हमारे स्कूलों से क्यों नदारद है सावित्रीबाई फुले की कहानी?

सावित्रीबाई फुले हमारे देश की पहली शिक्षिका रही हैं। वह शिक्षिका जिन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी इस देश की लड़कियों और औरतों के शिक्षा के अधिकार के लिए। लेकिन क्या हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में उनके ओहदे और कद के मुताबिक उनकी बात की जाती है, उनसे हमारा परिचय बतौर देश की पहली शिक्षिका क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में करवाया जाता है?

ब्रिटिश शासन के उस दौर में जब अंग्रेज भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे और भारतीय पुरुष अपनी महिलाओं को केवल घर के चौका बर्तन तक सीमित रखना चाहते थे। ऐसे समय में सावित्रीबाई ने न केवल लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया बल्कि विधवा विवाह, गर्भवती बलात्कार पीड़ितों का पुनर्वास और छुआछूत मिटाने के लिए भी योगदान दिया। सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने 1848 में पुणे में पहला स्कूल खोला और 1853 में गर्भवती बलात्कार सर्वाइवर्स के लिए एक गृह की भी शुरुआत की।

वह एक शिक्षिका और समाज सुधारिका के साथ मराठी कवयित्री भी थीं। ‘फुले काव्य’ उनकी प्रसिद्ध रचना है। फुले दंपति ने 1873 में सत्यशोधक समाज की शुरुआत की और 25 दिसंबर 1873 को पहला विधवा पुनर्विवाह भी करवाया। भारत में सावित्रीबाई फुले प्रमाण हैं वास्तविक नारीवादी और सशक्तिकरण की। लेकिन आज हम देखते हैं कि उस दौर की ब्राह्मणवादी और पुरुष प्रधान सोच आज भी हमारे समाज में मौजूद है। आज भी स्कूली शिक्षा में सावित्रीबाई फुले का ज़िक्र तक नहीं किया जाता। सावित्रीबाई फुले देश की पहली शिक्षिका रही हैं लेकिन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में स्कूली पाठयक्रम से लेकर परास्नातक तक न कोई चैप्टर/पाठ उनके बारे में पढ़ाया जाता है और न ही उनको लेकर कोई विशेष पाठयक्रम बनाया गया है। 

हालांकि, महाराष्ट्र के कुछ विश्वविद्यालयों में सावित्रीबाई फुले को एक हद तक दर्ज ज़रूर किया गया है। लेकिन पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में नहीं। इसका एकमात्र कारण जाति व्यवस्था का प्रभुत्व कहा जा सकता है क्योंकि सावित्रीबाई फुले किसी तथाकथित उच्च ब्राह्मण कुल से नहीं आती थीं बल्कि वह बहुजन समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। जिस तरह भारत में प्रभुत्वशाली उच्च वर्गों ने अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक लाभ के लिए जाति व्यवस्था का गठन किया उसी तरह उन्होंने इतिहास भी अपने लाभ के हिसाब से गढ़ दिया है।

अगर आप स्कूलों या स्नातक का इतिहास या राजनीतिक विज्ञान के सिलेबस को देखें, तो ब्रिटिश शासन के दौरान सशक्त महिलाओं में मात्र पंडिता रमाबाई का इतिहास पाएंगे जबकि उनसे पहले सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख जैसी महिलाएं सामाजिक सशक्तिकरण के लिए काम करती रही थीं। लेकिन इन वीरांगनाओं के इतिहास से विद्यार्थियों को वंचित रखा जाता है।

यह लेख मूलरूप से फेमिनिज़्म इन इंडिया पर प्रकाशित हुआ है।

मनरेगा के बदले लाए गए ‘वीबी-जी राम जी’ विधेयक पर ज्यां द्रेज़ ने क्या कहा?

संसद के शीतकालीन सत्र में ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी-जी राम जी’ विधेयक पास हो गया। इसे मनरेगा कानून के बदले लाया गया है। विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया है वहीं सरकार ने कहा है कि इससे ग्रामीण इलाकों में रह रहे लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मुहैया होंगे। बीबीसी हिन्दी के इस वीडियो में मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ इस नए बिल के बारे में बता रहे हैं।

यह लेख मूल रूप से बीबीसी हिंदी पर प्रकाशित हुआ था।

बुंदेलखंड में पानी और जाति के बीच दूरी बरकरार है

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर राजनगर तहसील के जमुनिया गांव का यह प्रसंग, क्षेत्र में व्याप्त सामाजिक विषमता और संरचनात्मक सीमाओं को उजागर करता है। इस गांव में आज भी जातिगत भेदभाव और छुआछूत की प्रथाएं इतनी गहराई से रची-बसी हैं कि लोग एक ही कुएं से सामूहिक रूप से पानी भरने से परहेज करते हैं।

बुंदेलखंड के इस हिस्से में जाति आधारित विभाजन न केवल सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि पहले से ही गंभीर जल संकट को कई गुना अधिक जटिल और दुष्कर बना देता है।

यह लेख मूल रूप से शेड्स ऑफ रूरल इंडिया पर प्रकाशित हुआ था।

नए पर्यावरण नियमों में खनन परियोजनाओं को जनसुनवाई से छूट क्यों दी जा रही है?

अब भारत में परमाणु खनिज (जैसे यूरेनियम, थोरियम), महत्त्वपूर्ण खनिज और रणनीतिक खनिज (जैसे दुर्लभ पृथ्वी तत्व) की नई खनन परियोजनाएं शुरू होंगी तो उनके लिए आम जनता से राय लेने या जनसुनवाई करने की जरूरत नहीं होगी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कहा है कि यह परियोजनाएं “राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा जरूरतों तथा रणनीतिक विचारों” से जुड़ी हैं।

आठ सितंबर, 2025 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अपने नए कार्यालय ज्ञापन (ओएम) में यह बात कही है। ओएम में कहा गया, “मंत्रालय ने पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए), 2006 के प्रावधानों के अनुसार और राष्ट्रीय रक्षा, सुरक्षा की आवश्यकता तथा रणनीतिक विचारों को देखते हुए निर्णय लिया है कि खनिज एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम की पहली अनुसूची के भाग बी में अधिसूचित परमाणु खनिजों और भाग डी में अधिसूचित महत्त्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों से जुड़ी सभी खनन परियोजनाओं को जनसुनवाई से छूट दी जाती है।”

खनिज एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023 में पहली अनुसूची के तहत परमाणु खनिज और महत्त्वपूर्ण व रणनीतिक खनिजों की नई परिभाषा तय की गई है। भाग-बी में यूरेनियम और थोरियम युक्त खनिज जैसे मोनाजाइट, पिचब्लेंड, रेर अर्थ वाले खनिज, फॉस्फोराइट, बीच सैंड से मिलने वाले इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन और सिलिमेनाइट को रखा गया है।

