे नाराज़ थे, उन्होंने हमसे पूछा कि हम पुरानी परंपराओं में क्यों हस्तक्षेप कर रहे हैं। हमने उनसे कुछ अचूक सवाल पूछे जैसे कि “क्या पुरुषों को भी अपने विधुर होने का प्रतीक दिखाना पड़ता है?” “क्या उन्हें समारोहों में शामिल होना बंद करना पड़ता है?” “क्या पंचायत को महिलाओं समेत सबको समान न्याय प्रदान नहीं करना चाहिए?” कुछ पुरुष हमसे खुली चर्चा करते हैं, और कुछ नहीं।

कई महिलाएं जिनके घर हम जाते हैं, वे संगठन में शामिल हो जाती हैं और इस परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। हेमा देवी* जिन्होंने अपने घर पर अनुष्ठान किया था, कहती हैं कि “उस दिन के बाद से, मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं शादियों में, काम पर, मंदिर में, जहां भी जाना चाहती हूं, जाती हूं। यहां तक कि मेरे ससुराल वाले और आसपास के लोग भी मान गए हैं कि विधवा महिलाएं अपशकुन नहीं लातीं हैं।”

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदला गया है।

अनीता सोनी एक सामाजिक कार्यकर्ता और थार महिला संगठन, बाड़मेर की संस्थापक हैं।

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जहां ग्राम और पंचायत मिलकर रोज़गार और संसाधन बना रहे हैं

मेरा नाम सविता डामोर है। मैं बांसवाड़ा, राजस्थान की एक ग्राम पंचायत मस्का बावड़ी की निवासी हूं। हमारे यहां बरसात के दिनों में खूब पानी आता है लेकिन इसे इकठ्ठा करके इस्तेमाल करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में बनी छोटी नहर (एनिकट) में भी मिट्टी भर चुकी थी। इसलिए हम गांव के लोगों ने मिलकर तय किया कि इस एनिकट को अधिक गहरा किया जाए।

इसको लेकर हम सब लोगों ने ग्राम सभा में जाकर प्रस्ताव दिया, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया। इसमें ख़ास यह था कि हमने केवल श्रमदान करने के बजाय पंचायत के पास जाकर सरकारी योजनाओं के माध्यम से इसे करने का निर्णय लिया। अब इससे हमारे गांव के लिए जल संसाधन का निर्माण तो हो ही रहा है बल्कि साथ ही यहां के लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिल रहा है।  

एनिकट के गहरीकरण में हमें कई फायदे दिख रहे हैं। अब इसके ज़रिये न केवल यहां आसपास के चालीस बीघा क्षेत्रों की खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल पाएगा बल्कि पशुओं के लिए भी साल भर के लिए पानी की व्यवस्था हो जाएगी। यही नहीं, अब इससे आसपास के जलस्रोतों के गिरते जल स्तर में भी सुधार होगा।

सविता डामोर वाग्धारा संस्था के साथ बतौर को-ऑर्डिनेटर काम करती हैं। गांव में वह जलदूत के रूप में जल-संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं। इसके अलावा वह नागरिक तथा महिला अधिकारों और खेती जैसे विषयों पर भी काम करती हैं।

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रिपोर्ट लिखने के दौरान आने वाली कठिनाइयां

1. जब आपका मैनेजर आपसे बहुत प्यार से इधर-उधर की बातें कर रहा हो तो समझ जाइए कि रिपोर्ट लिखने का समय आ गया है। 

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

2. रिपोर्ट लिखना शुरू करने से पहले, बीच में, और फिर हर आधे घंटे में आपकी एक ज़रूरत।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

3. जब आपको रिपोर्ट में सौ अलग-अलग तरह की जानकारियों को संक्षिप्त में लिखने पर मजबूर किया जाए।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

4. जब आपका मैनेजर पहला ड्राफ्ट पढ़ता है।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

5. जब रिपोर्ट में आपको उन भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ जाए जिनके मतलब आपको खुद भी नहीं पता। 

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

6. जब आपके इकट्ठा किए गए डेटा को कोई अलग तरीके से परोसने को बोल दे।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

7. बहुत मेहनत के बाद भी जब आपका मैनेजर आपको ग़लतियों की लिस्ट पकड़ा दें।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

8. जब मैनेजर आपको काम की उंच-नीच समझाने देने की जगह सिर्फ फंडर के लिए प्रभाव (इम्पैक्ट) दिखाने के लिए बोले। 

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

9. इन सबके बाद भी जब डेडलाइन के दबाव में आप पूरी रात जागकर काम करें।

पंचायत सीरीज का एक दृश्य_पंचायत सीरीज
चित्र साभार: अमेजन प्राइम वीडियो

भारतीय संविधान के बनने की शुरुआत कैसे हुई?

