July 27, 2022

आईडीआर इंटरव्यूज । सुषमा अयंगर

कच्छ में अपने अभूतपूर्व काम के लिए जानी जाने वाली सुषमा अयंगर आईडीआर से बातचीत में बता रही हैं कि उनका सारा ध्यान महिला अधिकार और ग्रामीण विकास पर क्यों हैं। साथ ही उन्हें क्यों लगता है कि आज महिला सशक्तिकरण का दायरा आर्थिक परिवर्तन तक सीमित है।
11 मिनट लंबा लेख

सुषमा अयंगर एक सामाजिक कार्यकर्ता और कच्छ महिला विकास संगठन (केएमवीएस) की संस्थापक हैं। केएमवीएस महिलाओं को इस तरह से सक्षम बनाने पर काम करता है कि वे अपने गांव समुदाय और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी पहलों में पूरे आत्मविश्वास के साथ शामिल हो सकें और फ़ैसले लेने में अपनी ज़िम्मेदारी निभा सकें।

बीते तीन दशकों से सुषमा देश भर में लैंगिक न्याय, लोक संस्कृति, पारंपरिक आजीविका, स्थानीय शासन और आपदा पुनर्वास के क्षेत्रों में बड़े बदलाव लाने वाले कार्यक्रमों का नेतृत्व कर रही हैं। सुषमा ने ज़मीनी स्तर पर कई तरह के अभियान चलाए और उन्हें आगे बढ़ाया है। इसमें कच्छ नव निर्माण अभियान जो कि नागरिक संगठनों का एक ज़िला-स्तरीय नेटवर्क है और शिल्पकारों के लिए बनाया गया ख़मीर नाम का मंच भी शामिल हैं। सुषमा ने पिक्चर दिस! पेंटिंग द विमेंस मूवमेंटनाम की एक किताब भी लिखी है।

आईडीआर के साथ अपनी इस खास बातचीत में उन्होंने भारत में नारीवादी आंदोलन के विकास के बारे में बात की है और बताया है कि कैसे इस आंदोलन ने उन्हें कच्छ के सूखा-ग्रस्त इलाक़ों में महिलाओं के साथ काम करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही वे इस बात का भी जिक्र करती हैं कि महिलाओं की लैंगिक भूमिकाओं और पितृसत्ता को चुनौती देने वाली योजनाएं क्यों जरूरी हैं। इसके अलावा, वे यह भी समझाती हैं कि एसएचजी (स्व-सहायता समूह) आंदोलनों के आंकड़ा केंद्रित होने के चलते कैसे महिलाओं का सशक्तिकरण अधूरा रह गया है।

जीवन के शुरुआती दौर में आपको किन चीजों ने प्रभावित किया?

मेरा जन्म और पालन-पोषण गुजरात के बड़ौदा ज़िले में हुआ। आज़ादी के तुरंत बाद ही मेरे माता-पिता रहने के लिए शहर में आ गए। मेरे पिता एक माइक्रोबायआलॉजिस्ट थे और उन्होंने बड़ौदा में यहां के शुरूआती पेनिसिलिन संयंत्रों में से एक के साथ अपना काम शुरू कर दिया।

बेशक मेरा बचपन मेरे माता-पिता से बहुत प्रभावित रहा लेकिन इस पर बड़ौदा के सांस्कृतिक परिवेश का भी असर हुआ। ये मेरा सौभाग्य था कि बहुत कम उम्र से ही मुझे ये अनुभव मिलते रहे। मेरे पिता एक सहृदय व्यक्ति थे और उन्होंने मेरी दुनिया को ढ़ेर सारी किताबों और दिमाग़ी कसरतों से भर दिया था। उन्होंने ही मेरे अंदर जिज्ञासा और सवाल पूछने की आदत विकसित की। दूसरी तरफ़ मेरी मां थीं जो हमारे परिवार की ‘कर्ताधर्ता’ थीं। वे एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने हर काम का ज़िम्मा अपने ऊपर ले लिया था और वो कभी भी किसी काम के लिए ना कहना नहीं जानती थीं। मेरे जीवन में आई वह पहली नारीवादी थीं लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक जीवन में कदम नहीं रखा।

