मेरे कॉलेज तक पहुंचने की कीमत सौ रुपये है

मैं लखनऊ जिले के मवैया इलाके की सिंगर नगर कॉलोनी में रहती हूं, जो एक अनौपचारिक बस्ती है। मेरा कॉलेज भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय, घर से लगभग सात किलोमीटर दूर है। यह दूरी सुनने में कम लगती है, लेकिन मेरे लिए यह हर दिन पैसों का हिसाब लगाने और सुरक्षित लौटने की चिंता से जुड़ी होती है।

करीब 11 बजे मैं घर से निकलती हूं। पहले एक किलोमीटर पैदल चलकर मोहैया पहुंचती हूं। वहां से चार किलोमीटर के लिए चारबाग जाने वाला साझा ऑटो पकड़ती हूं। ऑटो इतना भरा होता है कि कई बार ठीक से खड़ा होना भी मुश्किल होता है, फिर भी मैं वही लेती हूं क्योंकि ई-रिक्शा का किराया महंगा पड़ता है। चारबाग से मुझे दूसरा ऑटो लेना पड़ता है, जो आखिरी तीन किलोमीटर तय कराकर मुझे कॉलेज पहुंचा देता है। पूरे सफर में लगभग एक घंटा लग जाता है और एक तरफ का खर्च करीब सौ रुपये होता है। अगर कभी निजी ऑटो लेना पड़े तो यही सफर दो सौ से ढाई सौ रुपये में पड़ जाता है। इस रास्ते पर बस नहीं चलती, जबकि बस होती तो केवल बाईस रुपये में सफर हो सकता था।

मेरे लिए रोज इतना खर्च करना संभव नहीं है। इसलिए मैं हफ्ते में सिर्फ दो या तीन दिन ही कॉलेज जा पाती हूं। इसका असर मेरी पढ़ाई पर साफ दिखाई देता है। कई बार परीक्षा पास करने के लिए मुझे विषय रटकर याद करना पड़ता है, जबकि संगीत जैसे विषय में समझ और अभ्यास ज्यादा जरूरी होते हैं। हर सेमेस्टर कॉलेज से कम हाजिरी को लेकर घर पर नोटिस आ जाता है। लेकिन परीक्षा के समय कोई विकल्प नहीं होता और तब मुझे लगभग रोज कॉलेज जाना पड़ता है।

पैसों के साथ-साथ सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता है। मेरी कक्षाएं अक्सर शाम चार बजे तक चलती हैं। मेरी बस्ती में सड़क पर रोशनी की ठीक व्यवस्था नहीं है, इसलिए अंधेरा होने से पहले घर पहुंचना जरूरी हो जाता है। अगर कभी देर हो जाए तो घर में सब परेशान हो जाते हैं। कई बार मेरी मां मुझे ढूंढने बाहर भी निकल जाती हैं।

दोस्तों के साथ थोड़ा समय बिताना भी मुश्किल हो जाता है। कॉलेज के बाद रुक पाना मेरे लिए आसान नहीं है और इसका असर मेरी सामाजिक जिंदगी पर भी पड़ा है।

इलाके में कुछ महिला ऑटो चालक हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। मेरे घर से लगभग दो किलोमीटर दूर एक मेट्रो स्टेशन भी है, लेकिन वहां से कॉलेज तक सीधा रास्ता नहीं है। इसके अलावा स्टेशन अक्सर खाली रहते हैं, इसलिए वहां जाना सुरक्षित महसूस नहीं होता। इन परेशानियों से जूझने वाली मैं अकेली नहीं हूं। मेरे कॉलेज के कई छात्र अलग-अलग इलाकों से आते हैं और उन्हें भी ऐसी ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कॉलेज की तरफ से कोई परिवहन सुविधा नहीं दी जाती।

इन सारी मुश्किलों के बावजूद मैं पढ़ाई जारी रखना चाहती हूं और आगे चलकर संगीत की शिक्षिका बनना चाहती हूं। यह मेरा अंतिम वर्ष है और आगे मैं इसी कॉलेज में तबला सीखने की योजना भी बना रही हूं। मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा सा संगीत समूह बनाया है। हम मिलकर रैप गीत भी तैयार करते हैं। उनमें से एक गीत इसी आने-जाने की परेशानी पर आधारित है। लेकिन हर सपने के साथ वही सवाल जुड़ा रहता है कि सफर में कितना समय लगेगा, कितना पैसा खर्च होगा, रास्ता कितना सुरक्षित होगा और क्या मैं अंधेरा होने से पहले घर पहुंच पाऊंगी।

ज्योति ठाकुर लखनऊ में संगीत की अंतिम वर्ष की छात्रा हैं और द क्लाइमेट एजेंडा के साथ एक स्वयंसेवक के रूप में जुड़ी हुई हैं।

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अधिक जानें: उत्तराखंड के गांवों में लोग बेहतर सड़कें और परिवहन सुविधाएं चाहते हैं।

बैगा समुदाय: जंगल हमारे बिना नहीं, हम जंगल के बिना नहीं

जंगल में दो लोग दिखाई दे रहे हैं, जिनमें एक खड़ा है और दूसरा ज़मीन पर बैठा हुआ है_बैगा
एक जगह कुछ साल खेती कर, फिर दूसरी जगह चला जाता था ताकि जंगल खुद को दोबारा तैयार कर सकें। | चित्र साभार: चंद्र प्रताप सिंह

छत्तीसगढ़ के जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) में आने वाला समुदाय बैगा रहता है। यह समुदाय मुख्य रूप से गौरेला ब्लॉक की 13 ग्राम पंचायतों के 19 गांवों (टोला/पारा) में रहत है। बैगा लोगों के जीवन का आधार जंगल है। जंगल से वे पारंपरिक खेती, जड़ी-बूटी, लकड़ी, फल, शाक-सब्जियां और अन्य संसाधन हासिल करते हैं। बैगा जनजाति को वर्ष 2023 में वन अधिकार अधिनियम 2006 के धारा 3(1)(e) के तहत पर्यावास अधिकार (हैबिटेट राइट्स) मिले थे। 

यहां के 19 गांवों ने मिलकर वन अधिकार अधिनियम के प्रति जागरूकता पर काम करने वाले संगठन नव निर्माण चेतना मंच के साथ पर्यावास अधिकारों के लिए काम किया। ये अधिकार पीवीटीजी (विशेष संरक्षित बैगा जनजाति) को उनकी पारंपरिक भूमि पर स्वामित्व, इस्तेमाल और सांस्कृतिक संरक्षण का अधिकार प्रदान करते हैं।