भारतीय संविधान एक मजबूत लोकतंत्र की नींव है, जो आज भारत है। समान, न्यायसंगत, निष्पक्ष और सभी भारतीयों के लिए एक जैसा, संविधान हमारे जीवन को चुपचाप हमारी संभावनाओं को साकार करने की दिशा में मार्गदर्शन करता है। हम आशा करते हैं कि ये विचार मिलकर भारत के लगातार बढ़ते लोकतंत्र को मजबूत करने की बड़ी तस्वीर में योगदान देंगे।

भारतीय संविधान के 75वें वर्ष में कदम रखते हुए, नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने ‘संविधान की बात’ नामक पॉडकास्ट श्रृंखला शुरू की है। यह पॉडकास्ट श्रृंखला एनएफआई के चल रहे अभियान ‘संविधान से हम’ का हिस्सा है।

यह वीडियो मूलरूप से नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया पर प्रकाशित हुआ था।

सलूंबर की किशोरियों को शादी या खनन में से एक क्यों चुनना पड़ रहा है?

खनन करती लड़कियों की चप्पल_खनन
लड़कियां खान में तब तक काम करती हैं जब तक कि उनकी शादी नहीं हो जाती है। | चित्र साभार: रेखा नरुका

राजस्थान के सलूंबर जिले के लसाडिया ब्लॉक में बड़े पैमाने पर पत्थरों का खनन होता है। इस इलाक़े की आबादी में ज़्यादातर लोग मीणा आदिवासी समुदाय से आते हैं। बीते कुछ समय से इलाक़े में चल रही खनन गतिविधियां एक चिंताजनक मुद्दा बन गई हैं, खासकर किशोरी श्रमिकों की भागीदारी के कारण।

लसाडिया ब्लॉक के बेडावल गांव में, महज़ 12 से 20 साल की उम्र में लड़कियां अपने परिवार की आर्थिक सहायता के लिए खान में काम करने को मजबूर हैं। उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वे अपनी बेटियों को स्कूल भेजने की बजाय उन्हें खदान में काम करने के लिए भेज देते हैं और घर के पुरुष कमाई के लिए पलायन कर जाते है।

खनन का काम करने वाली आशा* बताती हैं कि “हम अपनी बड़ी बहनों जो पिछले कई सालों से खान में काम कर रही हैं, उन्हें देखकर काम करने आए हैं क्योंकि इस काम को करने के लिए पैसे मिलते हैं और उस पैसे से हम हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं। सुबह जल्दी उठकर घर के काम निपटा कर 5 से 6 किलोमीटर पैदल चलकर जाते हैं और वहां पर 7 से 8 घंटे काम करने के बाद वापस चल कर आते हैं।” आशा के साथ काम करने वाली और लड़कियों ने भी इस जानकारी पर सहमति दिखाई।

वे जोड़ती हैं कि उन्हें स्कूल जाने और अपने मास्टर जी से डर लगता है क्योंकि स्कूल बंद होने के बाद उनसे सफाई कराई जाती है। आशा कहती हैं कि “इससे बेहतर है कि हम मेहनत करके काम करेंगे तो खुद के खर्चे का पैसा तो कमा पाएंगे और परिवार के लिए भी कुछ मदद कर पाएंगे।” किशोरियां अपनी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा घर का खर्चा चलाने के लिए दे देती हैं।

इस गांव कि लड़कियां खान में तब तक काम करती हैं जब तक कि उनकी शादी नहीं हो जाती है। यहां जो लड़कियां खान में काम नहीं कर रही है, 15 साल के बाद उनकी शादी कर दी जाती है क्योंकि वह कमाई का जरिया नहीं बन पा रही हैं। वहीं, जो खान में काम करती हैं उनकी शादी 20 साल के बाद की जाती है।

किशोरियां शादी नहीं करके, आजाद रहने के लिए भी खान में काम करने को तैयार हैं। घर के खर्चे के बाद उनके पास जो पैसे बच जाते हैं, उसका इस्तेमाल वे बाहर घूमने, मेले में जाने, अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करती हैं। शादी के बाद आमतौर पर उनके पति उन्हें बाहर काम करने की आज़ादी नहीं देते हैं, जिससे वे अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर पाती हैं। उनके लिए खान पर आने-जाने में लगने वाला लगभग डेढ़ से दो घंटे का समय, वह समय है जब वे सबसे अधिक स्वतंत्र महसूस करती हैं क्योंकि इस दौरान वे अपनी सहेलियों के साथ हंस-खेल सकती है।

