May 18, 2023

भारत के श्रम बल में महिलाओं के भागीदारी से जुड़े प्रयास क्या बताते हैं?

दुनिया के अन्य देशों की तुलना में, भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी की दर कम क्यों है और इसे बदलने के लिए क्या किए जाने की जरूरत है।
10 मिनट लंबा लेख

महाराष्ट्र के एक गांव में रहने वाली सविता सूरज उगने से सूरज ढलने तक अपने खेतों में काम करती हैं ताकि अपने बच्चों का पालन-पोषण कर सकें। सलोनी दिल्ली के एक बैंक में मैनेजर हैं और हर दिन घर से दफ़्तर और दफ़्तर से वापस घर आने-जाने के लिए उन्हें एक-एक घंटे की यात्रा करनी पड़ती है। सलोनी की घरेलू सहायिका सीमा उनके परिवार के लिए खाना पकाती हैं और उनके घर, कपड़ों और बर्तन की साफ़-सफ़ाई का काम करके, दो बेटों और तीन बेटियों वाले अपने परिवार का पेट पालती हैं। ये तीनों ही महिलाएं भारत के श्रम बल का हिस्सा हैं।

श्रम बल भागीदारी दर (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट – एलएफपीआर), आबादी का वह प्रतिशत है जो श्रम बल (काम करने, काम की तलाश करने या काम के लिए उपलब्ध लोग) का हिस्सा होता है। एलएफपीआर में स्वरोज़गार (उदाहरण के लिए खेती, वानिकी और मछली पकड़ने जैसे तमाम काम) करने वाले लोग, वेतनभोगी कर्मचारी या असंगठित क्षेत्र में मज़दूरी करने वाले और बेरोज़गार लोगों को शामिल किया जाता है।

भारत के श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी दर की स्थिति क्या है?

भारत में महिलाओं की कुल संख्या लगभग 66.3 करोड़ है जिसमें लगभग 45 करोड़ महिलाओं की उम्र 15–64 वर्ष के बीच है और वे श्रम बल की श्रेणी में आती हैं। बीते तीन दशकों में भारत के श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी की दरों (फ़ीमेल लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट – एफ़एलएफ़पी) में तेज़ी से गिरावट आई है। विश्व बैंक, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे – पीएलएफएस, भारत का आधिकारिक श्रम बल सर्वेक्षण है, और 2017-18 से इसे हर साल किया जाने वाला सर्वे बना दिया गया है) की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में यह 30.2 फ़ीसद पर था जबकि 2018 में लुढ़क कर अपने सबसे निचले स्तर 17.5 फ़ीसद पर पहुंच गया।

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1990 के दशक से भारत के एफ़एलएफ़पीआर में गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, वर्ष 2020–21 में पिछले तीन वर्षों की तुलना में सभी आयु के लोगों के पीएलएफ़एस1 में सुधार देखा गया और यह 17.5 फ़ीसद से बढ़कर 24.8 फ़ीसद हो गया था। (15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं के लिए यह दर 2017-18 में 23.3 प्रतिशत थी जो बढ़कर 2020-21 में 32.8 हो गई)। वित्त मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि इस सुधार के कई कारक हैं। इनमें प्रगतिशील श्रम सुधार उपाय, विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार के बेहतर मौके, स्व-रोज़गार करने वालों की बढ़ती हिस्सेदारी और औपचारिक रोज़गार के स्तर पर बढ़त शामिल है।

वैश्विक एफ़एलएफ़पीआर पिछले तीन दशकों से 52.4 फ़ीसद (15+ वर्ष आयु) के आंकड़े पर ही स्थिर बना हुआ है। हालांकि, विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में इस आंकड़े में एक बड़ा अंतर दिखता है। मध्य एशिया, उत्तर अफ़्रीका और दक्षिण एशिया में यह दर लगभग 25 फ़ीसद है जबकि पूर्व एशिया और सब-सहारन अफ़्रीका में लगभग 66 फ़ीसद। मज़ेदार बात यह है कि हमें पुरुषों के एलएफ़पीआर में किसी तरह की भिन्नता दिखाई नहीं पड़ती है और यह सभी अर्थव्यवस्थाओं में एक समान 80 फ़ीसद के आसपास के आंकड़े को छूता है।

भारत का एफ़एलएफ़पीआर कम क्यों है?

