March 21, 2023

एक एनजीओ के लिए ट्रू कॉस्ट फंडिंग कैसे हासिल करें?

ट्रू कॉस्ट फंडिंग क्या है, इसे कैसे हासिल करें और वह सब कुछ जो एनजीओ लीडर्स के लिए जानना जरूरी है।
9 मिनट लंबा लेख

ट्रू कॉस्ट फंडिंग कैसे हासिल करें, इस पर चर्चा करने से पहले हमें यह जानना जरूरी है कि ट्रू कॉस्ट फंडिंग क्या होती है? किसी भी समाजसेवी संस्था (एनजीओ) को संचालित करने में कई ऐसे खर्च शामिल होते हैं जो किसी प्रोजेक्ट के तहत नहीं आते हैं। इसके अलावा संस्था को खड़ा करने में निवेश करना और उसे चलाने के लिए कुछ धनराशि सुरक्षित (रिज़र्व्स) रखना, एनजीओ के लिए जरूरी होता है। फंडिग एजेंसियां आमतौर पर प्रोजेक्ट के लिए बजट प्रदान करती हैं। संस्था के कामकाज के लिए बजट का प्रावधान नहीं होने से संस्था को चलाने में दिक्कत होती है। अक्सर यह देखा जाता है कि संस्था से जुड़े कामकाज की फंडिग के ​लिए एनजीओ और फंडर्स में सहमति नहीं बन पाती है। ऐसे में, समस्या को फंडर्स के नजरिए से देखकर इसका हल निकाला जा सकता है।

भारत में एनजीओ को मिलने वाली आर्थिक सहायता के पर्याप्त होने के मसले पर संस्थाओं और फंडर्स में गंभीर मतभेद हैं। इस मामले की जड़ है – एनजीओ के संस्थागत विकास (ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट – ओडी) के लिए धन की ज़रूरत। जहां फंडर्स का कहना है कि वे दोनों (प्रोजेक्ट और ओडी) के लिए धन प्रदान करते हैं, वहीं एनजीओ का अनुभव इससे अलग है। उनके अनुसार ओडी के लिए धन न मिल पाने से उन्हें संस्था को विकसित करने में दिक्कत होती है तथा वे प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता भी नहीं विकसित कर पाते हैं।

हमारे शोध से पता चलता है कि जो एनजीओ, ओडी में साल-दर-साल निवेश करते हैं, उनकी वृद्धि दर (ग्रोथ रेट) बाकियों की तुलना में दोगुनी होती है। एनजीओ के विकास के लिए ज़रूरी विभागों और क्षमताओं (जैसे मानव संसाधन, नेतृत्व क्षमता, फंडरेज़िंग, कामकाज के आकलन और उससे सीखने की क्षमता – एमएलई आदि) का विकास करना, एक नींव बनाने की तरह है। इसके बूते पर वे सामाजिक बदलाव कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से संचालित कर सकते हैं। इसके साथ ही प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त मात्रा में रिज़र्व फंड बनाना भी एनजीओ के लिए जरूरी है। इनके सहारे ही एनजीओ अपने प्रोजेक्ट्स को और प्रभावी बना सकते हैं और व्यापक सामाजिक प्रगति में और अधिक योगदान दे सकते हैं। इसलिए फंडर्स और एनजीओ के बीच इस गतिरोध को तोड़ना बहुत ज़रूरी है।

फंडर्स और एनजीओ के बीच विश्वास बनाने के लिए फंडर्स की सोच और नज़रिये को समझना ज़रूरी है।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

हमारे नए शोध में हमने पाया कि फंडर्स और एनजीओ के बीच विश्वास बनाने और इन प्रथाओं को बदलने के लिए, फंडर्स की सोच और नज़रिये को समझना ज़रूरी है। यह शोध पे-वाट-इट-टेक्स (पीडब्ल्यूआईटी) इंडिया इनिशिएटिव [Pay-What-It-Takes (PWIT) India Initiative] का हिस्सा है, जो द ब्रिजस्पैन ग्रुप और एटीई चन्द्रा फाउंडेशन (एटीईसीएफ), चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन (सीआईएफएफ), एडेलगिव फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन का संयुक्त प्रयास है। इसका मकसद भारत के सोशल सेक्टर को मजबूत करना है। 