वहीं, भाग-डी में 24 महत्त्वपूर्ण खनिज शामिल किए गए हैं, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, गैलियम, इंडियम, मोलिब्डेनम, नियोबियम, रेयर अर्थ (बिना यूरेनियम-थोरियम), टंग्स्टन, टैंटलम, टाइटेनियम, वैनाडियम, पोटाश, फॉस्फेट, सेलेनियम, टेल्यूरियम, रेनियम और प्लेटिनम समूह के तत्वों के साथ-साथ बेरिलियम, कैडमियम, टिन और जिरकोनियम जैसे खनिज शामिल हैं। यह संशोधन साफ करता है कि भविष्य की ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी जरूरतों को देखते हुए भारत इन खनिजों को रणनीतिक संसाधनों की श्रेणी में रख रहा है।

जनसुनवाई की छूट को लेकर मंत्रालय (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालयने यह तर्क दिया है कि, “13 मार्च, 2025 को एक कार्यालय ज्ञापन (ओएम) जारी किया था, जिसके तहत सभी महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की खनन परियोजनाओं पर “आउट ऑफ टर्न” विचार करने की व्यवस्था की गई, ताकि इन प्रस्तावों की मंजूरी (क्लीयरेंस) तेजी से दी जा सके। यह ओएम इसलिए जारी किया गया था क्योंकि ये महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज देश के कई क्षेत्रों की प्रगति के लिए जरूरी हैं, जिनमें हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, परिवहन और रक्षा शामिल हैं। ये भारत की 2070 तक ‘नेट जीरो’ की प्रतिबद्धता पूरी करने के लिए भी अहम हैं।

क्या है ईआईए, 2006 कानून, क्यों है जनसुनवाई सबसे अहम

भारत में ईआईए, 2006 कानून विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन के लिए बनाया गया था। यह तय करता है कि किसी परियोजना से पर्यावरण और स्थानीय समुदायों को क्या असर होगा और परियोजना शुरू करने से पहले किन शर्तों का पालन करना होगा।

इस कानून के तहत बड़ी और राष्ट्रीय स्तर की परियोजनाएं (जैसे कोयला खदानें, बड़े उद्योग, बड़े बांध) आदि को ए श्रेणी परियोजनाओं में रखा जाता है और इनकी मंजूरी केंद्र सरकार देती है। वहीं, अपेक्षाकृत छोटे आकार की परियोजनाओं को बी श्रेणी में रखा जाता है, जिनका मूल्यांकन सामान्य तौर पर राज्य स्तर पर होता है।

खान के सामने खड़ी एक महिला_पर्यावरण कानून
जनसुनवाई में प्रभावित क्षेत्र की जनता से राय ली जाती है और जनसुनवाई के मिनट्स (रिपोर्ट) को परियोजना प्रस्ताव में शामिल करना अनिवार्य होता है। | चित्र साभार: विकीमीडिया कॉमन्स / सीसी बीवाय

आईआइए कानून के तहत किसी भी परियोजना को स्क्रीनिंग यानी यह तय करना कि परियोजना को ईआईए की जरूरत है या नहीं, स्कोपिंग यानी किन-किन बिंदुओं पर पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन किया जाए और जनसुनवाई स्थानीय लोगों और हितधारकों की राय जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है।

जनसुनवाई सबसे अहम हिस्सा है, जिसमें प्रभावित क्षेत्र की जनता से राय ली जाती है और जनसुनवाई के मिनट्स (रिपोर्ट) को परियोजना प्रस्ताव में शामिल करना अनिवार्य होता है। हालांकि, राष्ट्रीय रक्षा, सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाएं या रणनीतिक रूप से अहम परियोजनाओं को इन दायरे से बाहर रखा गया है।

अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने यही छूट परमाणु, महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की खनन परियोजनाओं को दे दिया है और कहा है कि ये परियोजनाएं “राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा जरूरतों तथा रणनीतिक विचारों” से जुड़ी हैं।

दो मंत्रालयों ने मांगी थी छूट

पर्यावरण मंत्रालय ने जारी अपने ताजा ओएम में बताया है कि यह छूट हाल ही में रक्षा मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) द्वारा किए गए अनुरोध के बाद दी गई है।

जारी ओएम में मंत्रालय ने कहा है कि उसे 4 अगस्त, 2025 को उन्हें रक्षा मंत्रालय से एक प्रस्ताव मिला था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि दुर्लभ पृथ्वी तत्व (आरईईईएस) का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। इनका उपयोग निगरानी और नेविगेशन सिस्टम जैसे रडार और सोनार, संचार और डिस्प्ले उपकरणों जैसे लेजर और एवियोनिक्स, हथियारबंद वाहनों में माउंटिंग सिस्टम, प्रिसीजन गाइडेड गोला-बारूद और मिसाइल गाइडेंस तकनीक में किया जाता है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आरईईएस स्थायी चुंबकों के निर्माण के लिए जरूरी हैं, जो रक्षा उपकरणों की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन भारत में इन खनिजों का भंडार बेहद सीमित है और दुनिया के कुछ ही देशों में इसका उत्पादन होता है, जिससे आपूर्ति पर बड़ा जोखिम है। इस चुनौती को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने मांग की है कि महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों से जुड़ी खनन परियोजनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट मानते हुए इन्हें पर्यावरण मंजूरी के दौरान जनसुनवाई की प्रक्रिया से छूट दी जाए।

वहीं, परमाणु ऊर्जा विभाग ने भी 29 अगस्त 2025 को पर्यावरण मंत्रालय को भेजे गए पत्र में बताया कि बीच सैंड खनिज मोनाजाइट से प्राप्त थोरियम परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण के लिए संभावित ईंधन है, जबकि पहले चरण के लिए यूरेनियम खनन अनिवार्य है। विभाग ने जोर दिया कि इसके लिए देश में नए यूरेनियम और बीच सैंड खनिज भंडारों का तेजी से दोहन जरूरी है। इसी कारण विभाग ने मांग की है कि खनिज एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की पहली अनुसूची के भाग-बी में सूचीबद्ध परमाणु खनिजों की खनन परियोजनाओं को शीघ्र ऑपरेशनलाइज करने के लिए 14 सितंबर 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना के तहत जनसुनवाई से छूट दी जाए।

केंद्रीय स्तर पर होगी समीक्षा, परियोजना के आकार से नहीं मतलब

हालांकि, आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि “इन परियोजनाओं की समीक्षा केंद्रीय स्तर पर की जाएगी, चाहे खनन पट्टा क्षेत्र कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो।”

जारी ओएम में कहा गया है, इन खनन परियोजनाओं की ईआईए या ईएमपी रिपोर्ट में अन्य पहलुओं के साथ-साथ स्थानीय बस्तियों/जनसंख्या पर प्रभाव, सामाजिक ढांचा (जैसे चिकित्सा सुविधाएं, पेयजल सुविधाएं), कौशल विकास और रोजगार अवसर, लोक शिकायत निवारण प्रणाली आदि का विवरण शामिल होना जरूरी होगा। ताकि संबंधित क्षेत्रीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति प्रस्ताव की व्यापक समीक्षा कर सके और उपयुक्त पर्यावरण प्रबंधन योजना बनाई जा सके।

ओएम में कहा गया है, “इस योजना को लागू करने के लिए परियोजना प्रस्तावक पर्याप्त वित्तीय और अन्य संसाधन उपलब्ध कराएंगे और उन्हें पर्यावरण प्रबंधन योजना में शामिल किया जाएगा।”

यह लेख मूलरूप से डाउन टू अर्थ हिंदी पर प्रकाशित हुआ था।

‘नारीवादी शिक्षा’ सुनकर आपके मन में क्या आता है?