अनौपचारिकता

पीएलएफ़एस के अनुसार भारत में काम कर रही, काम की तलाश कर रही या काम करने के लिए उपलब्ध महिलाओं की संख्या यानी महिला श्रम बल लगभग 16.6 करोड़ है। कामकाजी महिलाओं की कुल आबादी में से 90 फ़ीसद महिलाएं अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। ये महिलाएं या तो स्व-रोज़गार या फिर अनौपचारिक श्रम से जुड़ी हैं और मुख्य रूप से खेती और निर्माण के क्षेत्रों में काम करती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उन्हें शोषण, ख़राब कामकाजी परिस्थितियों, कहीं आने-जाने या बसने के विकल्पों की कमी और हिंसा के जोखिम जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये सभी परिस्थितियां महिलाओं को कार्यबल में प्रवेश करने से रोकती हैं और उन्हें हतोत्साहित करती हैं।

मेट्रो में खड़ी एक महिला। पीछे एक पोस्टर पर लिखा है ‘महिलाओं द्वारा किए गए 51 प्रतिशत काम का भुगतान नहीं किया जाता है’।
औपचारिक अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी में सुधार पर ध्यान केंद्रित करने वाले समाधानों से भारतीय महिलाओं और अर्थव्यवस्था को अत्यधिक लाभ होगा। | चित्र साभार: यूएन वीमेन / सीसी बीवाय

पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंड

कामकाजी महिलाओं को समाज से कम सहयोग मिलता है। इसकी जड़ पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था है जो यह तय करती है कि महिलाओं को अपनी पेशेवर इच्छाओं से अधिक घरेलू ज़िम्मेदारियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। नई जगहों पर जाकर काम करने या बसने और सुरक्षा से जुड़ी बाधाओं के अलावा घरेलू कामों के अत्यधिक बोझ के कारण महिलाओं को अपना रोज़गार छोड़ना पड़ता है। हाल ही में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवैतनिक घरेलू कामों में (संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा रिपोर्ट किए गए वैश्विक औसत 2.6 के मुकाबले) 9.8 गुना अधिक समय बिताती हैं। वैश्विक स्तर पर, देखभाल जैसे अवैतनिक कामों के कारण ही महिलाएं श्रम बल से बाहर रह जाती हैं। वहीं, पुरुषों को “शिक्षा, बीमारी या विकलांगता” के कारण ही इससे बाहर रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक मानदंडों की गहरी पैठ और अधिकारों की कमी के कारण महिलाओं के सामने उनके अपने रोज़गार संबंधी फ़ैसलों के लिए बहुत ही कम विकल्प उपलब्ध होते हैं।

शिक्षित महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से घरेलू कामों में समर्पित है।

शिक्षित महिलाओं का एक बड़ा तबका गृहिणियों का है जो खाना पकाने, साफ़-सफ़ाई और बच्चों की देखभाल जैसे घरेलू कामों की जिम्मेदारी संभाल रहा है। उनके द्वारा किए जाने वाले तमाम कामों के लिए न तो उन्हें किसी प्रकार का भुगतान किया जाता है और न ही वे एफ़एलएफ़पीआर में ही शामिल होती हैं। इसके अलावा जीडीपी में भी उनके आर्थिक उत्पादन को शामिल नहीं किया जाता है। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा 2023 में जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार अर्थव्यवस्था में अवैतनिक महिलाओं का कुल योगदान लगभग 22.7 लाख करोड़ रुपये है- जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7.5 फ़ीसद है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत का एफ़एलएफ़पीआर उतना कम नहीं है जितना कि अनुमान लगाया जाता है और अवैतनिक कामों को इसमें शामिल किए जाने से इस आंकड़े में सुधार आएगा। इकनॉमिक एडवायज़री काउन्सिल द्वारा प्रकाशित एक पत्र इस बात पर प्रकाश डालता है कि पीएलएफएस “महिलाओं द्वारा कुक्कुट पालन, गाय-भैंस पालने और दूध दुहने जैसे उनके घरेलू कामों को आर्थिक रूप से उत्पादक कार्यों में शामिल नहीं करता है।” इस गलती में सुधार के बाद इकनॉमिक सर्वे 2022-2023 का ऐसा अनुमान है कि साल 2020-21 में एफ़एलएफ़पीआर 46.2 फ़ीसद था।

एक ओर हमें अवैतनिक देखभाल कार्य को मापने के तरीकों का पता लगाने, बेहतर अनुमान सुनिश्चित करने, और अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सांख्यिकीय एजेंसियों से समय पर, उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़े प्राप्त करने की आवश्यकता है। वहीं, दूसरी तरफ़  ऐसा करना घर में महिलाओं की भूमिकाओं से जुड़े पितृसत्तात्मक मानदंडों को और मजबूत कर सकता है और अपने घरों के बाहर निकल कर काम करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए अवसरों को सीमित कर सकता है। 