अधिकार पत्र मिलने के बाद समुदाय के लोग जंगल और उसकी संरचना को और बेहतर बनाने में क्या योगदान दे सकते हैं, इसके लिए पांच गांव के लोगों ने मिलकर जंगलों के संसाधनों का दस्तावेजीकरण एवं प्रबंधन करना शुरू किया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करना और यह समझना था कि पिछले वर्षों में जंगल में क्या बदलाव आए हैं। इस तरह समुदाय के लोगों ने साथ मिलकर रिसोर्स मैपिंग करनी शुरू की। 

गांव वालों ने इलाकों को चालीस-बाई-चालीस मीटर के प्लॉट में बांटकर नक्शा बनाया। समुदाय में इलाकों का नाम रखने का एक पारंपरिक तरीका है। उदाहरण के लिए, जिस इलाके में भालू अक्सर आता है, उसे भालूमारा कहा जाता है। इस तरह, समुदाय आसानी से पहचान पाता है कि किन जगहों का नक्शा तैयार है। वन विभाग के कंपार्टमेंट नंबर की जगह लोग पारंपरिक नामों से जगह की पहचान रखते है। 

इसके साथ ही, संरक्षण और प्रबंधन करते हुए हमने जाना कि किस मौसम में कौन सी दाल, भाजी या जड़ी-बूटी आज भी मिलती है। जलवायु परिवर्तन और कम बारिश के कारण दालों की कुछ किस्में लुप्त होती जा रही हैं। समुदाय पारंपरिक रूप से बेवर (स्थानांतरित खेती) करता रहा है। एक जगह कुछ साल खेती कर, फिर दूसरी जगह चला जाता था ताकि जंगल खुद को दोबारा तैयार कर सके। आज यह परंपरा पहले की तरह प्रचलित नहीं है, जिसका असर चीजों की ऊपज पर देखा गया है।

अब बहुत से पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी कम हुए हैं। रिसोर्स मैपिंग के दौरान ही पाया गया कि जैसे पहले अरहर दाल ही पांच तरह की मिलती थी जो अब कम हो गई है। इसी तरह डोड्डे भाजी जो ठंड के दौरान लोग इकट्ठा करते है और गर्मी के दिनों में शरीर को ठंडा रखने के लिए खाते है, वह भी कम ही मिल पाती है। बहुत से बड़े पौधे कम हो गए हैं। साल के पेड़ों की संख्या ज्यादा है, लेकिन गुज्जा, सेझा और धावा कम है। तीन पनिया, गौठेर, दूधिया, चिरायता, हसियादेबो, गुल सीकरी, बड़का दवाई (खून की कमी दूर होने की दवाई) जैसी जड़ी-बूटियां अभी भी देखने को नहीं मिल रही है। 

हमारे द्वारा किए जा रहे प्रबंधन से हमने ये भी देखा है कि छोटे-छोटे बहुत से पौधे आ गए है। जैसे बहरी (झाडू बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पौधा) अब मिल रही है। जंगल में लगने वाली आग की घटनाएं कम हुई है क्योंकि हर व्यक्ति जंगल की निगरानी को अपनी जिम्मेदारी समझता है।

जंगल के प्रबंधन और समुदाय के लोगों के बीच होने वाली चर्चा से यह बदलाव आया है कि कौन सी चीजें कितनी है, उनका पता चला है। पहले हम लोग बस चीजों को ले आते थे। अब जंगल से हर चीज को जरूरत के हिसाब से ही लिया जाता है। विलुप्त की कगार पर जो चीजें है उनकी जानकारी सब तक पहुंची है। उसके बाद से लोग अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सजग होकर काम करने लगे हैं। 

इससे हमें यह दस्तावेजीकरण करने में भी मदद मिलती है कि समुदाय सांस्कृतिक रूप से इकोलॉजिकल बैलेंस बनाए रखता है। बैगा समुदाय की संस्कृति में क्लान (गोत्र) की अहम भूमिका है। हर क्लान का रिश्ता किसी न किसी जीव, पक्षी या पौधे से जुड़ा होता है। जैसे कोर्चो बैगा जनजाति में एक गोत्र है जो करील यानी बांस की कोपल (बैम्बू शूट) को नहीं खाता है लेकिन दूसरी जाति के लोग खा सकते हैं। ऐसे ही खोहडिया गोत्र के लोग कछुआ नहीं खाते है। 

सरंक्षण और प्रबंधन के इस काम काम को महिला और पुरुष मिलकर कर रहे हैं। दिन में विशेष रूप से महिलाएं कोर कमेटी के काम को भी संभालती है। समुदाय में ये धारणा मजबूत हुई है कि जंगल हमारे बिना नहीं है और हम जंगल के बिना नहीं है।

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अधिक जानेंः पढ़ें, जंगलों और खेतों के बीच अपना अस्तित्व तलाशता बैगा समुदाय।

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क्या होता है जब शिक्षक बच्चों के संकेतों को पढ़ने लगते हैं?

एक महिला दीवार से लगे चार्ट में कुछ इंगित करती हुई_ शिक्षक
मैंने ड्रॉइंग को केवल कला तक सीमित न रखकर भाषा और गिनती से जोड़ा, कहानी सुनने के बाद बच्चे चित्र बनाते और वस्तुओं की पहचान रंगों के जरिए करते। | चित्र साभार: नाजिया परवीन

मेरा नाम नाजिया है, मैं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल से एमए एजुकेशन की पढ़ाई कर रही हूं। मेरा कार्यक्षेत्र प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, बाल विकास और आंगनवाड़ी केंद्रों के अध्ययन से जुड़ा है। अपने फील्ड वर्क के दौरान मुझे आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों के साथ काम करना होता है। फील्ड वर्क में मेरी रोज की कक्षा में गिनती, कविता और चित्र बनाने जैसी गतिविधियां तय समय और तय ढांचे में चलती थीं। ज्यादातर बच्चे उस लय में ढल जाते थे, लेकिन एक बच्चा लगातार उस व्यवस्था से बाहर दिखाई देता था। वह बैठकर काम नहीं कर पाता था, बार-बार अपनी जगह छोड़ देता, चीजों को छूता, कभी रोता तो कभी दूसरे बच्चों से उलझ जाता। शुरू में यह व्यवहार अव्यवस्था जैसा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि यह केवल अनुशासन की समस्या नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया और बच्चे की जरूरतों के बीच मौजूद एक गहरा अंतर है।