देश के 25 लोग हमें बता रहे हैं कि वे कैसा महसूस करते हैं, क्या सोचते हैं, उन्हें क्या ध्यान आता है जब वे इन दो शब्दों को एक साथ सुनते हैं: नारीवादी शिक्षा। 

द थर्ड आई में हम इन सवालों से इस विचार पर आपका ध्यान लाना चाहते हैं कि ज्ञान और सीखना सिर्फ एक विशेषाधिकार नहीं है। ये केवल वो जानीमानी प्रक्रिया नहीं है जिसमें ऊपर से नीचे की ओर प्रवाह होता है, जो जानते हैं उनसे, उनकी ओर जो नहीं जानते हैं। हमारा प्रस्ताव है, कि ज्ञान हमारे इतिहास में, हमारी यादों में, हमारे शरीर में वास करता है। अपने जेंडर, कामनाओं/ इच्छाओं और अपनी दुनिया का हम जो मतलब या फिर मूल निकालते हैं या देते हैं उसमें ये बस्ता है। इस तरह, ये फिल्म जो भी हमें बताया और समझाया गया और जो भी निष्कर्ष या समझ हमने अपनी तरफ से बनाई, उन दोनों को साथ बुनकर एक नए तरह के ज्ञान की रचना की तरफ इशारा करती है। 

आपके और हमारे बीच ज्ञान की एक नई कल्पना की बातचीत शुरू करने के लिए, हमारी तरफ से ये एक शुरुआत है। इसके निर्माण में आप भी हमारे साथ आएं।

यह लेख मूलरूप से द थर्ड आई पर प्रकाशित हुआ था।

यमुना खादर में बसे लोगों के जीवन और आजीविका पर कितनी तरह के खतरे हैं?

पूर्वी दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाले फ्लाइओवर के नीचे की सड़क से गुजरते हुए आप खंभों और दीवारों पर विभिन्न राज्यों के नृत्यों, भारत की विभूतियों के चित्र देखेंगे। लेकिन जुलाई-अगस्त का महीना आते ही यहां का नजारा थोड़ा बदल जाता है। इस रंगीन विविधता में दिल्ली के प्रवासियों के संघर्ष का एक और रंग जुड़ जाता है। वह रंग जो तकलीफ तो देता ही है, नागरिकों और प्रशासन के लिए कई जरूरी सवाल भी लेकर आता है।

यमुना खादर के प्रवासी किसानों का अनिश्चित जीवन

पूर्वी दिल्ली का मयूर विहार क्षेत्र यमुना तट पर बसा है और बाढ़-प्रभावित और संभावित दोनों ही वर्गों में आता है। यहां से गुजरते दिल्ली नोएडा डायरेक्ट फ्लाइवे के नीचे यमुना किनारे की जमीनों पर एक तरफ विकास कार्य हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वहां अनाज, सब्जियों और सजावटी पेड़-पौधों के खेत और नर्सरियां भी देखने को मिलती हैं। यह खेती उत्तर प्रदेश, बिहार और बाकी राज्यों से आए प्रवासी मजदूरों की आजीविका है और खेतों के नजदीक बनी झोंपड़ियां उनका घर।

नदी के बाढ़ क्षेत्र में होने के कारण लगभग हर साल ये खेत यमुना के पानी में डूब जाते हैं, जिसके साथ ही डूबती हैं प्रवासी मजदूरों की झोंपड़ियां। इस बार, 2025 के अगस्त-सितंबर महीने में हुई बारिश में यमुना का जल स्तर बढ़ गया और यमुना खादर में बसे इन प्रवासी किसानों और मजदूरों को ऊपर सड़क किनारे बने सरकारी शिविरों में रहने आना पड़ा।

हर बार बारिश आने और निचले इलाके में पानी भर जाने पर यही होता है। यमुना खादर से जुड़ी सड़कों पर सफेद तंबू दिखाई पड़ने लगते हैं जिनमें यमुना के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बाढ़-शिविर बनाया जाता है।

शिविर में रह रहे यूपी के बदायूं से आए धर्मेंद्र ने बताया कि वे यमुना खादर के निचले हिस्से में अपने परिवार के साथ रहकर खेती करते हैं, यही उनकी आजीविका है। लेकिन पिछले दिनों यमुना में बढ़े पानी के कारण भिंडी, तोरई, लौकी, बैंगन सहित अन्य सब्जियों की उनकी फसल पूरी तरह डूब गई। उन्हें बताया कि इस बाढ़ के कारण हमें लाखों का नुकसान होता है लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है।

खादर में फूलों और सजावटी पौधों की खेती और व्यापार करने वाले बिहार के अभिषेक ने मायूसी से कहा कि इस साल की बाढ़ में मुझे और मेरे जैसे फूल-पौधों के दूसरे व्यापारियों को लगभग डेढ़ से दो लाख का नुकसान हुआ है। “लगभग दस दिन पहले जब हमने देखा कि पानी बढ़ रहा है, तो हम जैसे-तैसे अपना सामान बांधकर यहां ऊपर आ गए। लेकिन, अगले सीजन वाली गेंदे, गुलदाउदी और बाकी सजावटी पौधों की हमारी फसल डूब गई,” अभिषेक बताते हैं।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बताया कि वे तैयार पौधों सहित अपना थोड़ा सामान तो बचा लाए, लेकिन कम तैयार पौधों को बचा कर ऊपर ला पाना असंभव था। “हर बार पानी बढ़ने पर हमें इसी तरह का नुकसान उठाना पड़ता है।”

बाढ़ के साथ डीडीए, पुलिस और जमीन मालिकों से भी खतरा

बेहतर जीवन की तलाश में दूसरे राज्यों से आए इन नागरिकों की समस्या सिर्फ बाढ़ नहीं है। बदायूं से लगभग दो दशक पहले आकर इस इलाके में बसने वाली शारदा देवी बताती हैं कि लगभग पांच महीने पहले दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) वालों ने इन इलाकों में आकर उनकी फसलों और झोपड़ियों पर बुलडोजर चला कर उन्हें बर्बाद कर दिया। “इसके कारण हमें डेढ़ से दो लाख का नुकसान हुआ। अभी हम इस नुकसान से उबर भी नहीं पाए कि अब इस बाढ़ ने हमारी कमर तोड़ दी।”

यमुना खादर के मयूर विहार इलाके में नेचर पार्क के निर्माण की प्रस्तावना को मंजूरी मिल चुकी है। उसी क्रम में इस क्षेत्र में अतिक्रमण को हटाने के लिए इस साल अप्रैल माह में डीडीए ने लगभग 10 बुलडोजर लगाकर एनएच-9 से डीएनडी के बीच 200 से ज्यादा झुग्गियों को ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई में फसलों और नर्सरियों को भी भारी नुकसान पहुंचा।

पहेली यह है कि ये किसान सरकारी जमीन पर कब्जा करके खेती नहीं कर रहे हैं। वे बाकायदा इस जमीन को इनके तथाकथित मालिकों से पट्टे पर लेते हैं, किराया देते हैं, बाढ़ का खतरा झेलते हैं और इसके बावजूद प्रशासन की तरफ से उन्हें किसी सहायता की जगह सिर्फ तकलीफ मिलती है।