इस आत्मनिर्भरता और आज़ादी के लिए, इन्हें खानों में ख़तरनाक परिस्थितियों में काम करने, काम के लंबे घंटों और न्यूनतम वेतन जैसे जोखिम उठाने पड़ते हैं। इसके लिए उन्हें दिन की लगभग 200 रुपए दिहाड़ी मिलती है। खदान में फिसलन वाले पत्थरों का खनन होने के चलते उन्हें शारीरिक खतरों से भी जूझना पड़ता है। धूल से उन्हें सांस लेने में समस्या और भारी मशीन से चोट लगने का ख़तरा भी है। घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए और जल्दी शादी न करने के लिए उनके पास काम करना ही एक विकल्प है जो उन्हें स्वीकार भी है। लेकिन क्षेत्र में उचित रोजगार अवसरों के अभाव के कारण खान में काम उनका एकमात्र विकल्प बन जाता है।

*गोपनीयता के लिए नामों को बदल दिया गया है।

रेखा नरूका पिछले 6 साल से समाजिक क्षेत्र में काम कर रही हैं।

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कच्छ के छोटे रण में नमक श्रमिकों से अधिक महत्व गधों को क्यों मिल रहा है?

हाथ में नमक के टुकड़े_नमक श्रमिक
अगरिया समुदाय के लोग पारंपरिक नमक श्रमिक हैं जो सैकड़ों वर्षों से कच्छ के छोटे रण में नमक की खेती करते आ रहे हैं। | चित्र साभार: उदिशा विजय

गुजरात में अगरिया समुदाय के लोग पारंपरिक नमक श्रमिक हैं जो सैकड़ों वर्षों से कच्छ के छोटे रण में नमक की खेती करते आ रहे हैं। फरवरी 2023 में, समुदाय के कई सदस्यों को इस क्षेत्र से निकल जाने के नोटिस जारी किए गए थे। नोटिस के अनुसार, समुदाय के वे लोग जिन्होंने आधिकारिक सर्वेक्षण और निपटान (ऑफिशियल सर्वे एंड सेटलमेंट – एसएंडएस) प्रक्रिया के अंतर्गत अपना पंजीकरण नहीं कराया था, उन्हें 1972 के वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम के तहत, इस अधिसूचित जंगली गधा अभयारण्य में अवैध अतिक्रमणकारी माना गया है।

अगरिया समुदाय के लगभग 90 प्रतिशत लोगों ने 1997 में शुरू हुई इस प्रक्रिया के लिए आवेदन नहीं किया था। इसके पीछे दो कारण थे – पहला, उन्हें इस प्रक्रिया के तहत पंजीकरण को लेकर कोई जानकारी नहीं थी और दूसरा, अगरिया समुदाय सदियों से यहां के जंगली गधों के बीच रहते आ रहे हैं। इस वजह से उन्हें इस बात का कोई आभास नहीं हुआ कि अभयारण्य क्षेत्र होने की वजह से उन्हें अब जमीन और रोजी-रोटी के अधिकार से भी वंचित किया जा सकता है।

पंजीकरण के लिए आवेदन करने वालों में नमक खनन कंपनियां और ऐसे कुछ लोग थे जो अगरिया समुदाय से संबंध नहीं रखते थे। यह अलग बात है कि वर्तमान में ये लोग अब कच्छ के छोटे रण में नमक निर्माण का पूरा काम देखते हैं तथा अगरिया समुदाय के कई लोग, जो यहां कभी जमीन के स्वतंत्र मालिक हुआ करते थे, वे इन कंपनियों में केवल श्रमिक बनकर रह गए हैं। ऐसा भी पाया गया है कि सर्वेक्षण के दौरान, विभिन्न कारणों से दस्तावेज जमा करने की प्रामाणिकता की जांच भी नहीं की गई थी। स्वतंत्रता के बाद से कच्छ के छोटे रण की ज़मीन का कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया था।

सेतु अभियान, एक ऐसा संगठन है जो जमीनी स्तर पर स्थानीय प्रशासन को मजबूत करने पर काम करता है, यह कच्छ के छोटे रण में अगरिया समुदाय के साथ उनकी भूमि और काम के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है। लेकिन नौकरशाही की वजह से यह सब कर पाना इस संगठन के लिए मुश्किल हो गया है। संगठन ने संबंधित अधिकारियों को कई याचिकाएं और आवेदन भेजे ताकि वे अधिकारियों से इन सब मुद्दों को लेकर मिल सकें लेकिन हर थोड़े समय बाद अधिकारी बदल जाता है और बात आगे नहीं बढ़ पाती है।

देवयतभाई जीवनभाई अहीर, नमक के खेतों में काम करने वाले एक मजदूर हैं जिनका नाम सूची में नहीं है। उन्होंने हमें बताया “अगर वे हमें नमक के खेतों में काम करने की अनुमति नहीं देंगे तो हमें मजबूरन किसी और जगह काम ढूंढने के लिए पलायन करना पड़ेगा। आखिरकार, हमें अपना गुजारा चलाने के लिए कम से कम पांच से दस हज़ार रुपये तो कमाने ही पड़ेंगे।”