हमारी कक्षा में बच्चों को स्थिर बैठना होता था और निर्देश सुनकर, काम करना या उन्हें दोहराना होता था। यह बच्चा सीखना चाहता था, बस उस तरीके से नहीं, जैसा हम तय कर चुके थे। जब भी कोई गतिविधि शरीर की हरकत से जुड़ी होती, जैसे एक्शन राइम या छोटा खेल, वह तुरंत सक्रिय हो जाता था।उसका ध्यान अन्य चीजों में भटकता नहीं था बल्कि इन गतिविधियों में केंद्रित हो जाता था। इसी तरह, जब उसे रंग और कागज मिलते तो वह अप्रत्याशित रूप से शांत और केंद्रित हो जाता। इन संकेतों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि शायद समस्या बच्चे की क्षमता में नहीं, बल्कि हमारी शिक्षण संरचना में है।

मैंने अपनी योजना पर दोबारा काम शुरू किया। कक्षा की शुरुआत अब सीधे बैठकर पढ़ने से नहीं होती थी, बल्कि चलने-फिरने, तालियों और छोटे खेलों से होती थी। यह बदलाव केवल उस बच्चे के लिए नहीं था, बल्कि पूरी कक्षा के लिए था। शरीर सक्रिय होने के बाद बच्चे स्वाभाविक रूप से सुनने और ध्यान लगाने के लिए तैयार दिखने लगे। ड्रॉइंग को मैंने केवल कला तक सीमित न रखकर भाषा और गिनती से जोड़ा। कहानी सुनने के बाद बच्चे चित्र बनाते, वस्तुओं की पहचान रंगों के जरिए करते। इससे सीखना किताब से निकलकर अनुभव में बदलने लगा।

कुछ ही हफ्तों में फर्क साफ दिखने लगा। जो बच्चा पहले कक्षा से भागता था, अब गतिविधियों की शुरुआत का इंतजार करता था। उसका आक्रामक व्यवहार कम हुआ और सहभागिता बढ़ी। सबसे अहम यह था कि सीखना अब उसके लिए बाध्यता नहीं रहा। वह अपनी गति और रुचि के अनुसार जुड़ पा रहा था।

इस प्रक्रिया ने मुझे यह समझाया कि शिक्षा और बच्चों के बीच का सबसे बड़ा अंतर तब पैदा होता है, जब हम एक ही ढांचे को सभी पर लागू करने की कोशिश करते हैं। बच्चे अपनी बेचैनी, उत्साह और चुप्पी के जरिए संकेत देते हैं। जब शिक्षक उन संकेतों को पढ़कर गतिविधियों को बदलते हैं, तब शिक्षा का ढांचा बच्चों की वास्तविक दुनिया से जुड़ता है। उसी जुड़ाव में सीखना सहज, टिकाऊ और अर्थपूर्ण बनता है।

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आयुष्मान भारत योजना लेप्रसी प्रभावितों की मदद क्यों नहीं कर पा रही है?

मेरा नाम बलराम घोषाल है और मैं मथुरा जिले में रहता हूं। यहां की लेप्रसी (कुष्ठ रोग) कॉलोनी मेरे लिए सिर्फ एक सुनी-सुनाई जगह नहीं, बल्कि एक रोज की हकीकत है। मेरी मां वहां रहती हैं। वे भी लेप्रसी से प्रभावित हैं और मेरे पिता भी इसी बीमारी से जूझ चुके हैं। बचपन से मैंने देखा है कि यह बीमारी केवल शरीर नहीं, बल्कि पूरे जीवन को धीरे-धीरे सीमित कर देती है। इलाज का अंतहीन खर्च, पहचान के कागजों की उलझन और सरकारी योजनाओं तक पहुंच के लिए लगातार चलने वाली जद्दोजहद; इस बीमारी से जुड़े संघर्षों में शामिल हैं। इसी अनुभव ने मुझे लेप्रसी प्रभावितों की जिंदगी को समझने और उनके हक की लड़ाई को दस्तावेज करने की दिशा में आगे बढ़ाया।

मैं नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसएबल्ड पीपल (एनसीपीईडीपी) के साथ फेलो के रूप में काम कर रहा हूं। इस दौरान मैंने 200 से अधिक लेप्रसी प्रभावितों का सर्वे किया। इसमें साफ तौर पर सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग आयुष्मान भारत योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं और उन्हें इलाज के लिए लगातार आर्थिक संघर्ष करना पड़ रहा है।

मेरी मां जिस लेप्रसी कॉलोनी में रहती हैं, वहीं रहने वाले ठाकुर दास महतो जिनका कुछ दिन पहले ही निधन हो गया, इसका उदाहरण थे। वे पिछले 35 वर्षों से लेप्रसी के दुष्प्रभाव झेल रहे थे और लगभग 40 प्रतिशत विकलांग हो चुके थे। लेप्रसी में शरीर के प्रभावित हिस्सों की संवेदना कम हो जाती है, जिससे छोटी चोट या कट का पता ही नहीं चलता। समय के साथ ये मामूली घाव बड़े जख्म या अल्सर बन जाते हैं जिनके लिए नियमित ड्रेसिंग, लगातार इलाज और डॉक्टर की निगरानी जरूरी होती है।

इस इलाज पर लगातार खर्च आता है, जो पहले से ही बड़े परिवार की जिम्मेदारी उठा रहे लेप्रसी प्रभावितों के लिए भारी बोझ बन गया है। सरकार से उन्हें साल में केवल दो बार सहायता मिलती है, लेकिन यह इलाज की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाती। अपनी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद महतो कभी स्वास्थ्य बीमा नहीं ले पाए क्योंकि प्रीमियम भरना उनकी पहुंच से बाहर था।

उन्होंने स्थानीय कॉमन सर्विस सेंटर पर आयुष्मान कार्ड बनवाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें बताया गया कि उनका नाम साल 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) सूची में नहीं है, इसलिए वे पात्र नहीं हैं। उनका नाम बीपीएल कार्ड से भी हट चुका था, जबकि उनकी पत्नी का नाम अब भी दर्ज है। ऐसे में वे इलाज के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच लगातार संघर्ष करते रहते रहे।

महतो अकेले नहीं थे। सर्वे के दौरान कई ऐसे लेप्रसी प्रभावित सामने आए जिनके नाम एसईसीसी सूची में नहीं हैं और इसी कारण वे योजना से बाहर रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनका नाम सूची में होने के बावजूद आधार या केवाईसी सत्यापन में दिक्कत आती है। लेप्रसी के कारण कई मरीज फिंगरप्रिंट नहीं दे पाते हैं जो आयुष्मान भारत के लिए अनिवार्य हैं। डिजिटल केवाईसी में वीडियो या लाइवनेस चेक, स्क्रीन पर टैप और मूव जैसे स्टेप्स शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के लिए बेहद मुश्किल होते हैं। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया को दिव्यांग लोगों के लिए आसान बनाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन स्क्रीन रीडर, कमांड-बेस्ड नेविगेशन और अन्य एक्सेसिबिलिटी फीचर्स की कमी अब भी बड़ी बाधा बनी हुई है।