यमुना खादर इलाके में खेती करने और रहने वाले बिहार के शंभू ने बातचीत में बताया कि इन जमीनों के मालिक आसपास के ही लोग हैं। ये पटपड़गंज, मयूर विहार, लक्ष्मी नगर आदि में रहते हैं। ये मालिक लोग ही खेती के लिए प्रवासियों को पट्टे पर अपनी जमीनें देते हैं। पट्टे पर जमीन लेकर खेती करने वाले धर्मेंद्र का कहना है कि पट्टे की कीमत पच्चीस हजार प्रति बीघा है और बाढ़ या किसी अन्य वजह से हुए नुकसान का भार भी किसानों पर ही होता है। फसल अच्छी हो या बुरी जमीन मालिक को अपने पैसे समय से चाहिए होते हैं। वे किसी तरह की रियायत नहीं बरतते हैं। 

शम्भू और धर्मेंद्र की बात की पुष्टि अगस्त 2023 के इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपे ज़फ़र तबरेज़ के ‘फार्मर्स ऑफ दी यमुना फ्लडप्लेन’ नाम के लेख से भी होती है। पीएचडी के लिए किए गए फील्डवर्क के हवाले से तबरेज़ लिखते हैं कि जिन जमीनों को किराए पर लेकर ये प्रवासी किसान खेती कर रहे हैं, उनका कब्जा आस-पास की रिहाइशी कॉलोनियों में रहने वाले अधिकतर ऊंची जाति के लोगों के पास है, जिनमें गुज्जर, चौहान और कुछ सरदार शामिल हैं।

राहत शिविर में पानी ले जाती एक महिला_यमुना बाढ़
यमुना खादर और मयूर विहार फेज एक और दो के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बाढ़ और सरकारी एजेंसियों, दोनों की मार झेलनी पड़ रही है। | चित्र साभार: कुमारी रोहिणी

इन जमीनों के लिए, किसानों को दस से पच्चीस हजार प्रति बीघा चुकाना होता है। बाढ़ से फसल को नुकसान होने की स्थिति में अगर सरकार से मुआवजा मिलता है, तो वह जमीन के मालिकों के हिस्से आता है, जिसमें से कुछ भी इन किसानों को नहीं दिया जाता। इसके अलावा, सिंचाई के लिए बोरवेल लगवाने के लिए 10-15 हजार और पंपसेट लगवाने के लिए लगभग 50 हजार रुपए तक की रिश्वत पुलिस को देनी पड़ती है। जो लोग ये पैसा नहीं दे पाते उनके पंप को अक्सर नुकसान पहुंचाया जाता है।

अब, अप्रैल 2025 में डीडीए की अतिक्रमण हटाने की मुहिम इन किसानों की त्रासदी का तीसरा पहलू दिखाती है। एक तरफ जहां ये प्रवासी किसान तथाकथित मालिकों को पैसे देकर खेती कर रहे हैं वहीं डीडीए उन जमीनों पर अपना हक बता रहा है। इस पूरी स्थिति से यमुना खादर की जमीन के भरोसे जीने वाले इस वर्ग के पहले से ही अनिश्चित जीवन में और भी अनिश्चितता आ गई है।

कई पीढ़ियों से यमुना खादर में खेती कर रहे किसानों के पास इस जमीन की मिल्कियत से जुड़ा कोई सरकारी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। नतीजतन, पूर्वी दिल्ली के चिल्ला खादर गांव के किसान यमुना के इस डूब क्षेत्र में जमीन के मालिकाना हक को लेकर डीडीए के साथ चल रहे संघर्ष के बीच बेदखली के डर में जी रहे हैं।

शिविर में रह रही कांति देवी बताती हैं कि वे इन जमीनों पर खेती के लिए मालिकों को पैसे देती हैं लेकिन डीडीए वाले आकर उनके घर और खेत दोनों को तहस-नहस कर देते हैं। वे कहते हैं कि यह जमीन डीडीए की है और वहां रहना और खेती करना दोनों ही अवैध है। “हम समझ नहीं पाते कि इसमें हमारी क्या गलती है। जमीन मालिक की हो या डीडीए की, नुकसान हमारा ही है,” कांति गहरी सांस लेकर कहती हैं।

डूबती उम्मीद के साथ वे कहती हैं कि भले ये लोग उनसे पैसे ले लें लेकिन उन्हें यहीं रहने दें। “हम कई सालों से यहीं रह रहे हैं। हमारे बच्चे यहीं पास के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और हमारे ग्राहक भी इधर ही के हैं। ऐसे में यहां से कहीं और जाने पर हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा,” वे कहती हैं।

क्या है प्रशासन का रुख

इस बारे में डीडीए के अधिकारियों का कहना है कि डीडीए द्वारा किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक यमुना के खादर क्षेत्र वाले ‘जोन O’ की कुल 9,700 हेक्टेयर जमीन में से 7,362.56 हेक्टेयर पर अतिक्रमण किया गया है। अपनी जमीन वापस पाने के लिए डीडीए ने इस साल मई के महीने में मयूर विहार यमुना खादर में 20 एकड़ भूमि को अतिक्रमण से हटाया। यहां खेतों की सिंचाई करने वाले अवैध बोरवेल सील किए गए और 25 झुग्गियों को तोड़ा गया। इतना ही नहीं, उन जमीनों पर गड्ढे भी बना दिये गए, ताकि वहां दोबारा खेती न की जा सके।

दरअसल, यमुना खादर के लगभग 22 किलोमीटर विस्तार की अधिकतर जमीनों पर डीडीए का अधिकार तो है, लेकिन यमुना किनारे बसे गांवों के लोग काफ़ी लंबे से इन जमीनों पर खेती करते आए हैं। साल 2000 के बाद से इलाके में तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण यहां का परिदृश्य बदलने लगा है। पिछले 60 सालों में कई विकास प्रोजेक्ट, जैसे सड़कों, फ्लाइओवर, मेट्रो रेल, पार्क, मंदिरों (जैसे अक्षरधाम मंदिर), कॉमनवेल्थ खेलगांव वगैरह के लिए नदी के आसपास की लगभग 2,000 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है।

हालांकि, अलग-अलग समय पर होने वाले इन अधिग्रहणों के कारण यहां रहने वाले लोगों का जीवन तुरंत प्रभावित नहीं हुआ और, प्रवासी खेतिहर मजदूरों ने बची हुई जमीन में खेती के नई तरीके अपना लिए। लेकिन वर्तमान में यमुना खादर और मयूर विहार फेज एक और दो के निचले इलाकों में स्थितियां अब तेजी से बदल रही हैं।

डीडीए और दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित और पूरी हो चुकी दोनों ही तरह की विकास परियोजनाओं के कारण यमुना खादर की पारिस्थितिकी में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है।

इस इलाके में रहने वाले लोगों को दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है। जहां एक तरफ नदी में बढ़ते जल-स्तर और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से उनका जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, वहीं अब डीडीए और पीडब्ल्यूडी जैसी विभिन्न सरकारी एजेंसियां उनके जीवन की अनिश्चितता को बढ़ा रही है। इलाके में प्रस्तावित विकास प्रोजेक्ट का काम शुरू करने से पहले सरकारी एजेंसियों ने अतिक्रमण को हटाना शुरू कर दिया है।