मां ने ही मेरा और मेरी बहनों का दाख़िला हमारे भाई के साथ लड़कों वाले स्कूल में करवाया। वे हमें मिशनरी स्कूलों वाली शिक्षा देने के ख़िलाफ़ थीं। उनका मानना था कि उन स्कूलों में लड़कियों को अधिक ‘लड़की’ होने का प्रशिक्षण दिया जाता है। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे लगता है कि लड़कों के स्कूल में हुई पढ़ाई ने ही मुझे आगे चलकर महिलाओं और पुरुषों दोनों से जुड़े लैंगिक मुद्दों पर काम करने के लिए प्रेरित किया।

मेरे जीवन पर बड़ौदा का भी बहुत गहरा असर है। 1960 और 70 के दशक में यह विश्वविद्यालयों वाला शहर हुआ करता था। पूरे देश के छात्र, कलाकार और अकादमिक दुनिया के लोगों का यहां जमावड़ा रहता था। जब मैं बड़ी हो रही थी तब सर्दी के मौसम में लगभग हर दिन कॉन्सर्ट, कविता-पाठ और नाटक होता था।

कॉलेज में मैंने अंग्रेज़ी साहित्य चुना और उसके बाद साहित्य और अर्थशास्त्र में मैंने एमए किया। इस समय तक मैं इस साहित्य और किताबों की दुनिया में रहते हुए बेचैनी महसूस करने लगी थी। मुझे ऐसा लगता था जैसे ‘बाहर की दुनिया’ से अलग मैं किसी दूसरी दुनिया में जी रही हूं। यह 1970 और 80 के दशक का शुरुआती दौर था और भारत की राजनीति में भारी उथल-पुथल हो रही थी। आपातकाल, जयप्रकाश नारायण आंदोलन, जॉर्ज फर्नांडिस बड़ौदा डायनामाइट विस्फोटऐसा लग रहा था जैसे पूरा देश किसी न किसी मुद्दे पर उबल रहा था। युवा वर्ग कुछ नया ढूंढ रहा था और सड़कों पर उतर आया था। लगभग उसी समय भारत में नारीवादी आंदोलन भी शुरू हो चुका था जो महिलाओं के ‘कल्याण’, ‘उत्थान’ और ‘विकास’ से अलग महिलाओं की पहचान, उनके अधिकार और समाज में उनकी स्थिति और जगह की तरफ़ ध्यान देने की बात कह रहा था।

सामाजिक कार्यकर्ता और कच्छ महिला विकास संगठन की संस्थापक सुषमा अयंगर का चित्रण-महिला सशक्तिकरण
चित्रण: आदित्य कृष्णमूर्ति

मैं स्वयं भी राजनीतिक रूप से जागृत एक ऐसे इंसान में बदल रही थी जो सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेने के लिए बेचैन थी। साहित्य के प्रति अपने प्रेम और मेरी बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक रुचि के बीच की खींचातानी में मैंने पाया कि राजनीतिक पत्रकार बनकर मैं साहित्य से एक्टिविज्म की ओर बढ़ सकती हूं। इसलिए अपने जीवन के अगले ढाई वर्ष मैंने अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में बिताए और वहां डेवलपमेंट कम्यूनिकेशन विषय में मास्टर्स की पढ़ाई की।

एक बार मैं वहां पहुंच गई तो मैंने डेवलपमेंट कम्युनिकेशन की पढ़ाई के अलावा सब कुछ किया। ऐसा पहली बार हो रहा था कि मैं दुनियाभर से आए छात्रों से बात कर रही थी। इस पूरी प्रक्रिया ने मुझे अलग-अलग नज़रियों और वामपंथ समेत अन्य विचारधाराओं से अवगत कराया। इन्हीं दिनों में मुझे ब्राज़ील के शिक्षक पाओलो फ़्रेयर के सिद्धांत के बारे में पता लगा था। उस समय तक मैंने गांधी, अम्बेडकर और विनोबा भावे के कामों के बारे में काफ़ी कुछ पढ़ लिया था। लेकिन यह फ्रेयर थे जिनके तरीकों ने मुझे प्रभावित किया और आने वाले समय में महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के लिए किए जाने वाले मेरे कामों के लिए मुझे तैयार किया। 

भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित कच्छ में काम करने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?

