समाजसेवी संगठनों में कारगर प्रतिभा प्रबंधन कैसे किया जा सकता है?

किसी भी समाजसेवी संगठन में एक मज़बूत टीम संस्कृति विकसित करने के लिए किन चीजों की ज़रूरत होती है? जब आपको बजट और संसाधनों के लिए संघर्ष करते रहना पड़े तो आप इस काम को कैसे कर सकते हैं? और, आपको अपने टीम के सदस्यों को प्राथमिक शेयरधारकों के बराबर महत्व क्यों देना चाहिए? इन्हीं जैसे कुछ सवालों का जवाब खोजने के लिए आइये हम अर्पण की प्रतिभा प्रबंधन की यात्रा के बारे में जानते हैं। आज इस लेख में हम उनकी यात्रा की शुरुआत, आज वे जहां हैं वहां तक कैसे पहुंचे, और उनकी सफलता का कारणों के बारे में जानेंगे।

अर्पण मुंबई स्थित एक समाजसेवी संगठन है जो बाल यौन शोषण की रोकथाम के लिए काम करता है। क़रीब 15 वर्ष (2007 में) पहले जब उन्होंने इसकी शुरुआत की थी तब उनकी टीम में केवल तीन ही लोग थे। अगले छह सालों (2013 तक) में, टीम में कुल 18 लोग हो गये थे और संगठन में किसी भी तरह की ठोस एचआर प्रक्रिया या नीति का अभाव था। हालांकि, अंतिम 10 सालों में, उन्होंने 120 अन्य सदस्यों (टीम के आकार को लगभग 140 तक पहुंचाकर) को जोड़ने के साथ ही अपने बजट को 14 गुना बढ़ा दिया है जो 2013 में 1.2 करोड़ रुपये से 2023 में लगभग 16.5 करोड़ रुपये तक हो गया।

इस विकास के केंद्र में वह ख़ास निवेश है जो उन्होंने सोच-समझकर लोगों में किया है।

पूजा तपारिया (संस्थापक, सीईओ) कहती हैं कि एचआर की अवधारणा टीम के सदस्यों की ओर से ही आई थी। ‘जब हमारी टीम बढ़नी शुरू हो गई थी तब 2011 में हम लोगों ने एचआर के बारे में थोड़ा-बहुत सोचना शुरू कर दिया था। हमें किसी ना किसी तरह की प्रक्रिया की ज़रूरत महसूस होने लगी थी, टीम हमसे सवाल कर रही थी, लेकिन हमारे पास उन सवालों के जवाब नहीं थे। मुझे नहीं लगता है कि उन दिनों हमारे पास किसी तरह की उचित मूल्यांकन प्रणाली भी थी।’

यही वह समय था जब हेमेश शेठ (निदेशक, सपोर्ट ऑपरेशन) हमसे जुड़े। वे 2013 में संगठन में शामिल हुए और गंभीरता से एचआर और वित्त विभाग की ज़िम्मेदारी सम्भाली। उसके पहले तक कुछ सहायकों की मदद से पूजा अकेले ही इन चीजों को सम्भाल रही थीं।  हेमेश के आने से टीम का विकास हुआ, प्रक्रियाओं को स्वरूप मिला, नीतियां मज़बूत हुईं और हमारे काम के प्रभाव को विस्तार मिला जो अन्यथा संभव नहीं था। (अर्पण को लगातार पांच सालों तक काम करने के लिए सबसे अच्छी जगह का प्रमाणपत्र भी मिल चुका है।)

आइये जानते हैं कि इसके लिए उन्होंने क्या-क्या किया।

बुनियादी बातों को शामिल करना और जल्दी शुरुआत करना

बुनियादी स्तर पर ही, अर्पण ने यह सुनिश्चित किया कि वे देश के सभी क़ानूनों का पालन करेंगे। पूजा कहती हैं कि जैसे-जैसे देश में कानून बदले, संगठन ने उन सभी को शामिल कर लिया। उदाहरण के लिए, जब गर्भावस्था और पितृत्व से संबंधित क़ानूनों में बदलाव हुआ – वेतन के साथ मातृत्व अवकाश को तीन महीने से बढ़ाकर छह महीने किया गया, और पितृत्व अवकाश और गर्भपात लाभ कानून की शुरूआत की गई – तब अर्पण ने इन बदलावों को अपनी एचआर नीतियों में शामिल कर लिया। संगठन के पास पीओएसएच समिति और बाल संरक्षण नीति भी है जो कि अर्पण की तरह काम करने वाली किसी भी टीम के लिए क़ानूनी रूप से अनिवार्य और महत्वपूर्ण दोनों है।

हालांकि, एचआर से जुड़े क़ानूनों का पालन करने के अलावा, अर्पण को अन्य संगठनों से अलग करने वाली चीज विवेक और भरोसे पर दिये जाने वाले वे लाभ हैं जो संस्था अपने टीम के सदस्यों को प्रदान करती है। सभी कर्मचारियों को वार्षिक प्रशिक्षण भत्ता दिया जाता है ताकि वे अपने कौशल का विकास कर सकें। इसके अलावा, संगठन उन्हें चिकित्सीय भत्ता भी देता है जिसका निवेश वे अपने स्वास्थ्य को बेहतर करने में कर सकते हैं। ज़्यादातर अन्य संगठनों द्वारा सोचने से बहुत पहले अर्पण ने इन दोनों ही प्रावधानों को अपनाया और अब ये दोनों ही प्रावधान पिछले एक दशक से संगठन की नीतियों का हिस्सा हैं।

अर्पण द्वारा किए जाने वाले कठिन कामों के कारण कर्मचारियों में बर्नआउट की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए वे चिकित्सीय भत्ता देते हैं।