साल 2021 में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की मिट्टी को ट्रकों में लाकर यहां खाली किया जाने लगा, ताकि जमीन को ऊंचा किया जा सके। यहां हरित क्षेत्र और चार मीटर चौड़ा पैदल पथ प्रस्तावित है।

दिलचस्प बात यह है कि इस इलाके में खेती करने और झुग्गियों में रहने वाले लोगों को भविष्य में होने वाले विकास की जानकारी है, लेकिन वे केवल इतना चाहते हैं कि किसी भी तरह की तोड़-फोड़ और अधिग्रहण से पहले सरकारी एजेंसियां उनके पुनर्वास का इंतजाम करें। इसके लिए कुछ लोगों ने यमुना खादर स्लम यूनियन के बैनर तले डीडीए के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका देकर जमीन अधिग्रहण से पहले पुनर्वास की मांग की है। हालांकि, डीडीए ने कानून का हवाला देते हुए ऐसी किसी भी मांग को खारिज कर दिया है। फिलहाल यह मामला विचाराधीन है।

हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क कार्यकर्ता, देव पटेल कहते हैं कि “हमारी मांग केवल इतनी है कि हमारे घरों को गिराने से पहले हमारे पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। साल 2019 में अजय माकन बनाम भारत संघ पर दिए अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने दिल्ली की एक झुग्गी को गिराने के संदर्भ में यही सुझाव दिया था। आदेश में कहा गया है कि पहले पूरा सर्वेक्षण करना और झुग्गी में रहने वालों से सलाह लेना जरूरी है।” देव का घर भी इसी झुग्गी में है, जहां उन्हें और उनकी पत्नी नीतू को हर पल अपने घर को खोने का डर बना रहता है।

बदलती-बिगड़ती पारिस्थितिकी

यमुना और उसकी जमीन के स्वरूप में आए परिवर्तन से केवल उसके आसपास और उस पर निर्भर रहने वाले लोगों का ही जीवन प्रभावित नहीं हो रहा है, बल्कि इस प्राकृतिक और मानव निर्मित बदलावों का असर यमुना के पूरे पारिस्थितकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। 

यमुना के आसपास के इलाकों में तरह-तरह के पक्षी और पेड़-पौधे पाए जाते हैं। यह नदी हजारों स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का घर रहा है। उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद से ओखला बैराज तक यमुना का 22 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में हजारों प्रवासी पक्षियों के साथ-साथ स्थानीय जलीय पक्षियों का भी बसेरा है। लेकिन यह पूरी प्राकृतिक व्यवस्था अब विभिन्न विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ता दिख रहा है।

डीडीए और दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित और पूरी हो चुकी दोनों ही तरह की विकास परियोजनाओं के कारण यमुना खादर की पारिस्थितिकी में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। लगातार आने वाली बाढ़, शहर में तेजी से बढ़ता प्रदूषण और नदी की जमीन पर हो रहे वैध और अवैध दोनों तरह के निर्माणों का भी इस बदलाव में योगदान है।

नदी क्षेत्र में तेजी से हो रहे अवैध निर्माणों के कारण इसका बहाव बाधित हुआ है। यमुना की 9,700 हेक्टेयर जमीन में अब 3,000 से ज्यादा पक्के मकान बन चुके हैं। इन अवैध बस्तियों के कारण बाढ़ का खतरा और बढ़ गया है।

पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः बहाल करने के प्रयास

यमुना खादर की लगातार बदलती पारिस्थितिकी को फिर से बहाल करने के शुरुआती प्रयास साल 1993 में शुरू किए गये थे। इस प्रयास में न केवल दिल्ली को, बल्कि नदी के उत्तर प्रदेश और हरियाणा वाले हिस्से को भी शामिल किया गया था, जिसमें कुल 21 शहर शामिल थे।

इसके बाद यमुना के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर साल 2012, 2015, 2018 से 2021 में अलग-अलग चरणों में लाखों-करोड़ की लागत वाले कई काम कराए गए। उदाहरण के लिए उत्तरी दिल्ली के वज़ीराबाद में 457 एकड़ का प्राकृतिक अभयारण्य बनाया गया है। कभी बंजर रही इस भूमि पर अब आर्द्रभूमि और जंगल हैं, जिनमें 1500 से अधिक पौधे, कीड़े, पक्षी, मछलियां और स्तनपायी प्रजातियां निवास करती हैं।

इसके अलावा, राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 2015 से दिल्ली में यमुना के बाढ़ के मैदानों में नदी के पानी के साफ़ होने तक सभी कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। एनजीटी का कहना था कि तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण के कारण नदी का पानी विषैला हो गया है। नतीजतन, यहां उगाई जाने वाली सब्जियां और फल खाने लायक नहीं हैं और इसे खाने से लोगों के स्वास्थ्य को खतरा है। अपने इस दावे के लिए ट्रिब्युनल ने नेशनल एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट के रिपोर्ट का हवाला दिया है जिसके अनुसार यमुना खादर में उगाई जाने वाली सब्जियों में सीसे (लेड) की उच्च मात्रा की मौजूदगी का पता चलता है।

यमुना को लेकर यहां के प्रवासी खेतिहर मजदूर, जमीन मालिक और डीडीए – तीनों अपने-अपने दावों और अधिकारों के साथ खड़े हैं

हालांकि, वॉटर सीकर्स फेलोशिप की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां सब्जियां उगाने वाले किसान पूसा रिपोर्ट के हवाले से इस दावे को गलत बताते हैं। रिपोर्ट कहती है कि एक ओर यह पता लगाना मुश्किल है कि ट्रिब्यूनल और पूसा के दावों में से कौन सही है, दूसरी ओर ट्रिब्यूनल के फैसले के कारण जनधारणा इन किसानों के खिलाफ़ हुई है। साथ ही, इसने डीडीए को इन्हें उजाड़ने की खुली छूट दे दी है।

डीडीए की परियोजना से नदी और जनता को कितना फ़ायदा होगा, इस पर फ़ैलोशिप रिपोर्ट यमुना के पश्चिमी तट पर लाल किले के पीछे बने सिल्वर जुबिली पार्क की केस स्टडी पेश करती है। परियोजना के पहले चरण में साल 2013-14 में बने इस पार्क की हालत यह है कि आस-पास के लोग तक इसके बारे में नहीं जानते। इसके अलावा यहां तक पहुंचने और यहां से निकलने के लिए हाइवे तक पैदल चलकर आने के अलावा कोई सुविधा नहीं है।

पारिस्थितिकी पर इसके असर और लोगों को मिली सुविधा की बात करें, तो मानसून के समय पार्क पूरी तरह पानी में डूब जाता है। इसके बीचों-बीच दिल्ली के 22 बड़े नालों में से एक नाला बहता है, जिसे लोगों की नजर से बचाने के लिए बैरीकेड किया गया है। जहां यह नाला नदी में मिलता है, वहां चारों ओर गंदा पानी और ठोस कचरे का अंबार दिखाई देता है। रिपोर्ट कहती है कि रिवरफ्रंट जैसी परियोजना को नदी के स्वच्छता कार्यक्रम के साथ एकीकृत किए जाने की ज़रूरत है।