फंडर्स की सोच को समझने के लिए हमने 77 फंडर्स का सर्वे किया। इस सर्वे के नतीजों की तुलना हमने पिछले साल 388 एनजीओ के साथ किये सर्वे से की। हमने सर्वे से निकलने वाले निष्कर्षों को और गहराई से समझने के लिए 53 साक्षात्कार किए और अतिरिक्त इनपुट इकट्ठा करने के लिए फंडर राउंडटेबल्स और वर्कशॉप्स में भाग लिया। 

इस शोध के नतीजे दिखाते हैं कि फंडर्स का नजरिया, एनजीओ लीडर्स से बहुत अलग है। इसके साथ ही, ये फंडर्स एवं एनजीओ के बीच बेहतर संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने की ज़रूरत की तरफ भी इशारा करते हैं।

हमारे हालिया सर्वे में, 75 प्रतिशत फंडर्स ने कहा कि वे जिन संस्थाओं को अनुदान देते हैं, उनके संस्थागत विकास और लंबे समय तक उन्हें चलाए रखने के लिए जरूरी चीजों में भी निवेश करते हैं। इसके विपरीत, पिछले साल 388 एनजीओ के सर्वे में 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि अधिकांश फंडर्स संस्था की जरूरतों के लिए अनुदान नहीं देते हैं। 68 प्रतिशत फंडर्स का मानना है कि उनकी नीतियां एनजीओ की ज़रूरत के मुताबिक प्रशासनिक लागत एवं अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों के ख़र्चों (गैर-प्रोजेक्ट खर्चे या अप्रत्यक्ष लागत) को वहन करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता देती हैं। इससे उलट, 83 प्रतिशत एनजीओ का कहना है कि यह फंड हासिल करना उनके लिए एक संघर्ष है। 

दलित, बहुजन और आदिवासी समुदाय के नेतृत्व वाले संगठन, भारत के अन्य एनजीओ की तुलना में वित्तीय रूप से बदतर हालात में हैं।

सर्वे में यह भी पाया गया कि बहुत कम फंडर्स (77 उत्तरदाताओं में से केवल सात) ही एनजीओ को रिज़र्व फंड बनाने में मदद करते हैं। ऐसे रिज़र्व के अभाव में फंड्स में होने वाली किसी अप्रत्याशित कमी की स्थिति में एनजीओ न सिर्फ वेतन भुगतान या अन्य मदों के खर्चे करने में असमर्थ हो जाते हैं बल्कि उनके लिए शोध और नए उपायों को अपनाने (इनोवेशन) जैसे ज़रूरी कार्यों में निवेश करना भी मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही, पिछले साल के शोध में हमने पाया कि दलित, बहुजन और आदिवासी समुदाय के नेतृत्व वाले संगठन, भारत के अन्य एनजीओ की तुलना में वित्तीय रूप से बदतर हालात में हैं। परिणामस्वरूप, भारत में हाशिये पर रहने वाले समुदायों की सेवा में लगे हुए संगठन स्वयं अक्सर आर्थिक रूप से हाशिये पर होते हैं।

एक एनजीओ के संचालन की वास्तविक लागत में ग़ैर-प्रोजेक्ट खर्चे (अप्रत्यक्ष लागत) जैसे कि संस्था के विकास में निवेश और रिजर्व्स बनाना भी शामिल है। फिर भी अधिकांश फंडर्स का लक्ष्य प्रोजेक्ट को फंड करना होता है। इसे लेकर फंडर्स का कहना है कि एनजीओ अपनी लागत और संस्थागत विकास की ज़रूरतों को ठीक से नहीं समझाते हैं। फंडर्स सर्वे में आधे लोगों का यह भी कहना था कि संस्थाएं ऐसा करते हुए पारदर्शिता नहीं बरतती हैं और खुद भी इस पर उचित ध्यान नहीं देती हैं।

