October 26, 2022

जहां चाह वहां राह

वाराणसी के एक छात्र रिलेशनशीप मैनेजर के जीवन का दिन जो ख़ासकर महामारी के दिनों में युवाओं को रोज़गार के लिए कौशल विकास में प्रशिक्षण देती हैं।
6 मिनट लंबा लेख

मैं 2018 से मेधा नाम के एक समाजसेवी संस्था के साथ मिलकर स्टूडेंट रिलेशनशीप मैनेजर (एसआरएम) के रूप में काम कर रही हूं। मेधा युवाओं को उनकी पसंद का काम शुरू करने में मदद करती है। मैंने अपना पूरा जीवन वाराणसी में बिताया है; मैंने स्कूल से लेकर अपनी एम ए तक की पढ़ाई यही की है और अब काम भी यहीं करती हूं।

एक एसआरएम के रूप में मेरी प्राथमिक ज़िम्मेदारी हमारे कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को प्रशिक्षित करना है। इसके अलावा, मैं वाराणसी के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कर्मचारियों के साथ भी नियमित रूप से सम्पर्क में रहती हूं। और चूंकि हम अपने छात्रों को करियर के अवसरों से जोड़ते हैं, इसलिए मैं उद्योग के विशेषज्ञों और नियोक्ताओं के साथ भी संवाद कायम रखती हूं।

मैं हमेशा यात्राओं में रहती थीछात्रों से मिलना, उनके लिए सत्र आयोजित करना, संभावित नियोक्ताओं से उनका सम्पर्क आदि करवाना मेरे काम का हिस्सा था।

महामारी और लॉकडाउन के पहले मैं यात्राओं में रहती थी – छात्रों से मिलना, उनके लिए सत्र आयोजित करना, संभावित नियोक्ताओं से उनका सम्पर्क आदि करवाना मेरे काम का हिस्सा था। हालांकि महामारी के दौरान सब कुछ बदल गया और मेरे काम ने पूरी तरह से आभासी रूप ले लिया। यह मेरे छात्रों, नियोक्ताओं के साथ-साथ मेरे लिए भी एक मुश्किल बदलाव था। हमारे पास इस स्थिति में दृढ़ता से खड़े होने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था और अब हम सब इस नए नियम से तालमेल बैठा चुके हैं।

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सुबह 6 बजे: लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही मैं सुबह सोकर जल्दी जागने लगी हूं। जागते ही मैं अपने छत पर रखे पौधों को पानी देने जाती हूं। मैं अपना कुछ समय रस्सी कूदने में भी बिताती हूं। जिस दिन मुझे रस्सी कूदने का मन नहीं करता है उस दिन मैं पंजाबी गानों पर नाचती हूं और इस तरह मेरे दिन की शुरुआत होती है।

सुबह 9 बजे: सुबह का नाश्ता तैयार करने और खाने के बाद मैं एक कप गर्म चाय लेकर अपने कमरे में जाती हूं और अपना काम शुरू करती हूं। शुरुआत में आभासी प्लैटफ़ॉम के इस्तेमाल के साथ सहज होने में छात्रों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। इससे पहले मेधा के पाठ्यक्रमों में रुचि रखने वाले छात्र अपने कॉलेज में ही अपना रजिस्ट्रेशन करवाते थे। रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में किसी भी तरह की मुश्किल आने पर मैं वहीं उनकी मदद करके समस्या सुलझा देती थी। अब सब कुछ ऑनलाइन था। मुझे रजिस्ट्रेशन, ऑनलाइन भुगतान और यहां तक कि विडियो प्लैटफ़ॉर्म के इस्तेमाल के लिए भी उन्हें प्रशिक्षण देना पड़ता था।

इसलिए, आमतौर पर मैं सुबह का अपना समय इन मामलों और शंकाओं से निपटने और ई-मेल और मैसेज के जवाब देने में लगाती हूं। इसके बाद, अपने क्षेत्र के मैनेजर से उस दिन की मेरी योजनाओं के बारे में पूछती हूं। अपने पहले सत्र को शुरू करने के बीस मिनट पहले मैं उन गतिविधियों पर एक नज़र डालती हूं जो मैं करने वाली हूं। आज के अपने इस सत्र में मैंने छात्रों को अख़बार लाने के लिए कहा है।

सुबह 11 बजे: प्रत्येक सत्र 60-90 मिनट का होता है। हमारे छात्रों ने माइक्रोसॉफ़्ट टीम्स के उपयोग के बारे में सीख लिया है जो उनके पहले से इस्तेमाल किए जाने वाले प्लाट्फ़ोर्म से अलग है। मैं अपने प्रत्येक बैच के पहले कुछ सत्रों में छात्रों को इस्तेमाल किए जाने वाले प्लैट्फ़ॉर्म के बारे में विस्तार से बताती हूं। इससे उन्हें बातचीत करने और बाद में सत्रों का अधिक से अधिक लाभ उठाने में आसानी होती है।