मेरी मां की कॉलोनी में भी अधिकांश लोगों के नाम आयुष्मान भारत की सूची में नहीं हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग योजना और कार्ड बनवाने की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। जागरूकता की यह कमी उनकी समस्याओं को और बढ़ा देती है। जिन कुछ लेप्रसी प्रभावितों के पास आयुष्मान कार्ड है, उनसे भी अस्पतालों में बिना किसी कारण बीपीएल कार्ड और आधार कार्ड जैसे और भी दस्तावेज मांगे जाते हैं।

लेप्रसी प्रभावितों की इन दिक्कतों की जानकारी मैंने स्टेट एजेंसी फॉर कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एंड इंटीग्रेटेड सर्विसेज (एसएसीएचर्आएस) की सीईओ संगीता सिंह को भी दी है, ताकि इस स्तर पर कोई ठोस हस्तक्षेप हो सके। एनसीपीईडीपी की हालिया रिपोर्ट “इन्क्लूसिव हेल्थ कवरेज फॉर ऑल” भी बताती है कि भारत के करीब 16 करोड़ विकलांग लोग सरकारी और निजी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से बाहर हैं। इसमें लेप्रसी प्रभावितों की स्थिति और भी चिंताजनक है।

ये आंकड़े मेरे लिए सिर्फ संख्या नहीं बल्कि मेरी मां जैसी सैकड़ों जिंदगियां हैं, जो इलाज और रोजमर्रा के खर्च के बीच हर दिन समझौता करने को मजबूर हैं। जब तक नीतियां इन जिंदगियों तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज’ सिर्फ एक नारा ही बना रहेगा।

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चकमा समुदाय के सुपरफूड मेली-एमिली में छुपा विज्ञान

हरे पत्तों पर रखे बिक्री के लिए ताज़े बैम्बू शूट_चकमा
किण्वित बांस की कोपल (फर्मेंटेड बैम्बू शूट) हर चकमा थाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। | चित्र साभार: इशिका चकमा

हर मंगलवार की सुबह, चकमा समुदाय के सैकड़ों किसान और व्यापारी पहाड़ों से अपने ताजा उत्पादों के साथ उनाकोटी जिले के पेचार्थल मुख्य बाजार में इकट्ठा होते हैं। यहां पत्तेदार सब्जियां, मकई, सूअर का मांस (पोर्क) और आलू जैसे कई उत्पादों का विविध मिश्रण हमें चकमा समुदाय की पाक परंपराओं की एक झलक देता है। इन तमाम चीजों के बीच हमें साधारण सी दिखने वाली बांस की कोपल (बैम्बू शूट) भी मिलती है, जो चकमा समुदाय के भोजन का एक अभिन्न अंग है। इसे अक्सर मेली-एमिली जैसे किण्वित (फर्मेंटेड) रूप में खाया जाता है।

युवा पर्यावरण कार्यकर्ता इशिका चकमा कहती हैं, “किण्वित बांस की कोपल हर चकमा थाली का एक अहम हिस्सा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इसके बिना चकमा समुदाय की दावत अधूरी होती है। हर व्यंजन को बनाने की एक अनूठी विधि है, जो उसे एक विशिष्ट स्वाद देती है। हमारे यहां तो मजाक में यह भी कहते हैं कि बछुरि माला (बांस की कोपल से बना एक व्यंजन) फ्रांसीसी क्रोईसों को हमारा जवाब है!”

बीती चार सदियों के लंबे अंतराल से चकमा समुदाय त्रिपुरा में बसा हुआ है। इस समुदाय के बाशिंदे सबसे पहले बंगाल सल्तनत के समय यहां आकर बसे और उसके बाद बांग्लादेश में चटगांव के पहाड़ी इलाकों की हिंसा से बचने के लिए अलग-अलग समय में यहां आते रहे। चटगांव और त्रिपुरा के भूभाग में समानता थी। यही कारण था कि चकमा लोगों को जल-जंगल जमीन से जुड़े अपने पारंपरिक ज्ञान को इस नए इलाके की मिट्टी में घोलने में खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी।

वर्तमान में चकमा समुदाय पेचार्थल, ढलाई जिले के गंडाछेरा और छमानु इलाकों समेत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बांस की कोपल जैसे भोजन और किण्वन जैसी पाक विधियों के जरिये अपनी थाती और इतिहास को संजोए हुए हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ पूर्वोत्तर भारत का भूदृश्य बदल रहा है। इसके चलते अव्यवस्थित बुनियादी ढांचे व रबर जैसी एकल फसलों के विस्तार से बांस की प्रजातियों पर धीरे-धीरे खतरा बढ़ता जा रहा है।

विकास सेक्टर पेशेवर और संरक्षणवादी सुशील चकमा कहते हैं, “बांस की गुणवत्ता और विविधता पर जलवायु परिवर्तन और भूदृश्य क्षरण (लैंड्स्केप डेग्रडेशन) का गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यदि इस फसल को पुनर्जीवित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो चकमा पाक-शैली पर निश्चित रूप से लुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा।”

सांस्कृतिक प्रभावों के अलावा, बांस की कमी चकमा समुदाय को उन तरीकों से भी प्रभावित करती है, जो सतह पर तुरंत नजर नहीं आते।

किण्वित खाद्य पदार्थ और मानव स्वास्थ्य पर काम करने वाले वैज्ञानिक डॉ. मलोयजो जॉयराज भट्टाचारजी कहते हैं, “मेली-एमिली जैसे किण्वित खाद्य पदार्थ चकमा समुदाय में देखे गए विशेष आंत (गट) प्रोफाइल को बनाने और बरकरार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन खाद्य पदार्थों में किण्वन से प्राप्त मेटाबोलाइट्स के समृद्ध मिश्रण के साथ प्राकृतिक रूप से लैक्टिक ऐसिड बैक्टिरिया और अन्य लाभकारी सूक्ष्म जीवों की सघन संख्या होती है, जो आंत की संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।” 

डॉक्टर मलोयजो प्रजातीय विविधता पर भी जोर देते हुए कहते हैं, “बांस की हर प्रजाति की अपनी रासायनिक संरचना होती है, जिसमें रेशे की बनावट और किण्वन योग्य शर्करा का अंतर शामिल है। यह किण्वन प्रक्रिया और उसके परिणामस्वरूप, पोशक तत्वों को भी प्रभावित करते हैं।”