दरअसल अपने अमेरिका प्रवास के दिनों में ही मुझे अहसास हो गया था कि मैं भारत की ग्रामीण महिलाओं के साथ काम करना चाहती हूं। पढ़ाई पूरी करके वापस लौटने के बाद मैं सोच रही थी कि अब मुझे क्या करना है और उसकी शुरूआत कैसे की जा सकती हैं। इसी दौरान मैं सेवा की संस्थापक इलाबेन (भट्ट) का इंटरव्यू लेने अहमदाबाद गई थी। इसी यात्रा में मेरी मुलाक़ात जनविकास के संस्थापकों फिरोज़ कांट्रैक्टर और गगन सेठी से हुई। जनविकास ने हाल ही में भारत के गांवों में जाकर काम करने वाले पेशेवर युवाओं की मदद करने वाले एक सुविधाजनक मंच के रूप में अपना काम शुरू किया था। फिर वे कच्छ जाने और 1989 में कच्छ महिला विकास संगठन की नींव डालने वाले सहायक बन गए। केएमवीएस ने अपना पूरा ध्यान कच्छ की शहरी और ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय समूहों में संगठित करने पर केंद्रित किया ताकि वे अपने जीवन, समुदायों और अन्य क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को पहचानने और उनके समाधान में सक्षम हो सकें। 

1980 के दशक में भारत तेज़ी से बदल रहा था। दिल्ली स्थित जागोरी और सहेली जैसे महिला संगठनों ने अपने रचनात्मक अभियानों, प्रशिक्षण और संसाधनों के वितरण के ज़रिए महिलाओं को जागरुक करना शुरू कर दिया था। वहीं गुजरात में सेवा ने पहले से ही अनौपचारिक क्षेत्रों में ट्रेड यूनियनों और सहकारी समितियों के साथ मिलकर महिलाओं के साथ काम करना शुरू कर दिया था और ग्रामीण समूहों का निर्माण कर रहा था।

भारत में पहली बार राजस्थान सरकार ने डबल्यूडीपी नाम से महिलाओं के विकास के लिए एक कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं को उनसे संबंधित मुद्दों पर संगठित किया जाता था। नारीवाद और ग्रामीण सशक्तिकरण से जुड़ने का यह बहुत अच्छा समय था। हालांकि मैंने ऐसा महसूस किया कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों का अब भी ग्रामीण विकास के गम्भीर मुद्दों में शामिल होना बाक़ी था। मैं इसी मुद्दे पर काम करना चाहती थी और इसे विस्तार से जानना और समझना चाहती थी।

1985 से 1988 तक लगातार पड़ने वाले सूखे के कारण कच्छ के लोग भारी संख्या में पलायन कर रहे थे और केवल महिलाएं पीछे छूट गई थीं। हालांकि उस समय इस इलाक़े में कई कल्याणकारी संस्थाएं अपना काम कर रही थीं लेकिन सामुदायिक सशक्तिकरण, ख़ासतौर पर महिलाओं के मामले में उनका कोई काम दिखाई नहीं दे रहा था। कच्छ ने मुझे कई तरह से इसके संकेत दिए और मैंने उन संकेतों को समझ लिया।

कच्छ में महिलाओं के साथ आपने किस तरह के काम किए?

कच्छ में सूखा पड़ते रहने के कारण आप अक्सर ही महिलाओं को सूखा राहत वाले इलाक़ों में कड़ी मेहनत करते देख सकते हैं। न्यूनतम मज़दूरी पर ये औरतें कड़ी धूप में बेकार के गड्ढे खोदती रहती हैं। इन्हीं दिनों सूखा राहत कार्यक्रम के तहत सरकारी हस्तशिल्प निगम ने कच्छ की स्थानीय शिल्प में निवेश करना और उसकी ख़रीद शुरू कर दी थी। ये सभी उत्पाद कच्छ की औरतें बनाती थीं। जहां एक तरफ़ कच्छ के इन कशीदों वाले उत्पाद की मांग और आपूर्ति की एक बड़ी ऋंखला तैयार हो गई थीं वहीं इनका नियंत्रण बिचौलियों के हाथों में आ गया था। ये सभी बिचौलिए पुरुष ही थे नतीजतन औरतों को उनके श्रम के लिए न के बराबर पैसे मिलते थे।

केएमवीएस में हमें इस बात का अहसास हुआ कि महिलाओं को जल स्त्रोतों और उनकी भूवैज्ञानिक स्थिति का गहरा ज्ञान है।