टेबल के चारों ओर बैठे युवा पेशेवरों से बात करती महिला_कौशल विकास
धीरे-धीरे मैंने आत्मविश्वास हासिल किया और मुझे महसूस हुआ कि अपने छात्रों को सुनने और उनके साथ जुड़ने से भी मैं बहुत कुछ सीख रही थी। | चित्र साभार: सोनाली सिंह

आज की गतिविधि के लिए मैंने सभी छात्रों को काले, नीले, लाल और हरे चार समूहों में बांटा है। मैंने प्रत्येक समूह को अख़बार के इस्तेमाल से एक ही आकार के नांव बनाने और उनकी तस्वीर लेकर कोलाज बनाने और सबके साथ साझा करने का काम दिया है। चालीस मिनटों के अंदर सबसे अधिक संख्या में नांव बनाने वाले टीम को विजेता घोषित किया गया। इस गतिविधि को करने के पीछे का लक्ष्य यह जानना था कि कौन से छात्र आगे आकर ज़िम्मेदारी सम्भालते हैं। इससे उन्हें टीम का नेतृत्व करने और सीमित समय में काम को पूरा करने के तरीक़ों को सीखने का अवसर मिला। गतिविधि के अंत में समूहों के बीच इस बात को लेकर चर्चा हुई कि कौन सा तरीक़ा कारगर था, क्या असफल रहा और विजेता टीम क्यों बेहतर थी आदि। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे छात्रों को सीखने का अनुभव मिलता है। आत्मविश्वास और पहल की आवश्यकता जैसे विषयों पर बात करते समय मैं हमेशा अपना उदाहरण देती हूं।

मैं इस बात को लेकर डरी हुई और सशंकित थी कि क्या मेरे छात्र मेरे द्वारा दी जाने वाली जानकारियों को समझ भी रहे हैं या नहीं।

मेधा से जुड़ने के बाद मुझे छात्रों के साथ सत्र आयोजित करने के लिए प्रशिक्षण और जानकारियां दी गई। लेकिन बावजूद इसके मुझे यह नहीं पता था कि वास्तव में करना क्या है। मैं इस बात को लेकर डरी हुई और सशंकित थी कि क्या मेरे छात्र मेरे द्वारा दी जाने वाली जानकारियों को समझ भी रहे हैं या नहीं। शुरुआत में मैंने केवल दिए गए निर्देशों का पालन किया और कुछ भी नया करने की कोशिश नहीं की। धीरे-धीरे मैंने आत्मविश्वास हासिल किया और मुझे महसूस हुआ कि अपने छात्रों को सुनने और उनके साथ जुड़ने से भी मैं बहुत कुछ सीख रही थी। यह इस प्रक्रिया के माध्यम से था कि मैंने नए अनुभव और अंतर्दृष्टि हासिल की जिससे मुझे बहुत मदद मिली और अब जिसका उपयोग मैं अपने सत्रों में करती हूं।

दोपहर 12.30 बजे: दिन का मेरा दूसरा सत्र पहले सत्र के समाप्त होते ही शुरू हो जाता है। इस सत्र के छात्रों के लिए मैंने लिंक्डइन और ऐसे ही अन्य प्लैट्फ़ॉर्म से जुड़ी जानकारियों की तैयारी की है ताकि उन्हें करियर से जुड़े अवसरों के बारे में जानने में आसानी हो। एक बार फिर मैंने पूरे बैच को तीन टीम में बांटा है और उन्हें गूगल और लिंक्डइन पर समय लगाकर वर्क- फ़्रॉम-होम के अवसर ढूंढने का काम दिया है। मैं हमेशा अपने छात्रों को अपना ख़ाली समय गूगल पर अवसरों को ढूंढने में लगाने के लिए कहती हूं। इससे उन्हें यह जानने में मदद मिलती है कि कई तरह के अवसर और भर्तियां हैं और रोज़गार की स्थिति इतनी भी ख़राब नहीं है जितना कि वे सोचते हैं। जब उन्होंने कुछ अवसरों को ढूंढ़ लिया तब मैंने अपनी सबसे पसंदीदा गतिविधि मॉक इंटरव्यू आयोजित की। मॉक इंटरव्यू के दौरान मैं अपने छात्रों से उनके शौक़ और उनके रेज़्यूम में लिखे अन्य पहलुओं पर विस्तार से बताने के लिए कहती हूं। इससे छात्रों को इंटरव्यू के दौरान अपनी बातचीत में अधिक सावधान रहने की सीख मिलती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि साक्षात्कारकर्ता बातचीत से ही सवाल पूछते हैं, न कि केवल उनके रेज़्यूम से।