इस साल के मई महीने में पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश शर्मा ने कहा कि अब तक यमुना खादर की पारिस्थितिकी को बहाल करने के लिए अलग-अलग विकास परियोजनाएं लागू की गईं, लेकिन अब उन्होंने डीडीए से कहा है कि इन सभी परियोजनाओं को एकीकृत करके खंडों में विकसित किया जाए। इसके तहत, यमुना के किनारे 122 किलोमीटर लंबे पैदल पथ यानी रिवरफ्रंट का निर्माण किया जाएगा। इसके निर्माण में पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा और यह आमजन के उपयोग के लिए उपलब्ध होगा।

लेकिन, जल एवं पर्यावरण कार्यकर्ता दीवान सिंह का कहना है कि नदी तट क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण से नदी के बहाव का रास्ता प्रभावित होता है। इन परियोजनाओं के एकीकरण के दौरान नदी की जमीन पर किसी भी प्रकार के भारी मशीनों और कंक्रीटीकरण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से नदी तट की मिट्टी और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचेगा।

वे कहते हैं, “अगर केवल नदी तट पर मौजूद हानिकारक प्रजातियों को हटा दिया जाए और मिट्टी को उसके हाल पर छोड़ दें तो वह खुद अपनी मूल प्रकृति में वापस लौट जाएगी।” इसके अलावा, वे इस रिवरफ्रंट के सौंदर्यीकरण के लिए कृत्रिम प्रजाति की घासों की बजाय देशी नदी घास के उपयोग और ‘ओ’ जोन के रीचार्ज को प्राथमिकता देने का भी सुझाव देते हैं।

रिवरफ्रंट के निर्माण में कंक्रीट, सीमेंट, पत्थर और ईंटों का प्रयोग होता है और नदी तट का प्राकृतिक बहाव प्रभावित होता है। नदी के कंक्रीटीकरण के नाम पर नदियों की चौड़ाई कम हो जाती है और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है।

रिवरफ्रंट जैसी विकास परियोजनाओं का स्वरूप और ढांचा प्राकृतिक नहीं होता है। इससे, नदी की जैव-विविधता खत्म होती है और इस पर निर्भर जीवों का जीवन प्रभावित होता है। दृष्टि फाउंडेशन ट्रस्ट के फाउंडर दिनेश कुमार गौतम इस बारे में कहते हैं कि नदी के तट कच्चे ही होने चाहिए। अगर उनका कंक्रीटीकरण हो जाएगा, तो वहां के जलीय-जीव, पेड़-पौधे व जैव विविधता पर भी उसका असर होगा। देश के विभिन्न शहरों में नदी किनारे बने इसी तरह के रिवरफ्रंट के निर्माण से इस बात की पुष्टि की जा सकती है। महाराष्ट्र के पुणे में बन रहे 44 किलोमीटर लंबे रिवरफ्रंट का विरोध करने वालों का तर्क भी यही है।

नदी की पारिस्थितिकी और नागरिकों के हित, दोनों साधने की जरूरत

यमुना का भविष्य केवल एक नदी का भविष्य नहीं है। यह दिल्ली के सतत विकास, पारिस्थितिक संतुलन के साथ ही सामाजिक न्याय का भी सवाल है। यमुना रिवरफ्रंट को लेकर पीडब्ल्यूडी और डीडीए की एकीकृत परियोजना में यमुना खादर के इलाकों में रह रहे लोगों के भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति दिखाई नहीं पड़ती है। ऐसे में यह कहा पाना मुश्किल है कि रिवरफ्रंट और नेचर पार्क जैसी परियोजनाओं का यमुना की पारिस्थितिकी पर क्या और कितना असर पड़ेगा।

यमुना को लेकर यहां के प्रवासी खेतिहर मजदूर, जमीन मालिक और डीडीए – तीनों अपने-अपने दावों और अधिकारों के साथ खड़े हैं, लेकिन सबसे अधिक मार उन लोगों पर पड़ती है जो अपनी मेहनत से इस खादर पर शहर के लिए अनाज, फूल और सब्जियां उगाते हैं।

उनके सामने एक तरफ़ नदी की प्राकृतिक मार है, तो दूसरी तरफ तथाकथित जमीन मालिकों और प्रशासन की कठोरता। प्रशासन के कामों से नदी की स्थिति में कितना सुधार आएगा, यह कहना तो अभी मुश्किल है पर इससे इन प्रवासी परिवारों के सामने बच्चों की शिक्षा, रोजगार और आवास का संकट गहराता जा रहा है।

ऐसे में जरूरी है कि नदी की पारिस्थितिकी की समग्रता को केंद्र में रखकर बनाए गए विकास मॉडल बनाया जाए। नदी के प्राकृतिक स्वरूप को नष्ट करने के बजाय, उसे पुनर्जीवित करने के प्रयासों पर काम किया जाए। साथ ही, यमुना खादर में रहने और खेती करने वाले समुदायों को पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा की ठोस गारंटी दी जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यमुना रिवरफ्रंट जैसी परियोजनाओं को विकास के मॉडल के बदले ‘विस्थापन की त्रासदी’ का प्रतीक बनने में देर नहीं लगेगी।

यह लेख मूलरूप से इंडिया वॉटर पोर्टल हिंदी पर प्रकाशित हुआ था।

कन्नौज: जलवायु संकट से घिरी इत्र नगरी

उत्तर प्रदेश राजधानी लखनऊ से लगभग 130 क‍िलोमीटर दूर बसा ज‍िला कन्‍नौज इत्र नगरी के नाम से पूरी दुन‍िया में जाना जाता है। कई दशकों से इस शहर में फूलों से बने शुद्ध इत्र का व्यापार होता आ रहा है। इत्र बनाने की परम्परा यहां सदियों से चली आ रही है, जिसके चलते ही इसे भारत की इत्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि यहां क‍ि म‍िट्टी में भी इत्र की खुशबू है। लेकिन प‍िछले कुछ वर्षों से खुशबू का ये व्‍यापार भी बदलते मौसम की मार झेल रहा है।

सुगंध एवं सुरस व‍िकास केंद्र के डायरेक्‍टर विनय शुक्ला भी मानते हैं कि हाल के वर्षों ज्‍यादा गर्मी की वजह से कन्‍नौज में फूलों का उत्‍पादन कम हुआ है। कन्‍नौज में लगभग 25 क‍िलोमीटर क्षेत्र में फूलों की खेती है और इत्र के कारोबार से प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से लगभग एक लाख लोगों को रोजगार म‍िला है। सुगंध एवं सुरस व‍िकास केंद्र के अनुसार कन्‍नौज के इत्र का सालाना कारोबार लगभग 400 करोड़ रुपए का है और 693 गांवों के 1,687 इत्र कारखाना में इत्र बनाने का काम होता है।