हेमेश कहते हैं कि पूजा, मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझती हैं और इस पर ज़ोर देती हैं और इसी का परिणाम है कि टीम के स्वास्थ्य की बेहतरी और उनके कौशल विकास पर दिया जाने वाला विशेष ध्यान दिया जाता है। ‘वे हमारी क्वाटर्ली समीक्षाओं में भी काउंसिलिंग को बढ़ावा देती हैं। अब प्रत्येक तीन महीने में हम इस बात पर निगरानी बनाए रखते हैं कि कितने लोग इस भत्ते का लाभ उठा रहे हैं और उससे उन्हें किस तरह का लाभ मिल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में निश्चित रूप से हम उनकी पहचान की गोपनीयता का पूरा ध्यान रखते हैं।’ अर्पण, टीम के प्रत्येक सदस्य को चिकित्सीय भत्ता के रूप में प्रति माह 1500 रुपये देता है।

पूजा कहती हैं कि अर्पण द्वारा किए जाने वाले कामों की प्रकृति कठिन होने के कारण कर्मचारियों में बर्नआउट की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए वे चिकित्सीय भत्ता देते हैं। इसके बावजूद भी, टीम का प्रत्येक सदस्य इसे नहीं लेता है। लोगों को अपनी-देखभाल की ज़रूरत को नहीं समझते हैं। वे कहती हैं कि ‘मेरा अनुमान है कि इसका संबंध संस्कृति से है, और विशेष रूप इसलिए क्योंकि अर्पण में महिलाओं की संख्या अधिक है, हम व्यक्तिगत रूप से अपनी देखभाल नहीं करते हैं। हमें हमेशा बच्चों, परिवार, और हर दूसरी चीज अधिक महत्वपूर्ण लगती है, और इससे आख़िरकार बर्नआउट की स्थिति पैदा हो जाती है।’

टेबल पर ब्लॉकस और चिट कार्ड्स_प्रतिभा प्रबंधन
अपने संगठन के लोगों की देखभाल करना प्रत्येक संगठन की प्राथमिकता होनी चाहिए। | चित्र साभार: अर्पण

नेतृत्व की अगली कड़ी का निर्माण और नेतृत्व पाइपलाइन में निवेश करना

तमाम और संगठनों के विपरीत, अर्पण ने अपनी यात्रा की शुरुआत में ही दूसरी पंक्ति/निदेशक स्तर का निर्माण शुरू कर दिया था। 2014 में, संगठन ने प्रोग्रामैटिक के साथ-साथ एचआर, वित्त और निगरानी एवं मूल्यांकन जैसे सहायक कार्यों को देखने के लिए सीनियर लीडर्स को नियुक्त किया। नतीजतन, ऑर्गेनोग्राम बदल गया।

सीनियर लीडरशिप के साथ टीम में एक क्रम (हेरार्की) आया। अपने शुरुआती चार सालों में अर्पण जहां एक समान ढांचे पर काम करने वाला संगठन था वहीं जल्द ही उन्हें इस बारे में सोचना शुरू करना पड़ा कि काम की रिपोर्टिंग किसके पास करनी है और टीम को व्यवस्थित करने का सबसे सही तरीक़ा क्या था। साथ ही संगठन का आकार बढ़ने के कारण, ऑर्गेनोग्राम में भी लगातार बदलाव आ रहा था।

किसी भी संगठन में लचीलापन को बनाने के लिए निदेशक स्तर पर सात से आठ लोगों का होना महत्वपूर्ण है।

पूजा बताती हैं कि ‘हमने वरिष्ठ नेतृत्व को मज़बूत बनाने की दिशा में काम किया। आमतौर पर 140 सदस्यों वाले किसी भी समाजसेवी संगठन में अधिकतम दो से तीन लोग [निदेशक/वरिष्ठ स्तर पर] होते हैं। हमारे पास किसी भी स्थिति और समय में सात से आठ लोग होते हैं। अगर हमें संगठन में लचीलेपन का निर्माण करना है तो उसके लिए यह महत्वपूर्ण है, ताकि किसी एक व्यक्ति के जाने की स्थिति में अगला व्यक्ति उसका कार्यभार सम्भाल सके और यह सुनिश्चित कर सके कि काम व्यवस्थित ढंग से हो रहा है। हमने यह भी महसूस किया कि जब एक विशिष्ट कार्यक्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने वाले वरिष्ठ होते हैं तो इसमें निवेश किया गया समय कहीं अधिक होता है। यह पिछले दशक में होने वाली हमारी वृद्धि के बारे में बताता है।’

किसी भी संगठन में लचीलापन को बनाने के लिए निदेशक स्तर पर सात से आठ लोगों का होना महत्वपूर्ण है।

साल 2009 से 2018 तक, अर्पण ने 40 हज़ार बच्चों, अभिभावकों, और शिक्षकों तक पहुंचने के लिए अपने व्यक्तिगत सुरक्षा शिक्षा कार्यक्रम को 20 गुना बढ़ाया। उनके द्वारा निपटाए गए मामलों की संख्या 30 गुना बढ़ गई, और उन्होंने पूरे भारत में शिक्षकों और समाजसेवी पेशेवरों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण प्रदान करना शुरू कर दिया। 2015 में एक हज़ार लोगों के साथ काम करने के बाद, अब वे देशभर में 35 हज़ार लोगों को प्रशिक्षित करते हैं।

पूजा और हेमेश दोनों का ही कहना है कि बिना गुणवत्ता से समझौता किए एक ही समय में कई तरह के काम करने की अर्पण की योग्यता का कारण एक सशक्त नेतृत्व टीम है। कई वर्षों के अनुभव वाले टीम के सदस्यों में निवेश करने से उन्हें अपने काम की पूरी तरह से निगरानी करने, गंभीर रूप से सोचने और जमीन पर काम करने वाले लोगों की क्षमताओं के निर्माण में निवेश करने का अवसर मिला। उदाहरण के लिए:

