January 3, 2026

हमारे स्कूलों से क्यों नदारद है सावित्रीबाई फुले की कहानी?

क्या हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सावित्रीबाई फुले के कद के मुताबिक उनकी बात की जाती है, उनसे हमारा परिचय बतौर देश की पहली शिक्षिका क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में करवाया जाता है?
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सावित्रीबाई फुले हमारे देश की पहली शिक्षिका रही हैं। वह शिक्षिका जिन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी इस देश की लड़कियों और औरतों के शिक्षा के अधिकार के लिए। लेकिन क्या हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में उनके ओहदे और कद के मुताबिक उनकी बात की जाती है, उनसे हमारा परिचय बतौर देश की पहली शिक्षिका क्या हमारे स्कूलों और कॉलेजों में करवाया जाता है?

ब्रिटिश शासन के उस दौर में जब अंग्रेज भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे और भारतीय पुरुष अपनी महिलाओं को केवल घर के चौका बर्तन तक सीमित रखना चाहते थे। ऐसे समय में सावित्रीबाई ने न केवल लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किया बल्कि विधवा विवाह, गर्भवती बलात्कार पीड़ितों का पुनर्वास और छुआछूत मिटाने के लिए भी योगदान दिया। सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने 1848 में पुणे में पहला स्कूल खोला और 1853 में गर्भवती बलात्कार सर्वाइवर्स के लिए एक गृह की भी शुरुआत की।

वह एक शिक्षिका और समाज सुधारिका के साथ मराठी कवयित्री भी थीं। ‘फुले काव्य’ उनकी प्रसिद्ध रचना है। फुले दंपति ने 1873 में सत्यशोधक समाज की शुरुआत की और 25 दिसंबर 1873 को पहला विधवा पुनर्विवाह भी करवाया। भारत में सावित्रीबाई फुले प्रमाण हैं वास्तविक नारीवादी और सशक्तिकरण की। लेकिन आज हम देखते हैं कि उस दौर की ब्राह्मणवादी और पुरुष प्रधान सोच आज भी हमारे समाज में मौजूद है। आज भी स्कूली शिक्षा में सावित्रीबाई फुले का ज़िक्र तक नहीं किया जाता। सावित्रीबाई फुले देश की पहली शिक्षिका रही हैं लेकिन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में स्कूली पाठयक्रम से लेकर परास्नातक तक न कोई चैप्टर/पाठ उनके बारे में पढ़ाया जाता है और न ही उनको लेकर कोई विशेष पाठयक्रम बनाया गया है। 

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हालांकि, महाराष्ट्र के कुछ विश्वविद्यालयों में सावित्रीबाई फुले को एक हद तक दर्ज ज़रूर किया गया है। लेकिन पूरे भारत के विश्वविद्यालयों में नहीं। इसका एकमात्र कारण जाति व्यवस्था का प्रभुत्व कहा जा सकता है क्योंकि सावित्रीबाई फुले किसी तथाकथित उच्च ब्राह्मण कुल से नहीं आती थीं बल्कि वह बहुजन समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। जिस तरह भारत में प्रभुत्वशाली उच्च वर्गों ने अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक लाभ के लिए जाति व्यवस्था का गठन किया उसी तरह उन्होंने इतिहास भी अपने लाभ के हिसाब से गढ़ दिया है।

अगर आप स्कूलों या स्नातक का इतिहास या राजनीतिक विज्ञान के सिलेबस को देखें, तो ब्रिटिश शासन के दौरान सशक्त महिलाओं में मात्र पंडिता रमाबाई का इतिहास पाएंगे जबकि उनसे पहले सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख जैसी महिलाएं सामाजिक सशक्तिकरण के लिए काम करती रही थीं। लेकिन इन वीरांगनाओं के इतिहास से विद्यार्थियों को वंचित रखा जाता है।

यह लेख मूलरूप से फेमिनिज़्म इन इंडिया पर प्रकाशित हुआ है।

लेखक के बारे में
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निशा भारती

निशा भारती दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा रही हैं और उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में परास्नातक किया है। निशा को सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लिखना-पढ़ना पसंद है।

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