रोहिणी निलेकनी फिलैन्थ्रॉपी की प्रमुख रोहिणी निलेकनी कहती हैं कि ‘एनजीओ को और अधिक होमवर्क करने की आवश्यकता है। कभी-कभी, शुरुआत में, वो अपनी जरूरतों को स्पष्ट नहीं कर पाते हैं।’ लेकिन फिर भी फंडर्स का दायित्व है के वो आगे बढ़कर एनजीओ की इस विषय में मदद करें। वे आगे जोड़ती हैं कि ‘हमें एनजीओ के ओडी में निवेश की आवश्यकता के बारे में बात करने में मदद करनी चाहिए। कैसे वे फंडर्स की सहृदयता पर निर्भर न रहकर रणनीति (स्ट्रेटेजी) और तर्क के आधार पर अपनी बात रख सकते हैं।’

एनजीओ अपनी तरफ से ऊपर ज़िक्र की गई बातों में फंडर्स की मदद का स्वागत करेंगे। एनजीओ लीडर्स के अनुसार धन की कमी, फंडर्स के इन सवालों का संतोषजनक जवाब दे सकने की सीमित क्षमता का मूल कारण है। वे ‘पहले मुर्गी आई या अंडा’ वाली विरोधाभासी स्थिति को जी रहे हैं – ओडी फंडिंग के अभाव के चलते वे इस प्रकार की फंडिंग जुटाने के लिए ज़रूरी स्टाफ, संसाधन और क्षमता नहीं जुटा पाते हैं और यह चक्र चलता रहता है।

दो रेलवे ट्रैक एक दूसरे के बगल में_ट्रू कॉस्ट फंडिंग
फंडर्स का नजरिया, एनजीओ लीडर्स से बहुत अलग है। फंडर्स एवं एनजीओ के बीच बेहतर संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने की ज़रूरत हैं। | चित्र साभार: फ़्लिकर

फंडर्स को अपनी ट्रू कॉस्ट फंडिंग ज़रूरतें कैसे पिच करें?

जहां फंडर्स को यह संवाद शुरू करना चाहिए वहीं संस्थाओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी फंडिंग पिच और फंडर्स के साथ अपने संवाद को, फंडर्स की मानसिकता और नजरिए के मुताबिक ढालें। सर्वे में मिले जवाबों के विश्लेषण से पता चलता है कि फंडर्स को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इनसे हमें उन अड़चनों को समझने में मदद मिलेगी जो फंडर्स के सामने ट्रू कॉस्ट फंडिंग को अपनाते हुए आ सकती हैं।

फंडर्स की मानसिकता को समझ कर संस्थाएं यह समझ सकती हैं कि किस फंडर से किस उद्देश्य के लिए और किस प्रकार से धन की मांग की जा सकती है। इस शोध के दौरान हमने ऐसे संवाद कर सकने में सफल रहे फंडर्स और एनजीओ से भी बात की। इस बातचीत से हमें ट्रू कॉस्ट फंडिंग जुटाने के गुर सीखने को मिले।  

1. प्रोग्राम पैरोकार (प्रोग्राम प्रोपोनेंट) के लिए पिच

इस प्रकार के फंडर्स का मानना होता है कि किसी प्रोग्राम या प्रोजेक्ट की फंडिंग उनके सीमित संसाधनों का सबसे अच्छा उपयोग है। वर्तमान में, ऐसे फंडर्स गैर-प्रोजेक्ट खर्चे या अप्रत्यक्ष लागत के लिए अपने कुल अनुदान में एक ऊपरी सीमा या एक दर निश्चित करके रखते हैं। कई बार 5 से 15 प्रतिशत के बीच निश्चित यह दर एनजीओ की वास्तविक ज़रूरत की आधी भी नहीं होती है।