पूजा कहती हैं कि ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि उनके पास केंद्रित और विविध पहलुओं का नेतृत्व करने के लिए अलग-अलग लोग उपलब्ध हैं। ‘प्रत्येक व्यक्ति सब कुछ करने का प्रयास न करके केवल एक या दो चीजों पर ध्यान दे रहा है, क्योंकि आप सभी काम नहीं कर सकते हैं।’ पूजा और हेमेश दोनों ही इस बारे में बात करते हैं कि सही वरिष्ठ लोगों को नियुक्त करना कितना महत्वपूर्ण है। हेमेश का कहना है कि ‘जब हम विभिन्न स्तरों पर भर्ती करते हैं तो सांस्कृतिक रूप से फिट होना महत्वपूर्ण होता है लेकिन वरिष्ठ लोगों की नियुक्ति के समय यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके मामले में, नियुक्ति की प्रक्रिया गंभीर हो जाती है और इसमें बहुत अधिक समय भी लगता है।’ इसमें बोर्ड शामिल होता है, उम्मीदवार को टेस्ट्स देने पड़ते हैं और टीम और अपने भावी साथियों दोनों के साथ संवाद करना पड़ता है। पूजा कहती हैं कि ‘यह एक लंबी प्रक्रिया है, और कभी-कभी हम ग़लत भी होते हैं, लेकिन वरिष्ठों की नियुक्ति के ज़्यादातर मामलों में हम सौभाग्यशाली रहे हैं।’ अर्पण में, जूनियर टीम के सदस्य की नियुक्ति में औसतन दो से तीन सप्ताह का समय लगता है, वहीं टीम के किसी वरिष्ठ सदस्य की नियुक्ति प्रक्रिया छह से आठ सप्ताह का समय लेती है।

सीखने के अवसर प्रदान करना

अर्पण अपने सदस्यों को वार्षिक प्रशिक्षण भत्ता (ज्वाइनिंग के पहले वर्ष के लिए 5,000 रुपये और यह राशि हर साल बढ़ती है) प्रदान करता है जो टीम के सदस्यों को कौशल निर्माण में लगातार निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करता है। टीम का प्रत्येक सदस्य इस राशि का उपयोग संगठन में अपनी भूमिका से जुड़े किसी भी क्षेत्र में अपने कौशल विकास के लिए कर सकता है। इसके अलावा, अर्पण संगठन के भीतर ही सीखने के कई अवसरों का निर्माण करता है। इसी में से एक है टीम से केस स्टडी चर्चा करवाना। पूजा दसरा के नेतृत्व कार्यक्रम (डीएसआईएलपी) से एचबीआर केस अध्ययन की सुविधा प्रदान करती हैं, जिसका उपयोग टीम को नेतृत्व, प्रतिभा प्रबंधन, रणनीति और अन्य संगठनों से सीखने और अंतर्दृष्टि की एक श्रृंखला से अवगत कराने के लिए किया जाता है। पूजा बताती हैं कि, ‘हम वास्तव में इस बात में विश्वास करते हैं कि लोगों की क्षमताओं का निर्माण किए बग़ैर हम अच्छा काम नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा, इससे उन्हें अगले नेतृत्व वाले दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी जिसकी वे अकांक्षा कर रहे हैं।’

वरिष्ठ नेता विविध विषयों पर पूरे संगठन के लिए क्षमता निर्माण सत्र आयोजित करते हैं।

संगठन मैनेजर पद पर काम करने वाले सदस्यों और वरिष्ठ नेताओं को कोचिंग भी प्रदान करता है। पूजा कहती हैं कि इससे उन्हें रोज़मर्रा के जीवन में लोगों से जुड़े मामलों, समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलती है। इसके बदले में, वरिष्ठ नेता वित्त और सरकार के साथ फंडरेजिंग और, निगरानी और मूल्यांकन जैसे विविध विषयों पर पूरे संगठन के लिए क्षमता निर्माण सत्र आयोजित करते हैं। पूरा संगठन इनका लाभ उठा सकता है और इनका उद्देश्य उन्हें उन क्षेत्रों को समझने में मदद करना है जिन पर वे काम नहीं करते हैं।

अंत में, अर्पण टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए कई रणनीतियों का उपयोग करता है। इनमें से कुछ में वार्षिक प्रशंसा दिवस (जहां टीम के सदस्य एक-दूसरे के योगदान को स्वीकार करते हैं और सराहना करते हैं), पुरस्कारों के माध्यम से अच्छे प्रदर्शन को पुरस्कृत करना, और सभी टीम के सदस्यों (क्षेत्र और कार्यालय दोनों में) को काम पर आने-जाने से संबंधित खर्चों को भुगतान करना शामिल है।

टेबल पर ब्लॉकस और चिट कार्ड्स_प्रतिभा प्रबंधन
संगठनात्मक मूल्यों की वास्तविक परीक्षा यह है कि आप उन्हें अपने दैनिक कार्यों और निर्णयों में प्रदर्शित कर रहे हैं या नहीं। | चित्र साभार: अर्पण

संस्कृति के महत्व को पहचानना

अर्पण टीम मूल्यों की संस्कृति में विश्वास करता है। हेमेश और पूजा दोनों ही, इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि आपके संगठनात्मक मूल्यों पर स्पष्ट होना और यह सुनिश्चित करना कितना महत्वपूर्ण है कि उन्हें लगातार दोहराया जाए। अर्पण में, प्रत्येक वर्ष, संस्कृति, मूल्यों और दर्शन पर एक टीमव्यापी सत्र आयोजित करते हैं। इन सत्रों में केवल पावरप्वाइंट प्रेजेंटेशन नहीं होता है। हेमेश कहते हैं कि ‘हम लोगों को समूहों में बांटते हैं और उन्हें जीवन से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियां देते हैं। हम इनका उपयोग यह देखने के लिए करते हैं कि लोग काम करते समय किन मूल्यों का प्रदर्शन करते हैं।’ इसके अतिरिक्त, जब कोई नया व्यक्ति शामिल होता है तो मूल्यों से जुड़ी बातों पर जोर दिया जाता है, और उसके बाद दोबारा तिमाही समीक्षाओं के दौरान भी इस पर चर्चा की जाती है।