हालांकि जैसे-जैसे बांस की आबादी और उसकी विविधता क्षीण हो रही है, चकमा जैसे समुदायों के पास शायद ही कोई विकल्प बचा है।

इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार को एक दीर्घकालिक नीति और योजना तैयार करनी चाहिए। सुशील कहते हैं, “नहीं तो चकमा समुदाय की आने वाली पीढ़ियां ऐसे बदले हुए परिवेश में रहेंगी, जहां बांस उनकी थाली और जीवन से गायब हो चुका होगा। यह हमारी पहचान और संस्कृति है। इसलिए इस फसल का संरक्षण और इसके पारिस्थितिक पतन को रोकने का दायित्व हम सभी का है।”

हंसातनु रॉय वर्ष 2025–26 के आईडीआर नॉर्थईस्ट फेलो हैं।

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अधिक जानें: पढ़िए, आदिवासी क्षेत्रों में ई-पीडीएस को कैसे बेहतर बना रही हैं सामुदायिक सूचनाएं।

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क्यों कश्मीर को भी जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की जरूरत है

चर्चा करते कुछ महिला और पुरुष_जलवायु परिवर्तन
एक सर्द सुबह में छात्र और स्टाफ सदस्य कॉलेज के पीछे बने कम्पोस्ट पिट का निरीक्षण करते हुए। | चित्र साभार: कैसर अली

मेरा नाम इकरा मुश्ताक है और मैं श्रीनगर के गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वुमन में एमए द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। मेरे लिए श्रीनगर की ज्यादातर सुबहें एक जैसी होती हैं। इन सुबहों में मैं हल्की चुभती-सी ठंड में, क्लास शुरू होने से पहले कॉलेज के बगीचों से होकर जाने वाले रास्ते से गुजरती हूं। इन्हीं रास्तों के पीछे, हमारा दिन शुरू होता है। यह शुरुआत किसी कक्षा में नहीं बल्कि कंपोस्ट के गड्ढों के पास होती है। 

हर सुबह पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रमुख डॉ आसिया नज़ीर के साथ मैं उस जगह पहुंचती हूं, जो अब हमारे लिए जलवायु कार्रवाई की एक अनपेक्षित प्रयोगशाला बन चुकी है। वे कंपोस्ट की जांच करती हैं और हमसे पूछती हैं कि क्या बदलने की जरूरत है। एक साल पहले किसी को भी यह सब समझ नहीं आता था लेकिन आज यह हम सभी छात्रों के लिए आदत बन चुकी है। एक छोटे-से प्रयोग के रूप में शुरू हुई इस पहल ने जलवायु परिवर्तन पर हमारी समझ को बदल दिया है। 

कश्मीर में पर्यावरण का संकट सीधे तौर पर नहीं दिखता क्योंकि लाल चौक के ऊपर कोई धुंध नहीं रहती, आसमान नीला और हवा साफ होती है। लेकिन लगातार सर्दियां छोटी होती जा रही हैं, ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और बर्फबारी अनिश्चित होती जा रही है और यह सामान्य-सा दिखने वाला माहौल ही इस सच्चाई को ढक देता है। 

कंपोस्टिंग की पहल से जुड़ने से पहले, मेरे लिए जलवायु परिवर्तन सिर्फ किताबों तक सीमित था। यह कोई दूर का अनजान सा विषय लगता था जो सम्मेलनों और रिपोर्टों तक ही सीमित हो। यह दूरी उस दिन खत्म हुई जब हमने अपनी ही कैंटीन का कचरा इकट्ठा करना शुरू किया और पहली बार समझा कि बिना सोचे-समझे हम कितना कचरा पैदा करते हैं, और वह कहां जाता है।

यह विचार डॉ आसिया का था। विभाग की एक बैठक में उन्होंने कहा, “अगर हम कश्मीर में बदलाव की उम्मीद करते हैं तो शुरुआत उस जगह से करनी होगी जिस पर हमारा नियंत्रण है – अपने कैंपस से।” तर्क सीधा था, अगर श्रीनगर का ज्यादातर कचरा खुले मैदानों में फेंका जाता है या जला दिया जाता है तो कम से कम एक कैंपस को बेहतर करने की कोशिश तो करनी चाहिए। यहीं से हमने कैंटीन के बचे हुए खाने, हॉस्टल के जैविक कचरे और गिरे हुए पत्तों को उन कंपोस्ट इकाइयों की ओर मोड़ना शुरू किया, जिन्हें विभाग ने खुद डिजाइन कर बनाया था। हमारा काम था हरे और सूखे कचरे की परतें बनाना, तापमान दर्ज करना, नमी संतुलित करना और हर दिन के बदलाव दर्ज करना।

शुरुआती हफ्ते आसान नहीं थे। कुछ छात्राएं कचरा अलग करने से हिचकती थी। कइयों को लगता है कि यह पहल भी अन्य योजनाओं की तरह असफल हो जाएगी। इसमें कई चुनौतियां भी आईं जैसे कभी गड्ढों से बदबू आती, तो कभी कंपोस्ट पूरी तरह सूख जाता। हम बार-बार सुधार करते, सीखते, और फिर से शुरू करते। पहली बार जब हमने गहरे रंग का, साफ, मिट्टी-सा कंपोस्ट निकाला तो वह किसी जादू जैसा लगा।

आज वही कंपोस्ट हमारे कैंपस के बगीचों को पोषण देता है। रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं रही। एक छोटा-सा किचन गार्डन अब हॉस्टल के लिए मौसमी सब्जियां उगा रहा है। लेकिन सबसे गहरा बदलाव बगीचों में नहीं, हममें आया है, अब जलवायु परिवर्तन हमारे लिए दूर की चीज नहीं है। 

यह काम कभी भी आसान नहीं रहा। छात्रों और कैंटीन कर्मचारियों को कचरा अलग करने के लिए राजी करना समय लेता रहा। कंपोस्ट अक्सर अनिश्चित व्यवहार करता था। कड़ाके की ठंड वाली सुबहों में गड्ढे में कंपोस्ट पलटते समय हमारे हाथ सुन्न हो जाते थे। दबी आवाजों में यह भी सुनने को मिलता कि यह काम गंदा है, या कॉलेज की लड़कियों के लिए नहीं है। लेकिन हर चुनौती ने हमें एक अहम सबक सिखाया, हमने जाना कि जलवायु परिवर्तन पर काम शायद ही कभी आकर्षक होता है। यह धीमा, दोहराव भरा और अक्सर अनदेखा रहता है, लेकिन इसका असर चुपचाप बैठ जाता है – मिट्टी में, बगीचों में और उन लोगों के भीतर जो यह काम करते हैं।