दोपहर 3 बजे: दोपहर का खाना और एक कप चाय पीने के बाद मैं अपने कमरे में वापस लौटकर काम पर लग जाती हूं। मैं इस समय त्रैमासिक रिपोर्ट पर काम कर रही हूं जो जल्द ही आने वाली है। महामारी के पहले हम उन कॉलेजों के प्रिंसिपल, कुलपति और अन्य प्रमुखों से जाकर मिलते थे और उन्हें अपने कार्यक्रमों से जुड़ी जानकारियां देते थे। चूंकि यह काम अब मुश्किल हो गया है इसलिए अब हम उन्हें त्रैमासिक रिपोर्ट भेजते हैं। इस रिपोर्ट के माध्यम से हम उन्हें प्रत्येक बैच के साथ की जाने वाली अपनी गतिविधियों, नौकरी और इन्टर्नशिप या अन्य अवसर हासिल करने वाले छात्रों की जानकारियां मुहैया करवाते हैं।

रिपोर्ट का काम ख़त्म करने के बाद मुझे टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज़ (टीसीएस) में काम करने वाले एक आदमी के साथ फ़ोन पर बात करनी है। वह हमारे छात्रों के साथ एक सत्र करने के लिए तैयार हो गए हैं जिसमें वह प्लेसमेंट प्रक्रिया, वर्क-फ़्रॉम-होम के अवसरों आदि से जुड़े सवालों पर बातचीत करेंगे। हम इस तरह की बातचीत का आयोजन करते हैं ताकि हमारे छात्र उद्योग में काम कर रहे लोगों को देखें, उनके अनुभवों के बारे में जाने और किसी विशेष कम्पनी या पद पर काम करने के लिए ज़रूरी कौशल आदि के बारे में सीखें।

शाम 5 बजे: लॉकडाउन के दिनों में हम में अधिकांश एसआरएम अपने छात्रों और सत्रों के लिए नए विचार लेकर आए और अब हम पहले से निर्धारित खाँचों से बाहर निकलकर नए आईडिया पर काम करते हैं। एसआरएम उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के विभिन्न इलाक़ों में काम कर रहे हैं। हम सब एक दूसरे से मिलने और बातचीत करने में सक्षम नहीं हैं इसलिए हमने सभी एसआरएम के लिए एक टॉक-शो निर्माण के विचार पर काम करना शुरू किया। हमने इसे ‘स्पॉटलाइट’ का नाम दिया।

योजना प्रत्येक एपिसोड में एक एसआरएम पर ‘स्पॉटलाइट’ डालने और उन्हें अपने छात्रों के साथ लागू की गई नई पहल या विचारों के बारे में बात करने का अवसर देने की है। यह बातचीत को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है और अन्य एसआरएम को अपने छात्रों के साथ इन विचारों को सीखने और लागू करने में मदद मिलती है। मैं अपने कुछ साथी एसआरएम के साथ फ़ोन पर लॉजिस्टिक्स को अंतिम रूप देने और शो के प्रारूप से संबंधित कुछ अंतिम-मिनट की योजना आदि से जुड़े मसलों पर बात करती हूं।

शाम 6 बजे: मैं छत पर जाती हूं। यहां टहलते हुए मैं छात्रों द्वारा अवसरों आदि से जुड़े उनके सवालों का जवाब देती हूं। मैं मैसेज के माध्यम से उन्हें जवाब देने की कोशिश करती हूं लेकिन अधिक मुश्किल सवाल होने पर मैं फ़ोन पर बात करना सही समझती हूं। इसी समय मुझे विभिन्न कम्पनियों और संगठनों से इन्टर्नशिप या रोज़गार अवसरों से जुड़े संदेश भी मिलते हैं। मैं इन संदेशों को आगे अपने छात्रों को भेज देती हूं।

एक बार सारा काम ख़त्म करने के बाद मैं हाथ-मुंह धोकर रात के खाने की तैयारी में मदद करने जुट जाती हूं। अपने परिवार के साथ खाना खाने के बाद मैं वापस अपने कमरे में जाकर एसआरएम के ग्रुप को देखती हूं। इस ग्रुप में हम सभी काम से जुड़ी अपनी दिनचर्या की किसी भी समस्या या मुद्दे पर बातचीत करते हैं। समस्या को सुलझाने के लिए हम सब अपने-अपने विचार रखते हैं या स्थिति से निपटने के तरीक़ों पर बात करते हैं। हम इस ग्रुप का इस्तेमाल नए विचारों या पहलों पर बातचीत करने के लिए भी करते हैं। यह सब ख़त्म करने के बाद मैं सोने से पहले यूट्यूब पर विडियो आदि देखना पसंद करती हूं।

जैसा कि आईडीआर को बताया गया। 

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लेखक के बारे में
सोनाली सिंह-Image
सोनाली सिंह

सोनाली सिंह उत्तर प्रदेश में मेधा के साथ जुड़कर एसआरएम के रूप में कार्यरत हैं। वह कॉलेज छात्रों के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं और उन्हें करियर से जुड़े अवसरों के बारे में बताती हैं। इससे पहले वह एचसीएल फ़ाउंडेशन में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का काम करती थीं। सोनाली प्राथमिक विद्यालय छात्रों के साथ भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य के विषय में एमए किया है।

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