कई संगठनों ने, सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर रण में अगरिया और खानाबदोश समुदाय के लोगों की मदद करने की कोशिश की है। इसमें पीने के पानी की व्यवस्था, बच्चों के लिए सामयिक छात्रावास, कार्य स्थल पर स्वास्थ्य खतरों के लिए सही उपचार, सुरक्षा किट, सब्सिडी वाले सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप और चिकित्सा शिविर प्रदान करने जैसी सुविधाएं देना शामिल हैं।

विडंबना यह है कि एक तरफ राज्य सरकार इस समुदाय के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें उनकी ज़मीन से वंचित भी कर रही है। 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां के जंगली गधे फल-फूल रहे हैं लेकिन अगरिया समुदाय के लिए यही बात नहीं कही जा सकती है।

महेश ब्राह्मण, सेतु अभियान के साथ कार्यक्रम समन्वयक के रूप में काम करते हैं और कई वर्षों से नमक के खेतों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए काम कर रहे हैं। उदिशा विजय एक इंडिया फेलो हैं जो सेतु अभियान के साथ भुज, कच्छ में बेहतर स्थानीय शासन पर काम कर रही हैं।

इस लेख का एक संस्करण इंडिया फेलो पर प्रकाशित हुआ था।

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थारू आदिवासी: जहां प्रतिरोध एक परंपरा है

उत्तर प्रदेश के घने जंगलों वाले ज़िले लखीमपुर खीरी में, दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना साल 1977 में की गई थी। तब से इलाके के थारू आदिवासी, अपने गांवों में बसे रहने के लिए वन विभाग के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इन्हें विस्थापित करने का इरादा रखने के अलावा वन विभाग, वन संसाधनों जैसे औषधीय जड़ी-बूटियों, जंगली घास और गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी तक इनकी पहुंच को भी सीमित करता है।

थारू आदिवासी पिछले पांच दशकों से आंदोलन कर रहे हैं। इस दौरान, समय-समय पर उनकी लड़ाई में कई बदलाव आए हैं। थारू आदिवासियों ने अदालत में क़ानूनी लड़ाई लड़ी और हारे, फिर वे राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच जैसे राष्ट्रीय मंचों के तहत संगठित हुए। इसके साथ ही, उन्होंने थारू आदिवासी महिला मजदूर किसान मंच का गठन किया जो एक जन आंदोलन है। इसके ज़रिए वे अपना संघर्ष जारी रख रहे हैं। अपने आंदोलन की शुरुआत से ही उन्होंने अहिंसक विरोध किया है। अब लोगों ने सामुदायिक वन अधिकारों की मांग के लिए वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006 जैसे कानूनी साधनों का उपयोग करना भी सीख लिया है। थारू समुदाय की युवा पीढ़ी अब उन विशेषाधिकारों की मांग कर रही है जो उन्हें संविधान द्वारा एक भारतीय नागरिक होने पर दिए गए हैं।

थारु आदिवासियों के लिए प्रतिरोध एक परंपरा बन गया है – जो एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी पीढ़ी तक चला आ रहा है। पुरानी पीढ़ी ने युवाओं को लड़ने के लिए कैसे प्रेरित किया? युवा आंदोलन में क्या नया लेकर आए हैं? और, दोनों पीढ़ियों ने एक दूसरे से क्या सीखा है? इन तमाम बातों पर आईडीआर ने वन विभाग को अदालत में ले जाने वाले 65 वर्षीय कार्यकर्ता रामचन्द्र, और सहबिनया राना से बात की है। सहबिनया , 18 साल की उम्र से इस संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने सोशल वर्क की पढ़ाई की है और बैठकों और विरोध प्रदर्शनों में अपने पिता के साथ जाकर काम करना सीखा है।

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एक बार जब… स्कूल में एक अफ़वाह उड़ी

उस दिन, एक फ़ोन आया…

फोन सुनते हुए शिक्षक_स्कूल

फिर, शुरू हुआ… सफ़ाई अभियान!

शौचालय की सफाई करते शिक्षक_स्कूल

और, बच्चों को पहली बार सब साफ-सुथरा दिखाई दिया।

साफ शौचालय को देखते शिक्षक और बच्चे_स्कूल

तभी, किसी ने आकर बताया कि…

एक महिला शिक्षक सूचना देती हुई_स्कूल

इस पर, बच्चों ने कहा –

मुस्कुराते हुए बच्चे_स्कूल
चित्र साभार: सुगम ठाकुर

उदय शंकर, सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च संस्था से जुड़े हैं और हल्का-फुल्का का यह अंक उनके एक अनुभव पर आधारित है। अगर आपके पास भी विकास सेक्टर से जुड़ा ऐसा कोई दिलचस्प और मज़ेदार क़िस्सा है तो हमें [email protected] पर लिख भेजें।