हेमेश आगे कहते हैं कि ‘संगठनात्मक मूल्यों की वास्तविक परीक्षा यह है कि आप उन्हें अपने रोज़मर्रा के कामों और फ़ैसलों में प्रदर्शित कर रहे हैं या नहीं। क्या वे आपके काम का प्रमुख आधार बनते हैं? इसे लगातार व्यक्त करना और टीम के लिए इसे दोहराना महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि अर्पण की मूल्य संस्कृति के प्रति एक कर्मचारी की सहजता को भी संगठन के प्रदर्शन प्रबंधन मेट्रिक्स में शामिल किया गया है।’

चुनौतियों का सामना करना

लोगों में निवेश करने की चुनौतियां कम नहीं हैं। पूजा और हेमेश के अनुसार, अर्पण ने जिन दो सबसे बड़ी समस्याओं का सामना किया है और कर रहा है, वे व्यक्तिगत विकास और कंपन्सेशन का प्रबंधन करना है।

1. कर्मचारियों का विकास

एक चुनौती जिसका सामना कई संगठन अपने विकास के दौरान करते हैं, वह यह है कि जब वे लोग जो प्रारंभिक टीम का हिस्सा थे – संगठन के स्तंभ जो विरासत को आगे बढ़ाते हैं – संगठन के विस्तार के साथ कौशल का विकास नहीं कर पाते हैं तो क्या होता है?

यह वे कर्मचारी हैं जो अपने उद्देश्य और संगठन के प्रति समर्पित, वफादार और बहुत भावुक हैं। हालांकि, संगठन के आगे बढ़ने के साथ-साथ कुछ लोग अपने करियर में आगे बढ़ने और प्रबंधक बनने के लिए आवश्यक नए कौशल सीखने में कामयाब होते हैं। वहीं कई अन्य लोग भी संघर्ष करते हैं, और संगठन के भीतर करियर पथ की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है। यह कर्मचारियों और लीडर्स, दोनों के लिए निराशाजनक हो सकता है। हेमेश कहते हैं कि ‘वे अगले स्तर तक पहुंचना चाहते हैं लेकिन पहुंचने के योग्य नहीं हैं क्योंकि संभव है कि उनकी क्षमता समाप्त हो गई है या वे खुद को अपग्रेड नहीं करना चाहते हैं। इसलिए आप उन्हें ग्रेड में ऊपर नहीं बढ़ा सकते हैं क्योंकि उनके पास उस स्तर पर काम करने के कौशल की कमी है।’

संगठन के आगे बढ़ने के साथ-साथ कुछ लोग अपने करियर में आगे बढ़ने और प्रबंधक बनने के लिए आवश्यक नए कौशल सीखने में कामयाब होते हैं।

पूजा बताती हैं कि, ‘हमने लोगों को विकल्प देने की कोशिश कि। उसमें से एक है दूसरी टीम के साथ काम करना ताकि उनकी भूमिका में बदलाव आए- इससे एकरसता को तोड़ने में मदद मिलती है। कई बार हमने यह भी महसूस किया कि जहां एक आदमी मैनेजर का पद सम्भालने के योग्य नहीं है वहीं व्यक्तिगत स्तर पर अधिक योगदान दे सकता है। इसलिए हम ऐसी भूमिकाएं बनाते हैं जिनसे वे ऐसा कर पाने में सक्षम होते हैं। हम ऐसी सभी चीजें करने का प्रयास करते हैं क्योंकि हम वास्तव में अपने कर्मचारियों को अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि वे ही हमारी मूल संपत्ति हैं। लेकिन हमेशा ही ऐसा कर पाना हमारे लिए भी संभव नहीं होता है।’

हेमेश का कहना है कि वे टीम के इन सदस्यों को कौशल विकास के लिए उन्हें दिया जाने वाला वार्षिक प्रशिक्षण भत्ता का उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। ‘यह पेचीदा है। आप उन्हें खोना नहीं चाहते हैं लेकिन यह एक व्यक्ति की भी ज़िम्मेदारी होती है कि वे संगठनात्मक विकास और अवसरों के लिए आगे बढ़ें।’

2. वेतन

सेक्टर में वेतन का मानदंड तय करना एक मुश्किल काम है। कुछ भुगतान के अध्ययन हैं, लेकिन पूजा बताती हैं कि उनका उल्लेख करना कठिन है क्योंकि सेक्टर में मिलने वाला वेतन अक्सर संगठनों द्वारा किए जाने वाले कार्य, उनके स्थान, टीम और बजट आकार और कई अन्य मानकों के आधार पर काफी भिन्न होता है।

पूजा कहती हैं कि ‘यह देखने के लिए एक बेंचमार्क ढूंढना मुश्किल है कि आप मुआवजे के स्पेक्ट्रम पर कहां हैं। हमेशा ही कुछ ऐसे कर्मचारी होते हैं जो नाखुश रहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे संगठन अधिक पैसा दे रहे हैं। अर्पण में लोगों का वेतन वास्तव में अच्छा है और हम स्पेक्ट्रम में सबसे ऊपर रहने की कोशिश करते हैं क्योंकि हमारे काम का क्षेत्र बहुत कठिन है लेकिन बावजूद इसके यह हमारे लिए एक लगातार बनी रहने वाली चुनौती है।’

हेमेश का कहना है कि वे उन संगठनों के साथ बेंचमार्क करने का प्रयास करते हैं जो बाल संरक्षण पर काम करते हैं। हालांकि उनमें से ज़्यादातर संगठन आकार में अर्पण के बराबर नहीं लेकिन बावजूद इसके ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी संरचना एक समान है। उनका यह भी कहना है कि ‘क्योंकि हम अपनी तुलना फ़ंडिंग संगठनों या सीएसआर के तहत मिलने वाले वेतन से नहीं कर सकते हैं।’ बावजूद इसके, अर्पण को बोर्ड की बैठकों में इतने सारे वरिष्ठ नेताओं और ‘उच्च’ वेतन की आवश्यकता पर विरोध का सामना करना पड़ा है। पूजा बताती हैं कि ‘वे हमारी तुलना अन्य काम करने वाले समाजसेवी संगठनों से करते हैं और उनका कहना है कि नेतृत्व स्तर पर हम लोगों को उच्च वेतन देते हैं। हमारे एक सीएसआर फ़ंडर ने इसे इस साल हमें फंड न देने के लिए एक कारण के रूप में इस्तेमाल किया।’