यह लेख तैयार करने में कश्मीर से कैसर अली ने योगदान दिया है।

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सिग्नल की तलाश में धड़गांव के गांव

गांव के लोग मोबाइल नेटवर्क की तलाश में ऊंचाई पर एक पेड़ के पास खड़े होकर सिग्नल पकड़ने की कोशिश करते हुए_डिजिटल
लोगों को मोबाइल नेटवर्क पाने के लिए तंग रास्तों और खड़ी पहाड़ियों वाले ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पार करते हुए दो से तीन घंटे तक चलना पड़ता है। | चित्र साभार: राकेश पवार

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के धड़गांव ब्लॉक के दूर-दराज के गांवों में ई-केवाईसी सत्यापन के कारण सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन करना कठिन होता जा रहा है। उदाहरण के लिए, मुख्यमंत्री माझी लड़की बहन ऐसी ही एक योजना है, जिसके तहत 21 से 65 वर्ष की आयु की पात्र महिलाओं को प्रति माह 1500 रुपये की सहायता मिलती है।

यहां के स्थानीय निवासियों को ई-केवाईसी सत्यापन के लिए जरूरी वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) प्राप्त करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्थिर मोबाइल नेटवर्क पाने के लिए, तंग रास्तों और खड़ी पहाड़ियों वाले ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पार करते हुए दो से तीन घंटे तक चलना पड़ता है। यहां तक कि कुछ लोग सिग्नल ढूंढने के लिए पेड़ों या छोटी पहाड़ियों तक पर चढ़ने को मजबूर हैं। कई महिलाएं मोबाइल पर ओटीपी आने की उम्मीद लगाए, अपने बच्चों को गोद में लेकर खाने-पीने के थैले समेत कई घंटों इंतजार करती हैं।

अक्सर, गांव में कोई छोटी पहाड़ी या पेड़ मोबाइल नेटवर्क पाने का स्थल बन जाता है। महिलाएं वहां इकट्ठा होती हैं और तेज धूप में अपने मोबाइल फोन को ऊपर उठाए ओटीपी आने का इंतजार करती हैं। किसी-किसी दिन ओटीपी आता ही नहीं है और उन्हें अगले दिन फिर से यही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। इसके कारण धड़गांव के कई परिवारों को रोजगार और कमाई का एक दिन गंवाना पड़ता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इन महिलाओं को ऑफलाइन फॉर्म भरने में मदद जरूर करती हैं, लेकिन ओटीपी सत्यापन न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि उनके पिता या पतियों के लिए भी अनिवार्य है।

कुछ महिलाएं आस-पास के कस्बों और गांवों में भी जाने की कोशिश करती हैं, जहां कनेक्टिविटी बेहतर होती है। लेकिन वहां पहुंचने के लिए उन्हें आवाजाही पर खर्च करना पड़ता है, जो लगभग 300 रुपये तक हो सकता है। पहले से ही रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे परिवारों के लिए यह एक बड़ी रकम है।

कल्पेश पवार आदिवासी जनजागृति में एक जमीनी स्तर के जनसंगठक हैं। नितेश भारद्वाज आदिवासी जनजागृति का नेतृत्व करते हैं।

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जच्चा-बच्चा ​​अधिकारों​​ के लिए ​​एक महिला ​​मजदूर संगठन ​​की लड़ाई

मजदूर यूनियन की महिलाएं अधिकारियों से बात करते हुए _ यूनियन
संगठित प्रयास प्रशासन को जवाबदेह बनाने का माद्दा रखते हैं। | चित्र साभार: जबीना

पिछले एक दशक से कर्नाटक के दावणगेरे जिले में नेरालु बीड़ी मजदूर यूनियन ने हजार से अधिक महिला बीड़ी मजदूरों को संगठित किया है। मैं शुरुआत से ही इस यूनियन से जुड़ी रही हूं और तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर हमारे समुदाय में स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बनाने के मुद्दे पर काम करती हूं। यूनियन का काम सिर्फ मजदूरी या काम के अधिकारों तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े छोटे-बड़े हर मुद्दे पर साथ खड़ा रहने वाला एक सामुदायिक मंच है।

हम अक्सर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कई पहलुओं पर काम करते हैं, जिसमें नियमित स्वास्थ्य जांच, गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली सेवाओं का अधिकार, प्रसव संबंधी समस्याएं और सरकारी अस्पतालों में होने वाली अनियमितताओं की निगरानी जैसे गंभीर मुद्दे भी शामिल होते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर यह महिलाएं अक्सर अस्पतालों में भेदभाव, अनदेखी और अस्पष्ट प्रक्रियाओं का सामना करती हैं। ऐसे समय में संगठन (यूनियन) ही वह जगह है जहां वे खुलकर अपनी परेशानी बता पाती हैं।

वर्ष 2021 में, मैंने अपने भाई और भाभी को हरपनहल्‍ली से दावणगेरे बुलाया क्योंकि उनके गांव के अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के लिए आवश्यक स्कैनिंग सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी। बच्चे के जन्म के बाद, अस्पताल के कर्मचारियों ने हमें शिशु को दिखाया और बताया कि सांस लेने में कठिनाई के कारण उसे आईसीयू में ले जाया जा रहा है।

कुछ देर बाद कर्मचारियों ने हमसे थायी कार्ड (मातृ स्वास्थ्य पहचान पत्र) लाने के लिए कहा। जब तक हम कार्ड लेकर लौटे, नर्स ने बिना उचित जांच और परिवार को सूचित किए बगैर बच्चे को किसी अनजान व्यक्ति को थमा दिया था। मैंने तुरंत यूनियन से संपर्क किया, और उन्होंने स्थानीय मीडिया को सूचित किया ताकि मामले को गंभीरता से उठाया जा सके।

हमने देखा कि अस्पताल में जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया नदारद थी, और ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बुनियादी व्यवस्थाओं की कमी भी साफ नजर आ रही थी। पूरी इमारत में केवल एक ही सीसीटीवी कैमरा था जिसका रूख किसी और दिशा में था। यूनियन ने तुरंत ही सदस्यों को संगठित किया और हमने अस्पताल के बाहर शांतिपूर्ण धरना शुरू किया। हम लोग एक महीने तक अस्पताल के बाहर ही डटे रहे। इस दौरान हमारे गैस के दो सिलेंडर तक खत्म हुए। हमने अधिकारियों से कहा कि जब तक बच्चा वापस नहीं मिलता, हम वापस नहीं जायेंगे। यूनियन के साथी हर दिन हमारे साथ समय बिताते, हमें हिम्मत देते रहते और यह सुनिश्चित करते कि हमारी आवाज लगातार सार्वजनिक रूप से सुनी जाए।