झारखंड के पॉल्ट्री किसानों के लिए गर्मी सबसे बड़ी बाधा कैसे बन गई है

शेड के साथ खड़ी एक महिला_पॉल्ट्री किसान
शेड को ठंडा रखने के लिए महिलाएं एस्बेस्टस की छत को पुआल या बोरियों से ढकती हैं। | चित्र साभार: सेल्को फाउंडेशन

गर्मियों में झारखंड के गुमला जिले में पिछले कुछ सालों से औसत तापमान 40-42 डिग्री सेल्सियस रहने लगा है। यह ब्रॉयलर, या मांस उत्पादन के लिए पाले गए चिकन (मुर्ग़ों) के लिए ठीक नहीं है। मुर्ग़ा पालन के लिए आदर्श तापमान 25 डिग्री सेल्सियस होता है। बड़े फार्म तापमान को कम रखने और अपनी पॉल्ट्री के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए फॉगर्स और कूलरों का उपयोग करते हैं। लेकिन 500-600 मुर्गियों वाले, छोटे पॉल्ट्री किसान इन तकनीकों का खर्च नहीं उठा सकते हैं। उनके लिए न केवल इन्हें खरीदना बल्कि इन्हें चला पाना भी महंगा है, क्योंकि इनमें बहुत अधिक बिजली की खपत होती है।

गुमला ग्रामीण पोल्ट्री एसएस सहकारी समिति लिमिटेड, जिसकी सभी सदस्य महिलाएं हैं, उन्हें कई ऐसे तरीक़ों के बारे में बताया जाता है जिससे वे अपने शेड को ठंडा रख सकते हैं। इन तरीक़ों में शेड की एस्बेस्टस छत और दीवारों पर पुआल या बोरियां रखना और दिन में दो से तीन बार पानी छिड़कना शामिल रहता है। इसमें समस्या यह है कि यदि पुआल को बांधकर न रखा जाए तो वह तेज हवा में उड़ जाता है। इसके अंदरूनी हिस्से को ठंडा करने के लिए पक्षियों और शेड के फर्श पर भी पानी छिड़का जाता है। लेकिन ये उपाय भी तापमान को केवल 2-3 डिग्री तक ही कम कर पाते हैं।

अगर किसान अपने इन शेडों को ठंडा नहीं रखेंगे तो ऐसे में गर्मी बढ़ने के साथ मुर्ग़ियां मरने लगेंगी। हर साल गर्मियों में, औसतन एक फार्म पर लगभग 5-7 प्रतिशत मुर्ग़ियां मर जाती हैं। पहले यह मृत्यु दर 1-2 प्रतिशत थी। इसके अलावा भी कई समस्याएं हैं जैसे मुर्गियों को खाना खाने में बहुत गर्मी लगती है जिस वजह से उनका वजन कम हो जाता है। उनका वजन जो सर्दियों में औसतन 2 किलो होता है, गर्मियों में घटकर 1.8 किलो रह जाता है। कम वजन का मतलब है कम आय। पहले एक पोल्ट्री किसान जहां हर साल 50,000 रुपए कमाता था (उत्पादक शुल्क के रूप में), अब 40,000 रुपए ही कमा पाता है। बहुत गर्म शेड की वजह से हमें ज्यादा मुर्गियों के झुंड को पालने में मुश्किल आती है। बिना ठंडक वाले शेड में, भीड़ और गर्मी के असर से बचते हुए केवल 600 (1.25 वर्ग फुट में एक पक्षी) मुर्ग़ियां ही रखी जा सकती हैं, जबकि एक वातानुकूलित शेड में 800-1,000 मुर्ग़ियां (प्रति वर्ग फुट में एक पक्षी) आ सकती हैं।

मुर्ग़ियों के एक झुंड को मनचाहे वजन तक लाने में भी अधिक समय लगता है क्योंकि उनके वजन बढ़ने की गति धीमी होती है। इससे भी हमारी आय में गिरावट आती है। पहले हमारे पास हर साल, छह से सात प्रजनन चक्र करने का समय होता था और अब हम औसतन पांच ब्रीडिंग चक्र ही कर पाते हैं। हर चक्र में लगभग 40 दिन लगते हैं। प्रत्येक चक्र के बाद, शेड को साफ किया जाता है, सफेदी की जाती है और 15-20 दिनों के लिए उसे ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। मुर्गियों के एक झुंड को पालने में जितना अधिक समय लगता है, उन्हें उतना ही अधिक भोजन और पानी देना पड़ता है, जिसमें फिर से अतिरिक्त समय, पैसा और प्रयास लगता है। इस मौसम में पानी पीने के बर्तन को सामान्य दिनों की तुलना में, दिन में तीन की बजाय चार से पांच बार भरना पड़ता है। इससे महिलाओं का काम और भी बढ़ जाता है। इनमें से कुछ को तो पानी भरने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। यहीं नहीं, पक्षियों में पानी की कमी को पूरा करने के लिए पानी में ग्लूकोज भी मिलाया जाता है।