अन्य समाजसेवी संगठनों को अर्पण की सलाह

1. लोग ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति हैं और इस बात को पहचानें

पूजा कहती हैं कि अपने संगठन में लोगों की देखभाल करना आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ‘जब आप अपनी टीम की देखभाल करते हैं, उनसे मिलने वाले परिणाम बेहतर होते हैं। देखभाल की यह संस्कृति उन लोगों तक पहुंचती है जिनके लिए आप काम करते हैं। अगर आप ज़मीन पर अच्छा काम करना चाहते हैं तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके टीम के सदस्यों की देखभाल हो रही है और उनका सम्मान किया जा रहा है।’

2. वरिष्ठ नेतृत्व में निवेश करें

भले ही अधिक वेतन ही क्यों ना देना पड़े लेकिन बोर्ड में सही लोगों को शामिल करना बहुत अधिक महत्वपूर्ण होता है। पूजा का मानना है कि वरिष्ठ नेतृत्व वाले स्तर पर दिये जाने वाले वेतन (उदाहरण के लिए, कार्यक्रम निदेशक का वेतन) को कार्यक्रम बजट में शामिल किया जाना चाहिए। ‘हां, अलग-अलग लोगों को अलग-अलग वेतन देने से स्थिति थोड़ी सी बिगड़ ज़रूर सकती है लेकिन मौजूदा कर्मचारियों को अगले वित्तीय वर्ष में बराबर लाने के लिए बाजार में सुधार किया जा सकता है। आपके कार्यक्रम का खर्च बढ़ेगा लेकिन अगर आप चाहते हैं कि उसका प्रभाव हो तो ऐसा करना ही होगा। कुशल एवं अनुभवी लोगों की ज़रूरत है।’

एक बार जब ऐसे वरिष्ठ नेता बोर्ड में शामिल हो जाते हैं, तब संगठन को उन्हें बाक़ी की टीम से जोड़ने में, फ़ैसले लेते समय उनका समर्थन करने में समय का निवेश करना पड़ता है और साथ उन्हें वैसी सभी सहायताएं प्रदान करनी पड़ती है जिनसे अपनी भूमिकाओं को सफलतापूर्वक निभाने में मदद मिले।

3. संवाद के लिए एक खुले चैनल का निर्माण करें, लोगों से प्रतिक्रियाएं मांगे और उन पर काम करें

संगठन में प्रतिक्रियाओं के लेन-देन के लिए एक उचित प्रणाली, कर्मचारियों की बातों को सुनना और गंभीरता से उनके सुझावों को स्वीकार करना बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। ‘हम बेहतरी के लिए लगातार ही अपने टीम से उनकी प्रतिक्रियाएं मांगते रहते हैं। अगर हम एक बेहतर कार्यस्थल वाले और अपने कर्मचारियों को बनाए रखने वाली समाजसेवी संस्था बनने का इरादा रखते हैं, तो उसके लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वहां का वातावरण ऐसा हो कि लोगों को उस संगठन से जुड़कर काम करने में मज़ा आए। टीम से निरंतर संवाद करते रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्हें समय-समय पर बताया जाना चाहिए कि ‘हमने इन सुझावों पर काम किया है और अब हम इस स्थिति में हैं।’ अर्पण ने इन काम को विभिन्न तरीक़ों से किया है।’

जैसे ग्रेट प्लेस टू वर्क पहल में एक गुमनाम सुझाव/फीडबैक फॉर्म होता है, पूजा अर्पण में अलग से एक गुमनाम फीडबैक फॉर्म की व्यवस्था रखती हैं। इसके अलावा वह साल में एक बार पूरी टीम के साथ लेवल स्किप करती हैं। ‘पिछले साल हमारे एचआर सलाहकार ने प्रबंधक और निदेशक स्तर पर एक फीडबैक प्रक्रिया का आयोजन भी किया था। इसलिए निरंतर फीडबैक की व्यवस्था लागू की गई और हम लगातार टीम के लोगों की बातें सुनने लगे।’

4. मानव संसाधन प्रक्रियाओं और नीतियों को लागू करें

छोटे आकार के संगठनों में, गतिविधियों और कार्य के लिए ठोस संरचना न होने पर भी चीज़ें काम करती हैं। लेकिन पूजा का कहना है कि जैसे ही आपका विस्तार होने लगता है और आपके कर्मचारियों की संख्या 20 तक पहुंच जाती है, तब एचआर नीतियों और संचार प्रक्रियाओं को लागू करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

‘मुझे लगता है कि कर्मचारियों की सबसे बड़ी नाराजगी यह हो सकती है कि ‘यह मेरे लिए उचित नहीं है।’ लेकिन जब आपके पास एक तय प्रक्रिया और नीति होती है, तब बाहर ‘ऐसा सब के लिए है’ वाला संदेश जाता है। यह स्पष्टता बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। चाहे इसका संबंध इंडक्शन, भर्ती या काम से निकाले जाने जैसी बातों से हो, या फिर छुट्टियों या भुगतान से- सभी कुछ को एचआर दस्तावेज़ों में व्यवस्थित ढंग से दर्ज किया जाना चाहिए ताकि सभी तक इसकी पहुंच हो सके। साथ ही एक निश्चित समयांतराल पर इसकी समीक्षा की जानी चाहिए और लोगों को इसके बारे में बताया जाना चाहिए।’