इससे भी अधिक जल संकट उनकी इस विकट स्थिति का मुख्य कारण था। सरकार द्वारा ट्यूब वेल के माध्यम से जल के मुख्य स्त्रोत से 120 किलोमीटर दूर स्थित गांवों तक पानी पहुंचाने के प्रयास के बावजूद पारम्परिक जल-स्त्रोत अस्त-व्यस्त स्थिति में थे। इस क्षेत्र के पुरुष अपने मवेशियों के साथ पलायन कर रहे थे और जीवन चलाने का बोझ अब पूरी तरह से औरतों पर आ चुका था। फिर भी समाधान के लिए कोई भी इस इलाक़े के लोगों के पास नहीं जा रहा था और महिलाओं के पास तो बिल्कुल भी नहीं। केएमवीएस में हमें जल्द ही इस बात का अहसास हो गया कि इलाक़ों की औरतों को जल स्त्रोतों और उनकी भूवैज्ञानिक स्थिति का गहरा ज्ञान है। इस समस्या का समाधान निकालने को लेकर औरतें अधिक चिंतित थीं और सरकारी अक्षमताओं और भ्रष्टाचार के विरोध को लेकर पुरुषों की तुलना में अधिक गम्भीर थीं। इस तरह पानी वह मुख्य मुद्दा बन गया जिसके इर्द-गिर्द पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों को लाया गया।

यहां पर एक बात का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है कि हम लोगों ने जिन समुदायों के साथ मिलकर काम शुरू किया था, उनमें से कुछ समुदायों की औरतों को अपने घर के आंगन से बाहर निकलने तक की अनुमति नहीं थी। ऐसे में महिलाओं के लिए यह समझाना आसान था कि क्यों उन्हें कम मेहनताना मिलता है, क्यों अपने बनाए उत्पादों के लिए पहचान नहीं मिलती लेकिन अपने स्वास्थ्य, ख़ासकर प्रजनन से जुड़े मामलों में वे चुप ही रहतीं थीं। 

फिर ऐसे में कोई शुरूआत कहां से करेगा? संगठनों ख़ासकर उनकी महिला सदस्यों से हमारी बातचीत में हमने सीखा कि अपने घर-परिवार में पितृसत्ता के मुद्दों को सामने लाने के लिए पहले महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में आना होगा, मिलकर पूरे गांव को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाना होगा और पुरुषों के आधिपत्य का मुक़ाबला करना होगा।

बदलाव की इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले एक ऐसी जगह बनानी ज़रूरी थी जहां सभी महिलाएं इकट्ठी होकर अपनी मुश्किलों और चुनौतियों पर बात कर सकें। इस तरह सामूहिक प्रयासों, सोच-विचार और खुद से पहचान के लिए एक जगह के रूप में महिला संगठन का जन्म हुआ।

पुरुषों ने महिलाओं के सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करने या उनके कोई सार्वजनिक भूमिका निभाने का विरोध किया।

कोई काम करने और फिर उस पर सोच-विचार करने की वह प्रक्रिया, जिससे हमारी समझ बनती है, ने महिलाओं को उनकी सामाजिक हैसियत का अंदाज़ा लगाने में मदद की। इससे महिलाएं यह समझने लग गईं कि उन्हें कैसे और क्यों दबाया जाता है। हालांकि साथ आने का मतलब हमेशा ही समस्याओं के हल खोजना नहीं था। महिला मंडलों और संगठनों ने औरतों को मौक़ा दिया कि वे अपने जीवन और अपनी बदलती दुनिया के बारे में एक-दूसरे से बातचीत कर सकें, एक साथ नाच-गा सकें, ठहाके लगा सकें, बहस कर सकें, आपस में लड़ सकें, अपनी असहमतियों को व्यक्त कर सकें और एक नई पहचान बना सकें। इस पूरी प्रक्रिया में हम सभी के बीच दोस्ती के कई रिश्ते बने। सबसे ज़रूरी बात कि जब मैं कच्छ की औरतों के जीवन का हिस्सा बनने की कोशिश कर रही थी तब मैंने उन्हें भी अपनी अंदरूनी दुनिया का हिस्सा बनने दिया। जब तक आप खुद नहीं खुलते हैं तब तक आप किसी समूह से खुलने और अपनी बातें साझा करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