हममें से कुछ लोगों ने शेड को ठंडा रखने को लेकर सेल्को फाउंडेशन के साथ काम किया है। हमने सोलर एग्ज़ॉस्ट पंखे और लाइटें लगाई हैं और अपनी छतों पर चूने की परत से पुताई की है। लेकिन एग्ज़ॉस्ट पंखे पूरे दिन चलते हैं इसलिए रात में सोलर लाइटें नहीं जल पाती हैं। इन उपायों से कुछ मदद मिली है। इस बार मेरे (सरिता के) फार्म की 600 मुर्गियों में से केवल 20 ही मरी हैं और उनका वज़न भी बहुत कम नहीं हुआ है। एक और हालिया पहल में एस्बेस्टस छतों को ‘ठंडी छतों‘ से बदलना शामिल हुआ है, जो न केवल गर्मी के असर को कम करने में मदद करती है बल्कि सर्दियों के दौरान गर्मी को भी रोकती है।

सरिता देवी ‘गुमला ग्रामीण पोल्ट्री एसएस सहकारी समिति लिमिटेड’ के बोर्ड की सलाहकार है और उनकी इस समिति की सभी सदस्य महिलाएं हैं। अखिलेश कुमार वर्मा ‘झारखंड महिला स्वावलंबी पोल्ट्री सहकारी संघ लिमिटेड’ के प्रबंधक हैं।

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अधिक जानें: इस आलेख में पढ़ें कि जलवायु परिवर्तन किस तरह ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रहा है।

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आदिवासी महिलाओं के साथ काम करने वाली संस्थाएं, इन पांच आंकड़ों पर ध्यान दें 

समाजसेवी संस्था प्रदान द्वारा जनवरी में जारी की गई, आदिवासी आजीविका की स्थिति रिपोर्ट, 2022 मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों की बात करती है। रिपोर्ट के लिए, इन राज्यों के 22 ज़िलों के 55 ब्लॉकों में 6019 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया था। इनमें 4745 आदिवासी, 393 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समुदाय (पर्टिकुलरली वल्नरेबल ट्राइबल ग्रुप – पीवीटीजी) और 881 गैर-आदिवासी समुदायों से आने वाले परिवार थे। रिपोर्ट मुख्य रूप से बताती है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आदिवासी परिवारों की वार्षिक आय 73,900 और 53,610 रुपए मात्र है।

हालांकि इस प्रमुख आंकड़े के अलावा रिपोर्ट आदिवासी आजीविका को चलाने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों, संसाधनों, परिवार की विशेषताओं और आजीविका प्रथाओं पर भी बात करती है। लेकिन इस आलेख में हम उन पांच महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो आदिवासी समाज में महिलाओं की सामाजिक स्थिति को स्पष्टता से दिखाते हैं।

रिपोर्ट में कुछ उत्तरदाताओं और आदिवासी मामलों के विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि यह धारणा कि आदिवासी समाज में महिलाओं की स्थिति अन्य समाज के अपने समकक्षों की तुलना में बेहतर होती है, सही नहीं हैं। वे कहते हैं कि जीवनसाथी चुनने, पुनर्विवाह करने और घर से बाहर जाकर काम करने जैसी बातों को देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि आदिवासी महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता मिलती है। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि इसके कारण महिलाओं पर काम का अतिरिक्त दबाव भी है। आदिवासी महिलाएं ज़्यादातर घरेलू काम करने के साथ-साथ, जंगलों में जाती हैं और, ईंधन और वनोपज इकट्ठा करती हैं। इसके अलावा वे खेती, मज़दूरी, सब्ज़ियां बेचने जैसे काम भी करती हैं।

दूसरी ओर, आदिवासी महिलाओं के सशक्तिकरण पर चल रही तमाम योजनाओं और समाजसेवी संस्थाओं के जागरुकता प्रयासों और कार्यक्रमों की कमी नहीं हैं। लेकिन इन सबके बीच शिक्षा, स्वास्थ्य, फ़ैसले लेने की क्षमता, मोबाइल जैसे माध्यमों तक पहुंच वग़ैरह को लेकर आदिवासी महिलाओं की स्थिति क्या है, यह उन आंकड़ों से समझते हैं जिन पर सरकारों और समाजसेवी संस्थाओं को गौर करना ज़रूरी है। 

आदिवासी आजीविका रिपोर्ट_देहात में महिलायें
समुदाय की लगभग आधी महिलाएं पढ़ने, लिखने और बुनियादी गणित के सवाल हल करने जैसे काम नहीं कर सकती हैं। | चित्र साभार: विकीमीडिया कॉमन्स