दाताओं के लिए अर्पण का सुझाव

1. काम को देखें ना कि वेतन को

पूजा का कहना है कि फंडर्स को वेतन में गड़बड़ी करने की बजाय उस काम पर ध्यान देना चाहिए जो एक संगठन कर रहा है, यह सवाल करते हुए कि उनके पास इतने सारे वरिष्ठ नेता क्यों हैं, या उन्हें प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर खर्च करने की आवश्यकता क्यों है। ‘इस मामले में हम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि हमारे पास हमारे वेतन को लेकर सवाल करने वाले फ़ंडर अधिक संख्या में नहीं हैं। लेकिन मैं देखती हूं कि यह मामला बढ़ता ही जा रहा है, विशेष कर सीएसआर फ़ंडरों के मामले में। मैं उनसे यह कहना चाहती हूं कि ‘वेतन पर सवाल ना उठाएं। इसके बदले, उस काम को देखें जो किया जा रहा है। अगर आपको लगता है कि दोनों में किसी तरह का तालमेल नहीं है, यह कि काम अच्छा या प्रभावी नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी संगठन अच्छा वेतन दे रहा है, तब आपको सवाल करने का पूरा हक़ है। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो कृपया संगठन के फ़ैसले पर भरोसा बनाए रखें।’ इसके अलावा, बड़े पैमाने पर किए जा रहे काम को चलाए रखने के लिए किसी संगठन की टीम के कौशल और क्षमताओं को बढ़ाने की ज़रूरत होती है। इसलिए टीम की क्षमता निर्माण में निवेश करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसका मतलब है कि फंडर्स को प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर अपने अनुदान प्राप्तकर्ताओं की लागत का अनुमान नहीं लगाना चाहिए।’

2. लंबीअवधि वाली फंडिंग में निवेश करें

एक बार जब कोई दानकर्ता किसी समाजसेवी संगठन के साथ काम कर लेता है और उनके काम के प्रभाव को देख लेता है, तब उन्हें लंबी-अवधि और मुख्य फ़ंडिंग के बारे में सक्रिय रूप से सोचना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें क्षमता और ख़र्चों को बेहतर तरीक़े से योजनाबद्ध करने में सहायता मिलती है। यह तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब कोई संगठन एक मज़बूत नेतृत्व वाले टीम का निर्माण करना चाहता है।
पूजा कहती हैं कि ‘अगर आप बोर्ड में किसी वरिष्ठ सदस्य को रखना चाहते हैं तब एक साल की फ़ंडिंग मददगार नहीं होगी। फंडर्स को कम से कम तीन वर्षों की प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए। ऐसा करने से हम ऐसे अनुभवी लीडर्स को नियुक्त कर सकते हैं जिनके अंदर संगठन को आगे स्तर पर ले जाने की क्षमता होती है।’

पूजा तपारिया भारत में बाल यौन शोषण के उन्मूलन की दिशा में काम करने वाली एक समाजसेवी संस्था अर्पण की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी निदेशक हैं। वे सोल के एआरसी के बोर्ड में भी हैं जो संघर्षरत शिक्षार्थियों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियों का समाधान करता है और उनके जीवन परिणामों को बेहतर बनाने की दिशा में काम करता है।

हेमेश शेठ एक वरिष्ठ मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं जिनके पास मजबूत सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, टीम प्रबंधन, व्यवसाय विकास, नेतृत्व और संगठन निर्माण में 25 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उनके पास व्यवसाय योजना, संचालन और टीम निर्माण का व्यावहारिक अनुभव है। वे एक दशक से अधिक समय से अर्पण के साथ जुड़े हुए हैं और सहायता संचालन टीम का नेतृत्व करते हैं, जिसमें वित्त, मानव संसाधन, प्रशासन और आईटी कार्य शामिल हैं।

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क्या बेहतर उद्यमिता और रोज़गार सृजन भारत में गरीबी ख़त्म कर सकता है? 

भारत अब दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश हो गया है और यहां हर महीने दस लाख से अधिक नए श्रमिक कार्य-बल में शामिल होते हैं – यह स्वीडन की हर साल कार्य-बल में शामिल होने वाली पूरी जनसंख्या के बराबर है (ब्लूम एवं अन्य 2011, ग़नी 2018)। चूंकि यह स्थिति अगले दो दशकों तक जारी रहने की संभावना है, ऐसे में नौकरियों के सृजन की गति ही भविष्य में गरीबी की कमी की गति को निर्धारित करेगी।

हालांकि आर्थिक इतिहास के महान दिग्गजों ने रोज़गार सृजन और गरीबी में कमी के बीच के संबंध को पहचाना है, फिर भी अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। क्या नए और छोटे प्रतिष्ठान या बड़ी और स्थापित कम्पनियां रोज़गार सृजन में अधिक योगदान देती हैं? क्या विनिर्माण या सेवा क्षेत्र गरीबी को कम करने में अधिक योगदान देता है? क्यों कुछ शहरों में अधिक नौकरियों का सृजन होता है और वहां गरीबी तेज़ी से कम होती है?

कई शोध अध्ययनों ने उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में, रोज़गार सृजन में उद्यमिता की भूमिका की जांच की है। लेकिन भारत के संदर्भ में ऐसे अनुभवजन्य साक्ष्य की बहुत कमी है। इस लेख में (ग़नी एवं अन्य 2011ए) हमने भारत के लगभग 600 जिलों में स्थित विनिर्माण और सेवा क्षेत्र, दोनों में उद्यमिता और नौकरियों के बीच सम्बन्ध की जांच की है।

भारत में उद्यमिता का आर्थिक भूगोल

यद्यपि उद्यमिता और रोज़गार सृजन के लिए भारत का आर्थिक परिवेश अभी भी विकसित हो रहा है, साक्ष्य दर्शाते हैं कि बड़े पैमाने पर नौकरियों का सृजन नए स्टार्ट-अप द्वारा किया जा रहा है, न कि बड़ी और पुरानी कम्पनियों द्वारा। दुर्भाग्य से, विकास के वर्तमान चरण को देखते हुए, भारत में नए स्टार्ट-अप की संख्या और उद्यमिता की दरें कम बनी हुई हैं (ग़नी एवं अन्य 2011बी)। तीन साल से कम पुराने उद्यमों की संख्या में समय के साथ थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई है (डेसमेट एवं अन्य 2011), जबकि यह हर साल लाखों अपेक्षित नौकरियों के सृजन के लिए पर्याप्त नहीं है। देश के विभिन्न जिलों और राज्यों में स्टार्ट-अप के स्थानिक वितरण में भी भारी विषमताएं मौजूद हैं।