मौज-मस्ती से भरे कई लंबे सत्रों के बाद औरतों ने धीरे-धीरे महिलाओं और पुरुषों और उनकी लैंगिक भूमिकाओं को एक बदल सकने वाली सामाजिक संरचना के रूप में पहचानना शुरू किया। अपनी परिस्थितियों और फैसलों पर सोच-विचार करने के दौरान हमने यह समझने की कोशिश की कि किसी स्थिति विशेष में हमने एक ख़ास तरीक़े से ही व्यवहार क्यों किया होगा। यहां पर सभी को सीखना था कि उन्हें तय सामाजिक पैमानों के मुताबिक़ न तो महसूस करना है, न ही सोचना है और न ही वैसा होना है जैसा होने की उम्मीद उनसे की जाती है।

निश्चित रूप से इसका विरोध भी हुआ। समुदाय के पुरुष सदस्यों ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने या सार्वजनिक भूमिका निभाने का विरोध किया। मुझे 1990 के दशक के शुरुआती दिन याद आ रहे हैं जब एक गांव की महिलाएं 40 वर्षों से बंद पड़े एक जल-निकाय को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही थीं। तब गांव के पुरुष नेताओं ने उन महिलाओं पर मुक़दमा दायर कर दिया और अदालत में यह दावा किया कि जल निकाय वाली ज़मीन उन में से ही एक की है। यह महिलाओं के लिए एक यादगार पल बन गया। पुरुषों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि पहले उन्हें घरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी लेकिन अब इन पुरुषों के कारण वे अदालत तक पहुंच चुकी हैं। आख़िरकार अपने चैंबर में महिलाओं के एक समूह से मिलने के बाद चौंका देने वाला फ़ैसला सुनाते हुए जज ने अदालत के बाहर समझौता करने का आदेश दिया जो कि महिलाओं के पक्ष में गया।

जब से आपने काम शुरू किया था तब से लेकर आज तक महिलाओं के आंदोलन की विकास यात्रा के बारे में हमें बताइए?

जब मैंने महिलाओं के साथ काम करना शुरू किया तब तक ग्रामीण मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के महिला समूहों ने आकार लेना शुरू कर दिया था। ऐसी हज़ारों-लाखों अपरिचित महिलाओं के साथ मिलकर एक नया भविष्य बनाने की साझी कोशिश का भाव अभिभूत करने वाला था।महिला समूहों के बढ़ते प्रभाव ने सरकारों, दानकर्ताओं और नागरिक संगठनों में ख़ासा जोश भर दिया था। इनके कारगर होने के चलते इन समूहों की संख्या बढ़ाना और उन्हें औपचारिक रूप देना ज़रूरी हो गया। इस तरह स्व-सहायता समूहों को तरक्की मिलना शुरू हो गई।

एसएचजी आंदोलन के साथ, लोगों का अधिक ध्यान महिलाओं को समझदार बनाने से हटकर अब आंकड़ों और ठोस आर्थिक उपलब्धियों पर जाने लगा था। कई एसएचजी इन मामलों में काफी सफल भी रहे लेकिन इन महिला आंदोलनों के केंद्र में अब कहीं न कहीं केवल आर्थिक बदलाव ही था। एसएचजी ने महिलाओं को ग़रीबी से निकालने में तो मदद की लेकिन ये सामाजिक-आर्थिक ढांचे में उनकी लैंगिक स्थिति को बदलने में उतने कारगर नहीं रहे। 1980 और 90 के दशक के महिला आंदोलनों में बदलाव की जिन प्रक्रियाओं में निवेश किया गया, महिला सशक्तिकरण के लिहाज़ से देखें तो ये सफल नहीं रहीं। इस तरह ‘महिला सशक्तिकरण’ शब्द तो प्रचलित हो गया लेकिन अब इसे एक संकीर्ण विचार की तरह देखा जाने लगा है। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे महिलाओं के आंदोलन की आत्मा गुम हो चुकी है।

इसके अलावा, तमाम योजनाओं में महिलाओं को किसी सजावट की तरह इस्तेमाल किया जाता हैमुझे मालूम है मैं आंदोलन का मज़ाक़ सा उड़ा रही हूंलेकिन अक्सर मुझे ऐसा लगता है जैसे सशक्तिकरण का ठेका महिलाओं को ही दे दिया गया है। लैंगिक भूमिकाएं हों या सामाजिक बदलाव, पुरुष अक्सर जिम्मदारियों से मुक्त नज़र आते हैं। मैं अभी तक नहीं समझ पाई हूं कि एसएचजी जो कि आजीविका सृजन का एक साधन भर हैवह महिलाओं को संगठित कर काम करने वाला एक ख़ास सामुदायिक संस्थान कैसे बन गया? हमारे पास पुरुषों के लिए भी एसएचजी क्यों नहीं है?