अर्थव्यवस्था में आया संरचनात्मक परिवर्तन बेहतर एफएलएफपीआर की वजह है

हाल के पीएलएफ़एस आंकड़ों से, भारत में महिला भागीदारी दरों में फ़ेमीनाईजेशन यू हाईपोथिसिस दिखाई पड़ा है। इस परिकल्पना को 1990 से 2013 तक 169 देशों के क्रॉस सेक्शन के आधार पर तैयार किया गया था। यह दिखाता है कि आर्थिक विकास के शुरुआती दौर में महिला श्रम बल भागीदारी में गिरावट आई थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करने वाली महिलाओं के पास घर की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार आने से काम छोड़ने का विकल्प था। हालांकि, जैसे-जैसे आय में वृद्धि होती है, महिलाएं फिर से आर्थिक रूप से सक्रिय हो जाती हैं। आर्थिक गतिविधियों में यह वृद्धि अपने साथ प्रजनन दर और दोनों लिंगों में शिक्षा के अंतर में गिरावट लाती है।

महत्वपूर्ण सकारात्मक रुझान के बावजूद, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी काफी कम है।

भारत के एफएलएफपीआर में हाल में हुए सुधार की वजह देश में हो रहे संरचनात्मक परिवर्तनों को माना जा सकता है। इन परिवर्तनों में प्रजनन दर में गिरावट और महिलाओं की शिक्षा में सुधार शामिल है। महत्वपूर्ण सकारात्मक रुझानों के बावजूद, पुरुषों (57.5 फ़ीसद) की तुलना में महिलाओं की श्रम बल की भागीदारी काफी कम है। इसके अलावा, यह महिलाओं की क्षमता का भरपूर इस्तेमाल न किए जाने के तथ्य को भी सामने लाता है क्योंकि भारत में सभी आयु वर्ग की कामकाज़ी महिलाओं में लगभग 70 फ़ीसद महिलाएं श्रम बल से बाहर हैं। एक दूसरी चिंता यह है कि महामारी के बाद श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी में बढ़त का कारण जरूरत के चलते ग्रामीण महिलाओं के स्व-नियोजित श्रमिकों के रूप में कार्यबल में शामिल होना है।

भारत में कार्यबल में पूर्ण महिला भागीदारी का स्वरूप कैसा होगा?

हमारे कार्यबल में महिलाओं की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने से सरकार और व्यवसायों द्वारा किए गए शुरुआती निवेश का कई गुना अधिक लाभ मिलेगा। मैकिन्जी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक भारत सामान्य जीडीपी (77 करोड़ अमेरिकी डॉलर) के मुकाबले व्यापार में 18 प्रतिशत की वृद्धि हासिल कर सकता है। औपचारिक आर्थिक तंत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से ही भारत की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी का वास्तविक आर्थिक, व्यावसायिक और सामाजिक मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में, पेशेवर व्यवसायों में महिलाएं अपने घरेलू कामों के लिए लोगों को काम पर रखती हैं, जिसके परिणामस्वरूप अधिक लोगों के लिए रोजगार और आय का सृजन होता है। इसी तरह, भारतीय महिलाओं और अर्थव्यवस्था को उन समाधानों से अत्यधिक लाभ होगा जो औपचारिक अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी में सुधार पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसमें अवैतनिक देखभाल कार्य को कम करना, पुनर्वितरित करना और इसके लिए भुगतान करना शामिल है।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

फ़ुटनोट:

  • पीएलएफएस ने इन आंकड़ों को हासिल करने के लिए जुलाई 2020 से जून 2021 के बीच 1,00,344 घरों (ग्रामीण क्षेत्रों में 55,389 और शहरी क्षेत्रों में 44,955) और 4,10,818 लोगों के बीच सर्वे किया। इसलिए, इसके नतीजों को असल आंकड़ों की बजाय अनुमानों की तरह देखा जाना चाहिए।

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लेखक के बारे में
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श्रुति देवड़ा

श्रुति देवड़ा एक एसोसिएट प्रिंसिपल हैं और सत्त्वा कंसलटेन्सी में इकोसिस्टम एंगेजमेंट और पॉलिसी एडवाइजरी की लीड के रूप में काम करती हैं। उन्होंने भारत में और विश्व स्तर पर बहुराष्ट्रीय संगठनों के साथ काम किया है और सामाजिक विकास संगठनों, सहयोगियों, सरकारी हितधारकों और अंतर्राष्ट्रीय फाउंडेशनों के साथ मिलकर नेतृत्व स्तर पर काम का अनुभव रखती हैं। उन्हें जेंडर और शिक्षा परियोजनाओं में रणनीति, कार्यान्वयन, प्रौद्योगिकी और डेटा में विशेषज्ञता हासिल है। श्रुति एक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और उन्होंने अपनी पढ़ाई आईआईएम कोझिकोड और तक्षशिला संस्थान से की है।

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