सितंबर का महीना था। 14 तारीख में बस दो दिन बाकी थे। सुमन जब फील्ड सर्वे से लौटी, तो उसे दफ्तर के बाहर जमीन पर पसरे कुछ बैनर दिखायी दिए। उनमें से एक अधखुले बैनर से बस ‘…..की शुभकामनाएं’ बाहर झांक रहा था। क्यों? क्योंकि जिस भाषा में आप यह पढ़ रहे हैं, सुमन के ढाई कमरे के एनजीओ को उसके संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।
सपनापुर के पूरे जिले में विधायक के व्हाट्सएप्प से लेकर सरकारी दफ्तरों के सूचना-पट्ट (जी वही नोटिस बोर्ड) पर ‘हिंदी पखवाड़ा’ के फरमान जारी हो चुके थे। सुमन, जो सुबह गर्भवती महिलाओं के पोषण का सर्वे करती है और दोपहर में टाइपिंग सिखाती है, को लगता है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हिंदी की दास्तां बड़ी अजब है। ये प्रेम-पत्र भी है और शपथ-पत्र भी। गाली भी है और गीत भी। सत्ता भी है और आंदोलन भी। रोडवेज की बस के पीछे है, तो नेताजी की कुर्सी के ऊपर भी। इसके दर पर सब सेवार्थ आते तो हैं, लेकिन शिक्षार्थ जाते नहीं।
अस्सी के दशक में जब सुमन बड़ी हो रही थी, तब एचएमटी की घड़ियां और चेतक के स्कूटर ब्लैक होने लगे थे। नब्बे आते-आते हिंदी भी रंग बदलकर ब्लू कॉलर होने लगी थी। मेरठ से भोपाल तक 30 दिनों में धाराप्रवाह (या धड़ाधड़) इंग्लिश सिखाने के लिए रैपिडेक्स का आगमन हो चुका था। सिंगल स्क्रीन के डबल शो में हीरो के मुंह से निकला, “अंडरस्टैंड? यू बैटर अंडरस्टैंड!” वीर रस की नयी कविता बन रहा था। अखबारों में नौकरी से लेकर रिश्तों के इश्तेहार शेरलॉक होम्स के जासूसी कोड में में छपने लगे थे। M, 24, Grd, Hdsm। सुमन धीरे-धीरे समझने लगी थी कि आने वाले कल का बस समाचार ही हिंदी रहेगा, रोजगार अंग्रेजी का होगा।
रोजगार की बात चली तो इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में देश ने एक और करवट ली। प्राइवेट कंपनियों के दरवाजे खुले। देश के छोटे-बड़े कस्बों से युवा रैपिडेक्स के बलबूते दुनिया जीत लेने के लिए जैसे ही आगे आए, उन्हें कॉल सेंटरों में “हाओ कैन आई हेल्प यू?” की मल्टीस्टोरी बनाने के काम में लगा दिया गया। सरकारी मंचों पर भी अंग्रेजी का दावा मजबूत होता गया। और फिर, इंटरनेट का धूमकेतु भाषाओं के ब्रह्मांड से टकराया। प्रकृति की दो अविजित रचनाओं के इस टकराव से कालजयी बदलाव हुए। ऐसे बदलाव, जिनसे सुमन की संस्था भी अछूती नहीं रही।
जो रिपोर्टें कभी जमीनी कहानियों से शुरू होती थी, उन्हें अब प्रेजेंटेशन के लिए अंग्रेजी में लिखना जरूरी हो गया। सुमन भी यह समझ चुकी थी कि “रामलाल ने बचत समूह से उधार लेकर साइकिल खरीदी” लिखना भर काफी नहीं है। नए अवसरों को तलाशने के लिए अगर “Ramlal ensured mobility through micro-credit intervention” नहीं लिखा गया, तो उनके काम का ‘इम्पैक्ट’ थोड़ा फीका नजर आ सकता है। पिछले ही महीने वो दिल्ली में एक सेमिनार में गयी थी। वहां जाकर उसे लगा कि डेवलपमेंट सेक्टर को भी एक अलग ग्रह घोषित किया जा सकता है। उसे कुछ लोग मिले, जिन्होंने उससे कहा कि “हमें ग्रासरूट तक पहुंचना है।” सुमन को लगा कि ग्रासरूट का आदमी तो पहले से ही घास पर बैठा हुआ है। उससे मिलने का कौन सा रास्ता बताऊं?
इस बीच, जिला प्रशासन से आदेश आया कि सभी स्थानीय संस्थाओं को ‘हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत वाद-विवाद प्रतियोगिता कराना अनिवार्य है।’ प्रतियोगिता का विषय था, ‘हिंदी: विकास की भाषा।’ सुमन को टाइपिंग क्लास के युवाओं को तैयार करने की जिम्मेदारी दी गयी। जब उसने उनसे पूछा कि वे इस बारे में क्या सोचते हैं, तो एक लड़के ने पूछा कि किसके विकास की बात हो रही है? हमारी या सरकार की? दूसरे ने कहा, “मैडम, नौकरी होगी तो विकास होगा। हिंदी से नौकरी मिलेगी क्या?”
दफ्तर में हिंदी पखवाड़े की तैयारियां जोरों पर थी। गूगल ट्रांसलेट पर रेलवे स्टेशन के जासूसी उपन्यासों से भी अधिक रहस्यमयी हिंदी जन्म ले रही थी। हिंदी दिवस से ठीक दो दिन पहले ‘Self Help Group’ को ‘आत्म-सहायता पार्टी’ लिखा जा रहा था, तो ‘National Health Mission’ ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य यात्रा’ बन चुका था। सुमन ने मन ही मन सोचा कि क्या बीमारों को इस यात्रा का भत्ता दिया जाएगा?
शाम हो चली थी और सावन-भादो के बाद की उमस में एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था। सुमन ने जैसे ही पानी से गला तर किया, उसे लगा कि सरकारें ‘पानी पखवाड़ा’ क्यों नहीं मनाती? फिर उसे याद आया कि पानी तो लोग रोज ही पीते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे लोग हिंदी रोज बोलते हैं। इतने में उसके एक सहयोगी उसे ‘हिंदी दिवस उत्सव’ का निमंत्रण कार्ड थमा गए। सुमन को ऐसा लगा जैसे वो किसी शादी का कार्ड हो, जिसमें दूल्हा-दुल्हन को छोड़कर बाकी सब खुश हैं।




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