बढ़ते तापमान की वजह से फूलों की खेती प्रभाव‍ित हो रही है। कन्‍नौज में फूलों की खेती करने वाले क‍िसानों ने बताया कि ज्‍यादा गर्मी की वजह से फूलों का उत्‍पादन प्रभाव‍ित हो रहा है। इसका सीधा असर इत्र के उत्‍पादन और व्‍यापार पर पड़ रहा। “उत्‍पादन ग‍िर रहा। इस साल जून में तापमान इतना ज्‍यादा था कि जहां 10 किलो फूल न‍िकलता था, वहां मुश्‍किल से एक क‍िलो फूल न‍िकल पाया, और प‍िछले कुछ वर्षों से हो रहा।” कन्‍नौज में लगभग 4 बीघा खेत में बेला और मोगरा की खेती करने वाले युवा किसान ह‍िमांचल बताते हैं। इत्र के व्‍यापारी मोहम्‍मद अयाज कहते हैं कि हाल के वर्षों में ज्‍यादा तापमान की वजह से फूलों की खेती प्रभाव‍ित हुई है ज‍िसका असर उनके व्‍यापार पर पड़ा है। “ज्‍यादा तापमान की वजह से फूलों का उत्‍पादन लगातार कम हुआ है। ऐसे में कई बार ऑर्डर होने के बावजूद वे सप्‍लाई नहीं कर पाते। ये द‍िक्‍कत हाल के वर्षों में ज्‍यादा बढ़ी है।” अयाज बताते हैं।

यह लेख मूलरूप से इंडिया स्पेंड पर प्रकाशित हुआ था।

जुगनू: रेड लाइट एरिया में पली पीढ़ी की निराली मैगजीन

चार पन्नों की फोटोकॉपी से शुरू हुआ ‘जुगनू’ अखबार आज 36 पेज की एक मैगजीन बन गया है। इसे बिहार के रेड लाइट एरिया में जन्मीं नसीमा खातून ने देश के अलग-अलग राज्यों के रेड लाइट एरिया में जन्मे बच्चों की मदद से बनाना शुरू किया था। सुनिए, मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज इलाके में रहने वाली नसीमा खातून से कि उन्होंने क्यों जुगनू की शुरुआत की? जानिए इसमें रेडलाइट इलाके में जन्मे बच्चे किस तरह की कहानियां लिखते हैं? और, यह मैगजीन इस इलाके के बच्चों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

यह वीडियो मूलरूप से यूट्यूब के शेड्स ऑफ रूरल इंडिया पर प्रकाशित हुआ था।

12A और 80G: समय पर नवीनीकरण, सहयोग का भरोसा

भारत में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए टैक्स संबंधी नियमों का पालन करना न केवल उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि फंडिंग अवसरों की दृष्टि से भी यह एक बेहद अहम प्रक्रिया है। इस संदर्भ में आयकर अधिनियम के दो प्रमुख पंजीकरण, सेक्शन 12A और सेक्शन 80G, विशेष महत्व रखते हैं।

सेक्शन 12A एक संगठन को आय पर टैक्स से छूट प्रदान करता है। वहीं 80G दानकर्ताओं को पात्र एनजीओ को किए गए दान पर टैक्स कटौती का लाभ उठाने की सुविधा देता है। इसके अलावा, 12A और 80G पंजीकरण अन्य कानूनी ढांचों, जैसे कि कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर), के लिए भी आवश्यक दस्तावेज माने जाते हैं।

हाल ही में हुए संशोधनों के अनुसार, अब हर पांच वर्ष में इन दोनों पंजीकरणों का नवीनीकरण कराना अनिवार्य है। इसके साथ ही, वित्त विधेयक 2025 के प्रावधानों के अनुसार भविष्य में नवीनीकरण की पांच या दस वर्षों की अवधि संगठन की बीते दो सालों की आय पर निर्भर होगी। इन पंजीकरणों को नियमित बनाए रखना संगठनों को न केवल निरंतर टैक्स लाभ उपलब्ध कराता है, बल्कि उन्हें दानदाताओं के सहयोग के लिए योग्य भी बनाए रखता है।

इस लेख में हम 12A और 80G के नवीनीकरण की प्रक्रिया, समय-सीमा, और अनुपालन संबंधी सुझावों को विस्तार से समझेंगे, ताकि आपका एनजीओ सुचारू रूप से इनका पालन कर सके।

नवीनीकरण के लिए किसे आवेदन करना जरूरी है?

सभी धार्मिक और परोपकारी संगठन (एनजीओ, ट्रस्ट, सोसाइटी और सेक्शन 8 कंपनियां) जो पहले से ही आयकर अधिनियम के सेक्शन 12A और/या सेक्शन 80G के अंतर्गत पंजीकृत हैं, उन्हें आयकर विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार अपने पंजीकरण का नवीनीकरण कराना अनिवार्य है।

इन पर लागू:

12A/80G नवीनीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?

12A/80G नवीनीकरण के लिए आवेदन की समय-सीमा क्या है?

मौजूदा ट्रस्टों के लिए 12A/80G नवीनीकरण का आवेदन प्रमाणपत्र की वैधता समाप्त होने से कम-से-कम 6 महीने पहले करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, यदि किसी ट्रस्ट के 12A प्रमाणपत्र में वैधता अवधि आकलन वर्ष (एसेसमेंट ईयर) 2022-23 से 2026-27 तक दी गई है, तो इसका अर्थ है कि प्रमाणपत्र 31/03/2026 को समाप्त हो जाएगा। ऐसे में, नवीनीकरण हेतु आवेदन 30/09/2025 या उससे पहले दाखिल करना होगा।

निर्धारित समय-सीमा में नवीनीकरण न होने के परिणाम

किसी भी एनजीओ के लिए 12A और 80G का समय पर नवीनीकरण करना बहुत जरूरी है। यदि वे इससे चूकते हैं, तो इसके गंभीर वित्तीय और निजी परिणाम हो सकते हैं:

नवीनीकरण के बाद प्रमाणपत्र कितने समय के लिए मान्य रहेगा?

जब कोई ट्रस्ट या संस्था अपना 12A प्रमाणपत्र नवीनीकृत कराती है, तो उसकी सामान्य वैधता 5 वर्ष होती है। लेकिन यदि आवेदन करने से पहले के पिछले दो वित्तीय वर्षों में संस्था की कुल आय (सेक्शन 11 और 12 के अंतर्गत छूट का दावा करने से पहले की आय) प्रत्येक वर्ष 5 करोड़ रुपये या उससे कम रही हो, तो प्रमाणपत्र की वैधता 10 वर्ष तक मानी जाएगी।

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वित्त विधेयक 2025 में सेक्शन 12A पंजीकरण की वैधता अवधि को संशोधित किया गया है। | चित्र साभार: पिक्सल्स

उदाहरण के लिए, मान लीजिए आपका प्रमाणपत्र आकलन वर्ष 2027–28 से 2031–32 तक मान्य है (यानी यह 31 मार्च 2031 को समाप्त होगा)। ऐसे में आपको नवीनीकरण के लिए 30 सितम्बर 2030 (वित्तीय वर्ष 2030–31 में) तक आवेदन करना होगा। इस स्थिति में, आयकर विभाग वित्तीय वर्ष 2028–29 और 2029–30 की आय की जांच करेगा।