कई हफ्तों की निरंतर सामूहिक कोशिशों और संगठित दबाव के बाद, अधिकारियों को एक धुंधली सीसीटीवी फुटेज के रूप में एक सुराग मिला। यूनियन ने तुरंत ही इसे व्हाट्सऐप पर साझा करना शुरू किया और स्थानीय लोगों तथा आशा कार्यकर्ताओं की मदद से हमने आसपास के इलाकों में खुद छानबीन शुरू की। एक शाम पुलिस से फोन आया कि पास ही एक बस स्टॉप पर किसी बच्चे को देखा गया है। इसके तीन दिन बाद आखिरकार बच्चे को महिला एवं बाल विकास विभाग और दावणगेरे एसपी द्वारा परिवार को सौंप दिया गया।

इस घटना के बाद अस्पताल में तमाम जरूरी जगहों पर सीसीटीवी कैमरा और एलसीडी डिस्प्ले लगाए गए हैं। जिस तरह यूनियन ने महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों पर अपने लंबे अनुभव, स्थानीय प्रशासन पर सामूहिक दबाव और सदस्यों के बीच आपसी भरोसे के आधार पर इस मामले को आगे बढ़ाया, वह यह दर्शाता है कि संगठित प्रयास प्रशासन को जवाबदेह बनाने का माद्दा रखते हैं।

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आदिवासी क्षेत्रों में ई-पीडीएस को बेहतर बनाती सामुदायिक सूचनाएं

नोटिस बोर्ड पर कुछ पढ़ते हुए लोग_पीडीएस
इंटरनेट की कमी के कारण परिवार अक्सर यह नहीं जान पाते हैं कि उनके राशन कार्ड की स्थिति क्या है। | चित्र साभार: एसआर संकरन आदिवासी सहाय केंद्रम

वसंथा* और उनके पति को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत राशन पाने के लिए आठ महीने से अधिक का इंतजार करना पड़ा। वे आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के उन हजारों आदिवासी परिवारों में से हैं, जिनके लिए राशन वितरण की प्रक्रिया आज भी ऑफलाइन ही उपलब्ध है। इंटरनेट की कमी के कारण परिवार अक्सर यह नहीं जान पाते हैं कि उनके राशन कार्ड (या राइस कार्ड) की स्थिति क्या है, उन्हें कितनी मात्रा में अनाज मिलने का अधिकार है, या फिर राशन वितरण की प्रक्रिया में क्या बदलाव हुए हैं।

जहां पीडीएस ऑनलाइन है, वहां अनाज वितरण बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण पर आधारित होता है। वहीं ऑफलाइन प्रणाली में उचित मूल्य दुकानों (एफपीएस) के डीलर राशन कार्डधारकों को 12 कूपन देते हैं (हर महीने के लिए एक कूपन)। अगर इस दौरान परिवार के सदस्यों की संख्या बदलती है या सरकार राशन कार्ड में कोई अपडेट करती है और यह बदलाव कूपन में दर्ज नहीं होता तो परिवार को उनके हिस्से का पूरा अनाज नहीं मिल पाता है।

इसके अलावा जब परिवार अपना राशन कार्ड विवरण अपडेट करने की कोशिश करते हैं तो वे अपनी आवेदन स्थिति को डिजिटली ट्रैक नहीं कर पाते हैं। उदाहरण के लिए, नए सदस्यों को जोड़ना, विवाह के बाद अलग घर बसाने वाले दंपतियों के लिए कार्ड विभाजित करना, या कोई अन्य सुधार करना।

इस समस्या को हल करने के लिए एसआर संकरन आदिवासी सहाय केंद्रम, जो सार्वजनिक सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराने वाला एक सामुदायिक केंद्र है, क्षेत्र के लगभग ढाई हजार घरों के लिए हर महीने अनाज की कीमतों, राशन कार्डों और पात्रताओं से संबंधित डेटा इकट्ठा करता है। हम विभिन्न ऑनलाइन रजिस्ट्रियों और हेल्पलाइनों से जानकारी जुटाते हैं, उसे तेलुगु में अनुवादित करते हैं और फिर उसे पढ़ने में सरल ढांचे और तालिकाओं में प्रस्तुत करते हैं। इसे व्हाट्सएप संदेशों के जरिए और आंगनवाड़ियों, पंचायत भवनों, स्कूलों तथा जिले के अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नोटिस के रूप में साझा किया जाता है। लोग इस जानकारी का उपयोग सीधे अपने अधिकारों की मांग के लिए कर पाते हैं।

एसआर संकरन आदिवासी सहाय केंद्रम द्वारा तैयार सूचना प्रारूपों के नमूने।

वसंथा का आवेदन जून 2023 में ही ऑनलाइन स्वीकृत हो चुका था। लेकिन उन्हें इसकी जानकारी दो महीने बाद मिली, जब उन्होंने हमारे द्वारा प्रसारित एक व्हाट्सएप संदेश में अपना नाम और विवरण देखा।

जब से हमने मुख्य रजिस्टरों (जिनमें हर महीने जारी किए गए राशन कार्डों की संख्या और आवंटित अनाज की इकाइयों का विस्तृत ब्यौरा होता है) का डेटा साझा करना शुरू किया है, तब से कई परिवार अपना पूरा राशन प्राप्त करने में सक्षम हुए हैं। शुरुआत में इस चलते तनाव की स्थिति भी बनी। स्थानीय समुदाय से ही आने वाले एफपीएस डीलर हमारे साथ बहस करते थे और हमारे डेटा की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते थे।

अब हम जब भी कोई जानकारी साझा करते हैं तो यह स्पष्ट रूप से दर्ज करते हैं कि इसे किस सरकारी वेबसाइट या विभाग से प्राप्त किया गया है, ताकि लोग भरोसा कर सकें कि जानकारी सत्यापित और सही है।

बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुंच पाना इतना कठिन नहीं होना चाहिए। राशन कार्ड एक स्थिर दस्तावेज नहीं है। यह परिवारों में होने वाले बदलाव के साथ बदलता रहता है। ऐसे में जब ये अपडेट डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किए जाते हैं तो यह बहुत से परिवारों की पहुंच से बाहर होता है। नतीजतन वे पूरी तरह एफपीएस डीलरों के मनमाने रवैये पर निर्भर होते हैं।