फोन पर बात करता एक व्यक्ति_रोजगार
भारत में उद्यमशीलता की क्षमता सुनिश्चित करने, नौकरियों के निर्माण और गरीबी को कम करने में योगदान देने में शहर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। | सीसी बाय: विक्टर ग्रिगॉस / सीसी बाय

कौन से क्षेत्रीय और स्थानिक लक्षण भारत में नए स्टार्ट-अप और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं? इसका एक सम्भावित स्पष्टीकरण निवेश और उद्यमिता पर अलग-अलग ‘रिटर्न’ का होना है। दूसरा यह है कि नए उद्यमी स्थानीय बुनियादी ढांचे, शिक्षा, जनसंख्या घनत्व, व्यापार के अंतर-संपर्क और यहां तक कि जनसांख्यिकी में अंतर के अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं, जबकि उनके पास व्याख्या करने की शक्ति सीमित होती है। कारणों की यह सूची किसी भी तरह से सम्पूर्ण नहीं है, लेकिन यह आर्थिक गतिविधियों के एकत्रीकरण और नए स्टार्ट-अप के विकास के लोकप्रिय स्पष्टीकरणों की सूची के समानांतर है।

हमने पाया कि नए स्टार्ट-अप और उद्यमिता का अनुमान लगाने वाले दो सबसे सुसंगत कारक हैं – स्थानीय शिक्षा का स्तर और स्थानीय भौतिक बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता। यह विनिर्माण और सेवा क्षेत्र, दोनों के संदर्भ में सच है। भारत में उद्यमिता और रोज़गार सृजन की गति को धीमा करने में कारक बाज़ार और पारिवारिक बैंकिंग गुणवत्ता भी अपनी भूमिकाएं निभाते हैं। दुर्भाग्य से, भारत में कारक बाज़ार अत्यधिक बिगड़ा हुआ है। भूमि और वित्तीय बाज़ार विशेष रूप से, श्रम बाज़ारों की तुलना में अधिक विकृत हैं (ड्यूरेंटन एवं अन्य 2016)। खराब पारिवारिक बैंकिंग माहौल के साथ ही, भूमि का खराब आवंटन भी स्टार्ट-अप को, खासकर नए और छोटे उद्यमों को, हतोत्साहित करता है।

गरीबी चक्र को तोड़ने के लिए क्या किया जा सकता है?

नीति-निर्माताओं को रोज़गार सृजन और गरीबी में कमी के बीच के मज़बूत सम्बन्ध को पहचानने की ज़रूरत है। यह चिंताजनक है कि भारत में विकास के वर्तमान स्तर के अनुसार बहुत कम उद्यमी हैं। यदि भारत उद्यमियों को समर्थन देने के लिए कारक बाज़ार की विकृतियों को कम करने, भौतिक व मानव बुनियादी ढांचों दोनों को, विकसित करने और नेटवर्किंग तथा समूह अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ, कुछ बुनियादी नीतिगत कदम उठाना जारी रखता है तो इन उपायों में व्यापार सृजन, नौकरी वृद्धि और गरीबी में कमी लाने की क्षमता है।

जिस गति से देश भौतिक पूंजी और भौतिक बुनियादी ढांचे को जमा कर सकते हैं, उसकी परिभाषित सीमाएं हैं, लेकिन जिस गति से मानव-बुनियादी-ढांचे और शिक्षा को बढ़ाया जा सकता है, और फिर ज्ञान में अंतर को समाप्त किया जा सकता है, उसकी सीमाएं कम स्पष्ट हैं। चूंकि शिक्षा, स्टार्ट-अप और नौकरियों के बीच मज़बूत आपसी सम्बन्ध हैं, नीति-निर्माताओं को चाहिए कि वे स्थानीय कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता और वृद्धि को रोकने वाली सभी बाधाओं को दूर करें।

नीति-निर्माताओं को फर्मों के पीछे लगने (अर्थात अन्य स्थानों से बड़ी परिपक्व फर्मों को आकर्षित करने) में व्यस्त रहने की बजाय अपने समुदायों में उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। छोटा भी सुंदर और दमदार होता है, इसलिए रोज़गार सृजन में ‘नए और छोटे उद्यमों’ पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। भारत के अनुभवों से पता चलता है कि नई और छोटी कम्पनियों के प्रारंभिक स्तर और उसके बाद नौकरी में वृद्धि और गरीबी में कमी के बीच एक मज़बूत आपसी सम्बन्ध है।

भारत में उद्यमशीलता की क्षमता सुनिश्चित करने, नौकरियों के निर्माण और गरीबी को कम करने में योगदान देने में शहर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि शहरों में अधिकांश नई नौकरियां सृजित करने और प्रति व्यक्ति आय में चार गुना वृद्धि लाने की क्षमता है (ग़नी एवं अन्य 2014)। ऐसे प्रतिस्पर्धी शहर जो रहने योग्य हों, जिनमें अच्छा बुनियादी ढांचा हो, ज्ञान सृजन और क्षमता निर्माण में व्यापक रूप से निवेश करते हों, अच्छी तरह से शासित हों, मज़बूत राष्ट्रीय शहरी नीति ढांचे का समर्थन करते हों और स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत सार्वजनिक और निजी भागीदारी के माध्यम से काम करते हों, उद्यमियों को भी आकर्षित करते हैं।

आर्थिक विकास के लिए उद्यमिता भी महत्वपूर्ण है। भारत में ऐतिहासिक रूप से उद्यमिता दर कम रही है, फिर भी स्थिति में सुधार हो रहा है और इस कमज़ोरी पर काबू पाना तेज़ आर्थिक और नौकरी वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा। भारत का आर्थिक परिवेश अभी भी विनियमन से पहले मौजूद स्थितियों को समायोजित कर रहा है और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों की तुलना में, यहां के स्थानिक परिणामों में बहुत अधिक भिन्नता मौजूद है। यह स्थानीय क्षेत्रों के समूहीकरण और शहरी अर्थव्यवस्थाओं से लाभ उठाने के लिए प्रभावी नीति डिज़ाइन के महत्व को भी रेखांकित करता है। 

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यह आलेख मूलरूप से आइडिया फ़ॉर इंडिया पर प्रकाशित हुआ था जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

समाजसेवी संस्थाएं और उनके दबे-छिपे कामकाजी मूल्य

क्या आप नीचे दिए गये चित्र में संस्थाओं के मूल्य खोज सकते हैं?