एनजीओ मुख्य रूप से कार्यक्रम को सहयोग देने के लिए इन फंडर्स से संपर्क कर सकती हैं। साथ ही, गैर-प्रोजेक्ट खर्चे या अप्रत्यक्ष लागत और ओडी निवेश की ज़रूरत को स्पष्ट कर उनके लिए धन की मांग कर सकती हैं, जो फंडर को स्वीकार्य होती हैं। समय के साथ, जैसे-जैसे फंडर और संस्था का रिश्ता बेहतर होता है, एनजीओ अपनी ज़रूरतों को मज़बूती से फंडर के समक्ष रखें, और समझाएं कि प्रोग्राम की सफलता के लिए इन खर्चों का वहन और निवेश कितना जरूरी है। साथ ही, अपना ट्रू कॉस्ट बजट भी तैयार रखें। उदाहरण के लिए, एनजीओ यह बता सकते हैं कि ऑर्गेनाइजेशन कल्चर (संगठनात्मक संस्कृति) और प्रबंधन में निवेश करने से एनजीओ के कर्मचारी ज़्यादा लम्बे समय तक संगठन के साथ जुड़े रहते हैं जिससे प्रोग्राम में भी बेहतर सफलता हासिल होती है; या कैसे टेक्नोलॉजी में निवेश प्रोग्राम को और अधिक लोगों तक ज्यादा बेहतर ढंग से पहुंचा सकता है। एनजीओ ये भी बता सकते हैं कि इससे पहले दूसरे फंडर्स द्वारा गैर-प्रोजेक्ट खर्चे के लिए अनुदान देने या ओडी में निवेश करने से प्रोग्राम में कैसे और कितने बेहतर परिणाम प्राप्त हुए थे।

2. परिस्थिति के अनुरूप नीतियों को ढ़ाल लेने वाले फंडर्स (अडैप्टिव फंडर्स) के लिए पिच

सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं के बीच सबसे बड़ा समूह, अडैप्टिव फंडर्स, गैर-प्रोजेक्ट खर्चे के लिए अनुदान दरों को कुल अनुदान का 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत के बीच निर्धारित करता है, लेकिन अपनी ग्रांट मेकिंग में परिस्थिति के अनुरूप लचीलापन दर्शाता है। अडैप्टिव फंडर्स एनजीओ के साथ बातचीत के आधार पर गैर-प्रोजेक्ट खर्चे की दर निश्चित करते हैं या विशेष परिस्तिथियों या एनजीओ के साथ उनके संबंधों के आधार पर ओडी में निवेश करते हैं। इन फंडर्स से गैर-प्रोजेक्ट खर्चे के लिए अनुदान देने के लिए या प्रोग्राम की सफलता और संस्था द्वारा लाये जा रहे सामाजिक बदलाव से सीधे जुड़ी ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट ज़रूरतों में निवेश के लिए संपर्क कर सकते हैं।

एनजीओ को चाहिए कि गैर-प्रोजेक्ट खर्चे या ओडी की ज़रूरतों का आकलन करते हुए फंडर्स को समझाएं कि अभी वे किस स्थिति में हैं और कैसे उन मदों के लिए ग्रांट देने से प्रोग्राम और संस्था के द्वारा लाये जाने वाले सामाजिक बदलाव पर एक सकारात्मक असर पड़ सकता है।

इन फंडर्स से सहायता प्राप्त करने के लिए संस्थाएं इस प्रकार के अनुदान और निवेश से होने वाले सकारात्मक प्रभावों की भी बात कर सकते हैं। जैसे – कमर्चारियों के मनोबल में वृद्धि या इन निवेशों से संस्था के वार्षिक बजट, रिजर्व फंड या सामाजिक बदलाव के स्तर (ज्यादा लोगों की सेवा कर पाना, या समुदाय की सेवा बेहतर ढंग से कर पाना) में बढ़ोतरी की बात की जा सकती है।