अक्सर ऑनलाइन प्रणालियों को भ्रष्टाचार या गड़बड़ी रोकने वाले तकनीकी समाधान के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन कई बार यही प्रणालियां लोगों को पूरी तरह हाशिये पर धकेल देती हैं या उनके वैधानिक अधिकारों तक पहुंच को अत्यंत कठिन बना देती हैं। हमारे अनुभव से स्पष्ट है कि यदि लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर, समय पर और सुलभ जानकारी के साथ समानांतर ऑफलाइन व्यवस्थाएं विकसित की जाएं, तो वे न केवल पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती हैं बल्कि बुनियादी अधिकारों की भी प्रभावी रूप से रक्षा कर सकती हैं।

*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदला गया है।

पंगी रमणाबाबू और कोर्रा लक्ष्मणराव ने भी इस लेख में योगदान दिया है।

वंथला भास्कर और जर्था मत्‍यकोंडबाबू एसआर संकरन आदिवासी सहाय केंद्रम से जुड़े हुए हैं। लिबटेक इंडिया इस केंद्र का संसाधन साझेदार है।

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क्या विकास सेक्टर में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के अनुभव की कोई जगह है?

खेत में कंधे पर फावड़ा रखे एक व्यक्ति_कार्यकर्ता
मैंने 22 साल की उम्र में सामाजिक क्षेत्र में काम शुरू किया था, ​आज​ 52 साल की उम्र में किसी नए क्षेत्र में शुरुआत करना​ ​​मेरे लिए बहुत कठिन है। | चित्र साभार: उदयसिंह मकवाना

मेरा नाम उदयसिंह मकवाना है। मैं साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर के प्रेमपुर गांव में रहता हूं। मेरी उम्र 52 वर्ष है और आजकल मैं काम की तलाश कर रहा हूं। मेरे कई साथी जो पहले सामाजिक क्षेत्र में काम करते थे, अब सलाह देते हैं कि मुझे किसी और क्षेत्र में काम करने के बारे में सोचना चाहिए।

मैंने 22 वर्ष की उम्र में सामाजिक क्षेत्र में काम की शुरुआत की थी। उस समय मैंने ‘दिशा’ नाम की संस्था में फील्ड वर्कर के रूप में अपना करियर शुरू किया था। आगे चलकर मैं संस्था द्वारा संचालित गुजरात खेत कामदार यूनियन (जीएएलयू) में बतौर सचिव नियुक्त हुआ। जब मैंने सचिव का पद संभाला, तब यूनियन की सदस्य संख्या लगभग 585 थी। फिर लगभग 18 साल के लंबे सफर के बाद फंडिंग की कमी के चलते काम बंद हो गया। जब मुझे कार्य-मुक्त किया गया, तब यूनियन की संख्या बढ़कर 59,400 हो चुकी थी और इसकी अपनी एक अलग पहचान बन चुकी थी।

तकरीबन 40 वर्ष की उम्र में मैंने फिर से काम ढूंढना शुरू किया। इस दौरान मैंने संवेदना ट्रस्ट के साथ एक साल तक आदिवासी, मजदूर और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम किया। इसके अलावा मैंने पाथेय संस्था, जो पंचायतों के साथ काम करती है, में बजट निर्माण और पंचायत स्तर की योजना प्रक्रियाओं में सहयोग दिया। मैंने अहमदाबाद के सॉलिडैरिटी सेंटर में असंगठित मजदूरों के साथ न्यूनतम मजदूरी, आरटीआई और विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने का काम भी किया। इन छोटे-छोटे प्रोजेक्ट के बाद, वर्ष 2016 में मुझे राजस्थान की ‘लोकतंत्र शाला’ से तीन साल की फेलोशिप मिली, जिसके दौरान मैंने कृषि और मनरेगा मजदूरों के साथ काम किया। फेलोशिप पूरी होने के बाद, जून 2019 में मैंने चाइल्डलाइन 1098 में कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया। जुलाई 2023 में चाइल्डलाइन भी बंद हो गई क्योंकि केंद्र सरकार ने यह प्रोजेक्ट समाप्त कर दिया।

आज 52 वर्ष की उम्र में मैं एक बार फिर सामाजिक क्षेत्र में काम ढूंढने के लिए प्रयास कर रहा हूं।

पूरा जीवन इस क्षेत्र में काम करने और उसी में रुचि होने के कारण मैंने कुछ जानी-मानी सामाजिक संस्थाओं से संपर्क किया। उनकी ओर से जवाब तो सकारात्मक मिला, लेकिन आखिर में यही कहा गया कि “अगर आपके लायक कोई काम होगा तो जरूर बताएंगे।”

एक संस्था, जो पानी और जैविक खेती पर काम करती है, ने कहा कि गुजरात में उनके काम में अब फंड कम हो गया है। इसलिए वे नए कार्यकर्ताओं को रखने में सक्षम नहीं हैं। वहीं आदिवासी किसानों के साथ काम करने वाली एक संस्था ने कहा कि प्रोजेक्ट के अभाव के चलते उनके पास कोई काम नहीं है। सरकारी प्रोजेक्ट से जुड़ी हुई कई संस्थाओं ने साफ कहा कि “आपकी उम्र ज्यादा है। हम तो युवा कार्यकर्ताओं को ही रखते हैं।”

तमाम संस्थाओं से बातचीत की प्रक्रिया में मुझे यह एहसास हुआ कि हर संस्था के भीतर कई तरह की रणनीतियां होती हैं। मसलन कितनी उम्र के कार्यकर्ता रखने हैं, कितने समय तक उन्हें प्रोजेक्ट पर रखना है, और किस सामाजिक पृष्ठभूमि से फील्ड कार्यकर्ता चुनना है। लेकिन इन रणनीतियों में शायद अमूमन अनुभव के लिए जगह बना पाना मुश्किल होता है।

जैसा कि मैंने पहले कहा, अब लोग मुझे किसी और क्षेत्र में काम करने की सलाह देते हैं। लेकिन मैंने 22 साल की उम्र में पूरे मन से सामाजिक क्षेत्र में काम शुरू किया था। आज मेरे लिए 52 साल की उम्र में किसी नए क्षेत्र में शुरुआत करना बहुत कठिन है। मुझे लगता है कि मैं किसी अन्य क्षेत्र के साथ न तो न्याय कर पाऊंगा और न ही उसमें मुझे आत्म-संतोष मिलेगा। इसलिए मेरी चुनौती और खोज, दोनों अभी जारी हैं।

सामाजिक क्षेत्र में एक पेशेवर के रूप में तकरीबन तीन दशक काम करने के बाद मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सेक्टर में काम करने वाली छोटी-बड़ी संस्थाएं जमीनी कार्यकर्ताओं के भविष्य के लिए भी कोई कदम उठा रही हैं?

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