शिक्षा की स्थिति

मध्य प्रदेश में 58.3 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 49 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जिनमें परिवार के मुखिया ने कोई स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है। वे परिवार जिनकी मुखिया महिलाएं हैं, उनके लिए यह आंकड़ा मध्य प्रदेश में 75.3 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 72 प्रतिशत है। यह समुदाय में महिलाओं की कमजोर शैक्षणिक स्थिति की ओर इशारा करता है। परिवार मुखिया की बात करते हुए इस आंकड़े पर भी गौर किया जा सकता है कि मध्य प्रदेश में, अनुसूचित जनजाति से आने वाले 25 वर्ष से अधिक आयु के 50 प्रतिशत वयस्क असाक्षर हैं। छत्तीसगढ़ में यह 41 प्रतिशत है। लेकिन रिपोर्ट यह भी बताती है कि समुदाय की लगभग आधी (मध्य प्रदेश में 52 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 54 प्रतिशत) महिलाएं पढ़ने, लिखने और बुनियादी गणित के सवाल हल करने जैसे काम नहीं कर सकती हैं। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि आदिवासी महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर जागरुकता, अगली पीढ़ी की शिक्षा को लेकर उत्साह और पोषण-स्वास्थ्य वग़ैरह जैसी ज़रूरतों की अनदेखी होना स्वाभाविक ही लगता है।

आहार विविधता और खाद्य सुरक्षा

आहार विविधता से भोजन की पोषण गुणवत्ता जांची जाती है। रिपोर्ट में इसे समझने के लिए संयुक्त राष्ट्र के मानक, खाद्य उपभोग स्कोर (एफसीएस) का इस्तेमाल किया गया है। इसमें 0-21 को खराब, 21.5-35 को सीमांत (बॉर्डरलाइन) और 35 से अधिक को स्वीकार्य आंकड़ा माना जाता है। रिपोर्ट में परिवारों और महिलाओं की आहार विविधता का आकलन अलग-अलग किया गया है। यह देखना दिलचस्प है कि अन्य समाजों से उलट आदिवासी समाज में इन दोनों आंकड़ों में बहुत अधिक अंतर नहीं है। पहले मध्य प्रदेश की बात करें तो स्वीकार्य आहार विविधता वाली आदिवासी महिलाओं का प्रतिशत 58.1, सीमांत के लिए 37.7 प्रतिशत और ख़राब के लिए यह प्रतिशत 4.2 है जबकि परिवारों के लिए यही आंकड़े क्रम से 58.7 प्रतिशत, 37.1 प्रतिशत और 4.2 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि लगभग आधे से अधिक परिवार और महिलाएं ठीक-ठाक गुणवत्ता का भोजन करते हैं।

छत्तीसगढ़ में आहार विविधता के आंकड़े मध्य प्रदेश जितने बेहतर नहीं दिखते हैं लेकिन परिवारों और महिलाओं के लिए आंकड़ों में अंतर यहां पर भी न के बराबर मिलता है। राज्य में स्वीकार्य आहार विविधता वाली महिलाओं का प्रतिशत 36.1, सीमांत के लिए 61.9 प्रतिशत और ख़राब के लिए 2.0 प्रतिशत है। वहीं, परिवारों के लिए यही आंकड़े क्रम से 36.7 प्रतिशत, 61.5 प्रतिशत और 2.2 प्रतिशत हैं।

देखने में सकारात्मक लगने वाले, आहार विविधता के आंकड़ों को अगर खाद्य सुरक्षा के आंकड़ों के साथ देखा जाए तो यह उतनी बढ़िया तस्वीर पेश नहीं करते हैं। खाद्य सुरक्षा से मतलब, लोगों के पास हर समय पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्धता होना है। रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में 25.9 प्रतिशत आदिवासी ही भोजन की उपलब्धता को लेकर सुरक्षित महसूस करते हैं यानी एक चौथाई आदिवासियों के पास ही हर समय भोजन है। परिवार की महिला सदस्यों के मामले में यह आंकड़ा 30.1 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ के लिए यह आंकड़े लगभग दोगुने दिखाई देते हैं जहां 49.7 प्रतिशत परिवार खाद्य सुरक्षित हैं और महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 49.3 प्रतिशत है।