यदि इन दोनों में से किसी भी वर्ष में आपकी आय 5 करोड़ रुपये से अधिक हुई, तो नवीनीकृत प्रमाणपत्र की वैधता केवल 5 वर्ष होगी। लेकिन यदि दोनों वर्षों में आपकी आय 5 करोड़ रुपये या उससे कम रही, तो नवीनीकृत प्रमाणपत्र की वैधता 10 वर्ष होगी।

महत्वपूर्ण नोट:

12A की बढ़ी हुई वैधता कब लागू होती है?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जिन संस्थाओं का 12A पंजीकरण पहले से चल रहा है, वे अपनी पिछली वित्तीय आय-सीमा (थ्रेशहोल्ड) के आधार पर 10 वर्ष की वैधता के लिए पहले से ही योग्य हो सकती हैं। लेकिन अभी तक न तो कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया गया है और न ही प्रमाणपत्रों में यह बदलाव दिख रहा है। इसी वजह से इस विषय पर अभी व्याख्या से जुड़े सवाल बने हुए हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि प्रमाणपत्रों में वैधता अवधि अभी भी 5 वर्ष ही लिखी जा रही है और संस्था को, उसकी पिछली आय कुछ भी रही हो, 30.09.2025 से पहले आवेदन करना अनिवार्य हो सकता है।

नवीनीकरण के बाद 80G की वैधता की स्थिति:

भले ही वित्त विधेयक 2025 में सेक्शन 12A पंजीकरण की वैधता अवधि को संशोधित किया गया है (यानि पिछली आय-सीमा के आधार पर अब यह 5 वर्ष या 10 वर्ष हो सकती है), लेकिन ऐसा कोई संशोधन अभी तक 80G पंजीकरणों के लिए नहीं किया गया है। इसलिए जब तक कोई नया प्रावधान या आधिकारिक आदेश नहीं आता, 80G पंजीकरण की वैधता अवधि को 5 वर्ष ही समझा जा सकता है, जैसा कि मौजूदा पंजीकरण प्रमाणपत्रों में लिखा है।

यह एक ऐसा विषय है, जहां आधिकारिक दिशा-निर्देश पर अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।

क्या इसके लिए कोई निर्धारित फॉर्म और चेकलिस्ट है?

जो ट्रस्ट पहले से धारा 12AB के अंतर्गत पंजीकृत हैं और अब नवीनीकरण हेतु पात्र हैं, उनके लिए 10AB निर्धारित फॉर्म है। इस फॉर्म के अनुसार आवेदन करते समय आवश्यक दस्तावेजों की एक सूची यह है।

12A/80G नवीनीकरण के लिए आवेदन की प्रक्रिया क्या है?

किसी भी धार्मिक या परोपकारी ट्रस्ट या संस्था, जिसमें एनजीओ भी शामिल हैं, को टैक्स छूट का लाभ जारी रखने के लिए प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त या आयकर आयुक्त के समक्ष ऑनलाइन आवेदन करना आवश्यक है। यह आवेदन फॉर्म 10AB के माध्यम से किया जाता है। नवीनीकरण/पुनर्पंजीकरण की प्रक्रिया निम्न प्रकार है:

चरण 1: आयकर विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल में लॉग-इन करें।

चरण 2: ई-फाइल टैब में जाकर इनकम टैक्स फॉर्म्स का विकल्प चुनें।

चरण 3: फॉर्म के नाम में Form 10AB चुनें और ड्रॉप-डाउन सूची से संबंधित आकलन वर्ष का चयन करें।

चरण 4: सबमिशन मोड में प्रिपेयर एंड सबमिट ऑनलाइन का विकल्प चुनें।

चरण 5: फॉर्म में मांगी गई सभी जानकारियां भरें और जरूरी संलग्नक (अटैचमेंट) अपलोड करें।

चरण 6: फॉर्म को ईवीसी या डिजिटल सिग्नेचर के माध्यम से सबमिट करें, जैसा कि रिटर्न फाइलिंग के दौरान आवश्यक होता है।

आवेदन से पहले किन बातों का ध्यान रखें?

फॉर्म 10AB में मांगे गए दस्ताजों के अलावा, संगठन पहले से ही सभी जरूरी दस्तावेजों की सूची तैयार रखें या आवेदन करने से पहले अपनी तैयारी का आकलन कर लें। यह एक सलाह है, क्योंकि यदि कभी विभाग की ओर से कोई नोटिस जारी होता है, तो इसी प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने की अपेक्षा की जा सकती है।

इसके अतिरिक्त, नियम 17AA का पालन करना अनिवार्य है। आयकर नियम, 1962 के अंतर्गत यह नियम परोपकारी संगठनों (जैसे ट्रस्ट, विश्वविद्यालय, अस्पताल और अन्य संस्थाएं) पर लागू होता है। इसके अनुसार उन्हें अपनी आय, योगदान और व्यय का सही और पारदर्शी लेखा-जोखा रखने के लिए पूरा बही-खाता और संबंधित दस्तावेज अपने पास रखना आवश्यक है। यह अनुपालन विशेष रूप से धारा 10(23C) और धारा 12A के तहत जरूरी है, ताकि पारदर्शिता और उचित वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित हो सके।

नवीनीकरण के दौरान ध्यान रखने योग्य अन्य महत्वपूर्ण बातें

निष्कर्ष

नवीनीकरण की जटिलताओं को सही तरीके से समझना और उनका पालन करना किसी भी गैर-लाभकारी संस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है, ताकि वह कानूनी अनुपालन सुनिश्चित कर सके और टैक्स संबंधी लाभ प्राप्त कर सके। चूंकि नियमों में लगातार बदलाव होते रहते हैं और दस्तावेजी जरूरतें भी लंबी-चौड़ी होती हैं, इसलिए आम गलतियों से बचना और समय-सीमा में यह काम पूरा करना करना बेहद अहम है।

यह लेख मूलरूप से आरिया एडवाइजरी पर अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं। 

नेताओं और अफसरशाही को आईना दिखाता अंगिका भाषा का लोकगीत

जन जागरण शक्ति संगठन, एक पंजीकृत ट्रेड यूनियन है और यह बिहार के अररिया, कटिहार और सहरसा जिलों में सक्रिय है। संगठन द्वारा बनाया गया यह व्यंग्यात्मक लोकगीत समाज की जड़ में व्याप्त भ्रष्टाचार और शोषण को उजागर करता है। सरल, लेकिन शक्तिशाली रूपकों के जरिए इस गीत में भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की तुलना बिल्ली (बिलार) और सियार (गीदड़) से की गयी है।

जन संगठनों की गीत-संगीत के प्रयोग की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने वाला यह गीत, बड़ी सहजता से यह कह जाता है कि जिन्हें लोगों की सुरक्षा और नेतृत्व करना था, वे ही उनके शोषक बन गए हैं। अंगिका भाषा का यह गीत ग्रामीण जीवन की कठोर वास्तविकताओं को भी सामने रखता है और प्रभावशाली वर्ग और उनकी एकतरफा नीतियों की तीखी आलोचना करता है। आलोचनाओं से इतर, इस गीत का अपना एक विनोदी मिजाज है, जो ध्यान खींच लेने वाली लोक धुन के साथ तीखे शब्दों को बड़ी सहजता से समेट लेता है।

यह गीत मूल रूप से गीत और गाथा यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित किया गया है।