एक अन्य विकल्प टार्गेटेड फंड्स (targeted funds) को ढूंढ़कर उनसे संपर्क करना हो सकता है जिसमें टेक्नोलॉजी, रिसर्च एवं नॉलेज, या सस्टेनेबिलिटी जैसे विशिष्ट उद्देश्यों की फंडिंग की जाती है। ऐसे में ओडी ज़रूरतें अलग से प्रोग्राम फंडिंग के रूप में पिच की जा सकती हैं।

अडैप्टिव फंडर्स से बात करते समय, फंडर्स और एनजीओ की भागीदारी और उस से हासिल होने वाले बेहतर परिणामों के पूर्व उदाहरण देना जरूरी है। इन उदाहरणों से गैर-प्रोजेक्ट खर्चे के लिए अनुदान देने या ओडी में निवेश से सामाजिक बदलाव के स्तर पर होने वाले सकारात्मक असर को दर्शाया जा सकता है। 

3. संगठन निर्माताओं (ऑर्गेनाइजेशन बिल्डर्स) के लिए पिच

संगठन निर्माता, प्रोग्राम फंडिंग के साथसाथ ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट में निवेश और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता के विकास का भी महत्त्व समझते हैं। ऐसे फंडर्स गैरप्रोजेक्ट खर्चे की दरें आमतौर पर एनजीओ लीडर्स के साथ बात करके निर्धारित करते हैं और यह दर 25 प्रतिशत से अधिक भी हो सकती हैं। वे एनजीओ की प्राथमिकताओं के आधार पर ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट फंडिंग भी प्रदान करते हैं। लेकिन इस श्रेणी से भी बहुत कम फंडर्स ही लगातार रिजर्व फंड का निर्माण करने में मदद करते हैं।

एनजीओ इस प्रकार के संगठन निर्माता फंडर्स को ट्रू कॉस्ट फंडिंग (वास्तविक लागत – प्रोग्राम फंडिंग, गैर-प्रोजेक्ट खर्चे के लिए अनुदान देने, ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट में निवेश या रिजर्व फंड) के लिए पिच कर सकती हैं, ताकि वह एनजीओ को और अधिक प्रभावी, मजबूत, एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम बना सकें। अप्रतिबंधित अनुदान (अनरेस्ट्रिक्टेड फंडिंग) और आवश्यकतानुसार टार्गेटेड फंड्स के लिए भी पिच कर सकते हैं। एनजीओ निम्न सुझावों को भी अमल में ला सकते हैं:

  • यदि आपके संगठन को ट्रू कॉस्ट (वास्तविक लागतों) का आकलन करने और रिपोर्ट करने में सहायता की आवश्यकता है तो विशेषज्ञों की सेवाएं लेने के लिए वित्तीय सहायता का निवेदन भी अपने प्रस्ताव में शामिल करें।
  • फंडर्स को अपने कामकाज के बारे में रिपोर्ट करते समय प्रोजेक्ट के नतीजों के साथ संगठन विकास से जुड़ी उपलब्धियों (और सफलताओं) को भी साझा करें।
  • अपनी आर्थिक स्थिति (जैसे रिजर्व फंड का कम होना, पर्याप्त धन न होना आदि) पर निगाह रखें और जहां तक हो सके फंडर्स को उसकी जानकारी दें।

संक्षेप में कहा जाए तो एनजीओ के लिए ऐसे फंडर्स को अपना भागीदार समझकर उनके साथ मिलकर काम करना जरूरी है क्योंकि इस तरह से मिली सफलता से भविष्य में अन्य फंडर्स को भी प्रेरित किया जा सकता है। 

ऊपर ज़िक्र किए गए सुझाव कोई पत्थर की लकीर नहीं हैं और संस्थाओं को चाहिए कि वे इन सुझावों को अपने संदर्भ और जरूरतों के मुताबिक समझ कर अमल में लाएं। फिर भी, ये सुझाव फंडर्स की श्रेणियों की समझ, आपसी संवाद को बेहतर करने और एक ऐसी बुनियाद खड़ी करने में मददगार हो सकते हैं जिनके ऊपर आपसी विश्वास, एक-दूसरे की परिस्थितियों की समझ, सकारात्मक सहयोग और आख़िरकार ट्रू कॉस्ट फंडिंग की इमारत की रचना की जा सकती है। सामाजिक बदलाव को लाने के रास्ते में सच्चे साझेदारों की तरह काम करके ही फंडर्स और एनजीओ एक मजबूत सोशल सेक्टर का निर्माण कर सकते हैं।