मुझे जो सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है वो यह है कि स्थानीय स्वशासन को अनिवार्य करने वाले 73वें संशोधन ने पिछले दो दशकों में महिलाओं की स्थिति बदलने में मुख्य भूमिका निभाई है। स्थानीय शासन के मामले में गांव और शहर, दोनों जगह महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी उल्लेखनीय रही है।

एक बात जो मैं अक्सर खुद से और युवाओं से कहती हूं वह यह है कि हमारे सामने चाहे कितना भी अंधेरा क्यों हो, हमें बस इतना देखना है कि वह कहीं से हमारे भीतर न जाने पाए।

जैसे-जैसे और जितनी महिलाओं ने सार्वजनिक क्षेत्रों में अपनी जगह बनाई है, उतना ही उनके लिए समाज का विरोध तेज होता गया है। इसे समझने के लिए जगह, नस्ल, धर्म, जाति और उम्र से परे महिलाओं और लड़कियों के साथ होने वाली यौन हिंसा के क्रूरतम होते स्वरूप को देखिए। इसका एक बड़ा उदाहरण कर्नाटक में हिजाब पर लगाया गया प्रतिबंध और इसके कारण महिलाओं और लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा है।

पिछले दो दशकों में होने वाले महिला आंदोलनों द्वारा हासिल उपलब्धियों और उसकी प्रगति के बारे में आज जब मैं सोचती हूं तो मुझे दो बड़े बदलाव नज़र आते हैं। पहला, ज़्यादातर महिलाओं के समूह और विशेष रूप से एसएचजी केवल आर्थिक परिवर्तन का साधन भर बन चुके हैं। दूसरा, हमारे समाज में साम्प्रदायिक नफ़रत का बढ़ना, महिलाओं के आंदोलनों की उन संभावनाओं को ख़त्म कर रहा है जो उन्हें जाति, वर्ग, लिंग या धार्मिक विश्वासों से परे एक बनाती थीं।

विकास के क्षेत्र में पहले से काम कर रहे युवाओं या काम शुरू करने वाले लोगों के लिए आपका क्या संदेश है?

हर दौर की अपनी चुनौतियां होती हैं। उदाहरण के लिए आज हमारे सामने कट्टरता सबसे बड़ी चुनौती है, यह एक ऐसी चीज़ है जिसका सामना हमने इससे पहले कभी नहीं किया था। इसलिए मैं अपना कोई वास्तविक अनुभव नहीं बता सकती हूं। और, मैं अपनी कही बातों को सलाह की बजाय हमारे और हमारे समय की विवेचना की तरह देखती हूं।

हर दिन मैं खुद से और अक्सर युवाओं से भी एक ही बात कहती हूं कि हमारे सामने चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न हो हमें बस ये देखना है कि यह हमारे भीतर ना जाने पाए। एक बार अगर ये अंधेरा हमारे भीतर घर कर ले तो सब ख़त्म हो जाता है। इससे बचने के लिए हमें अंदर से बदलते रहना होगा और लगातार अपने अनुभव, विश्वास और प्रेरणा को बनाए रखना होगा। हमारे क्षेत्र में काम करने वाले ज्यादातर लोगों का ध्यान अक्सर बाहरी बदलावों पर इतना केंद्रित होता है कि हम अपने भीतर टटोलना भूल जाते हैं। यहां काम करते हुए अपना सबसे बेहतरीन काम पूरे समर्पण से करते रहने के लिए, हौसला बनाए रखने के लिए और हर तरह के दमन, दबदबे और अन्याय का विरोध करते रहने के लिए लोगों को खुद पर भरोसा रखना चाहिए। इसके लिए हर पल अपने आप के प्रति जागरुक रहने की आदत डालनी होगी।

मुझे लगता है कि हम में से हर एक को आज बढ़ रही असहिष्णुता और नफ़रत का विरोध करने और अपनी गतिविधियों और सोच में अहिंसा की भावना को दोबारा शामिल करना ज़रूरी है।

मैं जिन युवाओं से बात करती हूं, उनमें से ज्यादातर मुझे बताते हैं कि वे किस तरह के दबावों का सामना कर रहे हैं। वे कुछ बड़ा और प्रभावशाली करना चाहते हैं जिससे सोशल मीडिया पर हर दिन अपनी उपलब्धियों के बारे में बता सकें। यह भावना लगातार उनके अंदर एक बेचैनी और कमतर होने का एहसास बनाए रखती है।