आजीविका के स्रोत

आदिवासी समुदाय की आजीविका के प्रमुख स्रोतों में कृषि, पशुपालन, वनोपज संग्रहण और बिक्री, मज़दूरी, वेतन या पेंशन और कुछ गैर-कृषि गतिविधियां प्रमुख हैं। जैसा कि आलेख की शुरूआत में भी ज़िक्र किया गया है कि आदिवासी महिलाएं घरेलू कामों से लेकर कृषि, पशुपाल, वनोपज संग्रहण जैसे तमाम काम करती हैं और इसी के कारण उनके ऊपर काम का अतिरिक्त दबाव भी देखने को मिलता है। हालांकि आजीविका कमाने में महिलाओं की भागीदारी बताने वाला कोई आंकड़ा रिपोर्ट में सीधे तौर पर नहीं दिया गया है लेकिन विभिन्न स्रोतों से परिवारों को होने वाली आय के आंकड़ों पर गौर करें तो महिलाओं की भागीदारी का अंदाज़ा मिलता है।

मध्य प्रदेश के लिए विभिन्न स्रोतों से परिवार को होने वाली सालाना कुल आय जहां 73,900 रुपए हैं, वहीं महिला प्रधान परिवारों के लिए यह औसत आंकड़ा 79,108 है। छत्तीसगढ़ की बात करें तो परिवार की सालाना औसत आय 53,610 रुपए और महिला प्रधान परिवारों के लिए 52,109 रुपए है। हालांकि महिलाओं से जुड़ा यह आंकड़ा, परिवार की आय वाले कुल नमूने में शामिल है। फिर भी इनका मध्य प्रदेश में आठ प्रतिशत अधिक और छत्तीसगढ़ में लगभग बराबर होना, आजीविका कमाने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका की तरफ़ इशारा करता है।

मोबाइल फ़ोन तक पहुंच

मध्य प्रदेश के 66 प्रतिशत आदिवासी गांवों और छत्तीसगढ़ के 72 प्रतिशत आदिवासी गांवों तक कम से कम एक मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता है। जहां तक मोबाइल के स्वामित्व का सवाल है, मध्य प्रदेश में 6.9 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 11.2 प्रतिशत महिलाओं के पास अपना मोबाइल फ़ोन है जबकि पुरुषों के लिए ये आंकड़े इन राज्यों के लिए क्रम से 18 और 20 प्रतिशत है। वहीं, स्मार्टफ़ोन की बात करें तो मध्य प्रदेश में चार प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 7.2 प्रतिशत आदिवासी महिलाओं के पास उनके निजी स्मार्टफ़ोन हैं। इन आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि आदिवासी समाज के एक बहुत छोटे तबके तक ही अभी मोबाइल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं की पहुंच बन सकी है। मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता और कमाई के आंकड़ों को एक साथ देखें तो अंदाज़ा लगता है कि सीमित पहुंच का बड़ा कारण लोगों की जेब में पैसे ना होना है।

फ़ैसला लेने की क्षमता

रिपोर्ट आदिवासी समाज में महिलाओं के पास अधिक स्वायत्तता होने की धारणा पर भी बात करती है और बताती है कि पारिवारिक निर्णयों से जुड़े आंकड़े कोई और ही कहानी कहते हैं। यह सर्वे करते हुए बच्चों की शिक्षा, आजीविका, दैनिक ख़रीदारी, संपत्ति, ऋण समेत मायके जाने या परिवार का आकार तय करने जैसे तमाम छोटे-बड़े फ़ैसलों को लेकर सवाल पूछे गए थे। इनके जवाबों पर आधारित आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी महिलाओं की स्थिति भी अन्य समाजों से बहुत अलग नहीं हैं। हालांकि आंकड़े यह कहते हैं कि आदिवासी परिवारों में आधे से अधिक फ़ैसले संयुक्त रूप से लिए जाते हैं लेकिन साथ ही यह भी बता देते हैं कि परिवार की महिला सदस्यों की राय को पुरुषों जितना महत्व नहीं मिलता है।

मध्य प्रदेश में, ऊपर ज़िक्र किए गए तमाम विषयों से जुड़े फ़ैसलों में 47 से 52 प्रतिशत फ़ैसले आदिवासी परिवार संयुक्त रूप से लेता है। पुरुष जहां 17 प्रतिशत फ़ैसले ख़ुद कर सकते हैं वहीं महिलाओं के लिए यह आंकड़ा आठ प्रतिशत है। इसी तरह, परिवार में वयस्क बेटा लगभग 4 प्रतिशत फ़ैसले ले सकता है तो बेटियां केवल 0.1 प्रतिशत फैसले ले सकती हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ में परिवार संयुक्त रूप से लगभग 72 प्रतिशत फ़ैसले लेते हैं। यहां महिलाओं की स्थिति कहीं बेहतर नज़र आती है, पुरुष जहां लगभग दो प्रतिशत मामलों में फ़ैसले लेते हैं, वहीं महिलाएं लगभग सात प्रतिशत तक फ़ैसले ख़ुद करती हैं। बेटे-बेटियों के बीच का अंतर यहां पर भी बना रहता है और बेटे लगभग पांच प्रतिशत फ़ैसले ख़ुद तय करते हैं तो बेटियों का औसत 0.3 प्रतिशत है।

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