मूल लेख यहां पढ़ें। हिंदी अनुवाद और संपादन: उर्मिला गुप्ता, अलीना मुसन्ना, रोहन अग्रवाल और शशांक रस्तोगी। टिपणियों एवं सुझावों के लिए आशिफ़ शेख़ (जन साहस) को विशेष धन्यवाद।

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  • इस टूलकिट का इस्तेमाल करते हुए आप अपना ऑर्गेनाइजेशनल डेवलपमेंट प्लान बना सकते हैं। इस टूलकिट का निर्माण PWIT India Initiative ने एनजीओ के साथ काम कर रही पांच सहायक संस्थाओं के साथ मिलकर किया है।
  • जानें कि मजबूत एनजीओ के निर्माण के लिए फंडर्स को अनुदान देने की ज़रूरत कयों है।

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  • उनके काम के बारे में विस्तार से जानने एवं सहयोग के लिए लेखक से [email protected] पर सम्पर्क करें।

लेखक के बारे में
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प्रीता वेंकटाचलम

प्रीता वेंकटाचलम द ब्रिजस्पैन ग्रुप में पार्टनर और सह-प्रमुख (एशिया और अफ्रीका) हैं। उन्होंने वैश्विक विकास के अवसरों की एक विस्तृत श्रृंखला पर फ़िलैन्थ्रॉपी, दाताओं, सरकारों, स्वयंसेवी संस्थाओं और एशिया और अफ्रीका में निजी क्षेत्र के लिए सलाहकार के रूप में काम किया है। ब्रिजस्पैन से पहले, प्रीता ने डालबर्ग के नई दिल्ली कार्यालय की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डेवलपमेंट मैनेजमेंट में एमए और आईआईएम बैंगलोर से एमबीए किया है।

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शशांक रस्तोगी

शशांक रस्तोगी ब्रिजस्पैन ग्रुप के मुंबई ऑफिस में प्रिंसिपल हैं। उन्हें प्रभाव निवेश, सामाजिक उद्यमिता और ग्रामीण बाजारों में 15 से अधिक वर्षों का अनुभव है। इससे पहले, उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद में सेंटर फॉर इनोवेशन, इनक्यूबेशन, एंड एंटरप्रेन्योरशिप (सीआईआईई) के प्रभाव निवेश पोर्टफोलियो की शुरुआत की और शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, ग्रामीण आजीविका और ऊर्जा पहुंच सहित क्षेत्रों में वृद्धि की। शशांक ने आईआईएम अहमदाबाद से प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और आईआईटी रुड़की से बीटेक (इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार) किया है।

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अनुष्का सिद्दीकी

अनुष्का सिद्दीकी, ब्रिजस्पैन ग्रुप में टीम लीडर हैं। इस भूमिका में उन्होंने ग़ैर-लाभकारी संगठनों, समाजसेवियों और इम्पैक्ट इन्वेस्टर्स के साथ काम करने का लंबा अनुभव हासिल किया है। इससे पहले निजी और सरकारी क्षेत्र में काम करते हुए वे मैकिन्जी एंड कंपनी में सलाहकार और समग्र में डेवलपमेंट एसोसिएट के पद पर रह चुकी हैं। अनुष्का, दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में ऑनर्स ग्रैजुएट और हार्वर्ड कैनेडी स्कूल से पब्लिक पॉलिसी में पोस्ट ग्रैजुएट हैं। वे अशोका यूनिवर्सिटी की यंग इंडिया फेलोशिप का भी हिस्सा रह चुकी हैं।

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