इसलिए मैं यहां जो बताना चाहती हूं वो यह है: हमें छोटे-मोटे कामों को करने में झिझक नहीं महसूस करना चाहिए। छोटी चीज़ें सुंदर होती हैं। अगर हम अपने भीतर छोटी-छोटी बातों और ख़्वाहिशों को ज़िंदा रखते हैं तो हमारा दिल बड़ा होता जाता है। इससे हममें बड़प्पन आता है और हम बेहतर इंसान बनते हैं। हमें खुद को याद दिलाते रहना होगा कि बड़ा बदलाव छोटी-छोटी कोशिशों के चलते ही आता है।

लेकिन जब हम बड़ा बनने की इच्छा के दबाव में आ जाते हैं तो हम उतने सहृदय नहीं रह जाते हैं।

मुझे यह भी लगता है कि बतौर नागरिक संगठन हम इस सामूहिक जड़ता से निकलने के लिए अभी जितना काम कर रहे हैं उससे अधिक करने की ज़रूरत है। हमें पहले से हो रहे काम से आगे बढ़ने की ज़रूरत है। शायद हमें कुछ कदम पीछे जाने की ज़रूरत है, नई तरह से सोचने की और उन युवा प्रतिभाओं से जुड़ने की जो गांवों, क़स्बों, शहरों की बस्तियों, विश्वविद्यालयों में हैं। अपना आगे का रास्ता बनाने के लिए हमें वंचित से लेकर सबसे संपन्न लोगों तक सबको अपने साथ लाने की ज़रूरत है।

अगर आज हम अपने समाज में मूल्यों को आगे बढ़ाने वाले नहीं बनते हैं तो भविष्य में पछताएंगे। मुझे लगता है हम सभी को आज बढ़ती असहिष्णुता औऱ नफ़रत का विरोध करना चाहिए और अपने काम करने के तरीक़े और सोच में अहिंसा के विचार को वापस लाना चाहिए। अहिंसा और कुछ नहीं बस प्रेम का होना भर हैजहां प्रेम होगा वहां हिंसा नहीं होगी। 

सभ्यताओं ने बदलाव के कई ऐसे दौर देखे हैं जब निराशा और अंधकार हावी हो गए। लेकिन शायद यह अंधेरा घिरता इसलिए है ताकि हम दरारों से आने वाली रोशनी देख सकें।

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अधिक जानें 

  • इस संवादात्मक लेख के माध्यम से पिछले दशक के भारत के नारीवादी आंदोलन के बारे में विस्तार से जानें।
  • भारत की नारीवादी आंदोलन की सबसे प्रखर आवाज़ों में से एक कमला भसीन के साथ किए गए इस इंटरव्यू को पढ़ें।
लेखक के बारे में
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रचिता वोरा

रचिता वोरा आईडीआर की सह-संस्थापक और निदेशक हैं। इससे पहले, उन्होंने 250 करोड़ रुपये के बहु-हितधारक मंच, दसरा गर्ल एलायंस का नेतृत्व किया, जिसने भारत में मातृ, किशोर और बाल स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करने की मांग की। उनके पास वित्तीय समावेशन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सीएसआर के क्षेत्रों में टीमों का नेतृत्व करने और रणनीति, व्यवसाय विकास और संचार में कार्य करने का एक दशक से अधिक का अनुभव है। रचिता ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जज बिजनेस स्कूल से एमबीए और येल यूनिवर्सिटी से इतिहास में बीए किया है।

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श्रेया अधिकारी

श्रेया अधिकारी आईडीआर में एक संपादकीय सहयोगी हैं और लेखों को लिखने, उनके संपादन, सोर्सिंग और प्रकाशन की ज़िम्मेदारी सम्भालती हैं। उन्हें मीडिया एवं संचार के क्षेत्र में पांच साल से अधिक का अनुभव है। साथ ही वह सोशल मीडिया प्रबंधन, ब्रांडिंग और रणनीति की भी विशेषज्ञ हैं। उन्होंने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल सहित भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कला एवं संस्कृति उत्सवों में कोर टीम सदस्य के रूप में इनसे जुड़ी तैयारियों और उनके आयोजन पर काम किया है।

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