विकास सेक्टर से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण शब्द_समाजसेवी संस्थाएं
चित्र साभार: रजिका सेठ/वर्ड इट आउट

14-18 साल के बच्चों से जुड़े कार्यक्रमों में मददगार असर रिपोर्ट के पांच बिंदु

जनवरी के तीसरे हफ़्ते में समाजसेवी संस्था प्रथम ने भारत में शिक्षा की स्थिति बताने वाली अपनी सालाना रिपोर्ट, असर 2023 बियॉन्ड बेसिक्स शीर्षक के साथ जारी की। इस रिपोर्ट में देश के 26 राज्यों के 28 ज़िलों में, 14-18 साल आयु समूह के लगभग 35 हजार बच्चों पर किए गए सर्वे के आंकड़ों को शामिल किया गया है। यह सर्वे बताता है कि इस आयु वर्ग के ज़्यादातर बच्चों के नाम शैक्षणिक संस्थान में दर्ज होने के बाद भी ये बच्चे अपने दैनिक जीवन में इसका उपयोग करने लायक पढ़ना लिखना नहीं सीख पाए हैं। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि पढ़ाई की बहुत अधिक इच्छा होने के बावजूद, महिलाओं का प्रदर्शन और उनके लिए संसाधनों की उपलब्धता का स्तर दोनों ही, पुरुषों की तुलना में ख़राब रहा है। इसके अलावा, तकनीकी माध्यमों जैसे स्मार्टफ़ोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया वग़ैरह के सही और सुरक्षित इस्तेमाल से जुड़े आंकड़े भी रिपोर्ट में साझा किए गए हैं। अगर आप शिक्षा के क्षेत्र या युवा सेक्टर में काम करते हैं तो यहां पर कुछ ख़ास आंकड़ों का ज़िक्र किया गया है जिन्हें ध्यान में रखने से, आपको बेहतर रणनीति बनाने या प्रोग्राम डिज़ाइन करने में मदद मिल सकती है। 

लक्षित आयु समूह चुनते हुए 

असर की रिपोर्ट बताती है कि सर्वे में शामिल 14-18 साल के 86.6% बच्चों का नाम किसी न किसी शैक्षणिक संस्था में दर्ज है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ नामांकन के आंकड़ें में उल्लेखनीय रूप से कमी दिखाई पड़ती है। लंबे समय से सरकार और समाजसेवी संस्थाओं के प्रयासों में अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने वाला बिंदु शामिल रहा है। लेकिन यह रिपोर्ट इस ओर इशारा करती है कि अब नई चुनौती किशोर बच्चों और नवयुवाओं को शैक्षणिक संस्थानों में रोककर रखना है। रिपोर्ट के मुताबिक़, 14 साल की उम्र में केवल 3.9% बच्चे स्कूल छोड़ते हैं लेकिन 18 वर्ष तक आते-आते यह आंकड़ा 32.6% हो जाता है। इसे इस तरह से कहा जा सकता है कि 18 वर्ष के जितने भी युवा हैं, उनमें से एक तिहाई का नाम किसी भी स्कूल-कॉलेज में दर्ज नहीं है। शिक्षा संबंधी कार्यक्रम डिज़ाइन करते हुए, रणनीति बनाते हुए अधिक आयु (16-18 वर्ष) वाले किशोरों पर ध्यान देने से बड़े स्तर के बदलाव लाए जा सकते हैं। समाजसेवी संस्थाओं को इसके पीछे की आर्थिक, भौगोलिक और सामाजिक वजहों को पहचानने, और कार्यक्रमों को उनके मुताबिक़ डिज़ाइन करने की ज़रूरत है।

कक्षा में बैठी बालिकाएं__असर सर्वे
18 वर्ष के जितने भी युवा हैं, उनमें से एक तिहाई का नाम किसी भी स्कूल-कॉलेज में दर्ज नहीं है। | चित्र साभार: पे‍क्सेल्स

प्रशिक्षण सामग्री तैयार करते हुए

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के सामने भाषा आमतौर पर बाधा नहीं बनती है क्योंकि वे क्षेत्रीय भाषा के जानकार होते हैं। लेकिन फैसिलिटेशन या प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान भाषा पर ध्यान देना ज़रूरी है। असर रिपोर्ट कहती है कि सर्वे के दौरान लगभग 25% युवा अपनी क्षेत्रीय भाषा में, कक्षा-2 का गद्य बिना अटके पढ़ने में असमर्थ मिले। अंग्रेज़ी के मामले में 57.3% युवा वाक्यों को पढ़ सके और इन्हें पढ़ सकने वालों में से तीन चौथाई उसके मायने बता सके। यह आंकड़ा बताता है कि युवाओं के लिए प्रशिक्षण सामग्री तैयार करते हुए भाषा को सरलतम रखे जाने की ज़रूरत है। इसके अलावा, कुछ रचनात्मक तरीक़ों या व्यावहारिक उदाहरणों का इस्तेमाल करना भी आपकी बात को उन तक बेहतर तरीक़े से पहुंचाने में मदद करेगा।

आजीविका से जुड़े कार्यक्रम बनाते हुए

असर रिपोर्ट बताती है कि केवल 5.6% युवा सिलाई, ऑटोमोटिव रिपेयर, इलेक्ट्रीशियन, इंटीरियर डिजाइनिंग वग़ैरह जैसे व्यावसायिक प्रशिक्षण हासिल करते हैं। कॉलेज स्तर के युवाओं में व्यावसायिक प्रशिक्षण हासिल करने का प्रतिशत 16.25% तक जाता दिखता है। आजीविका प्रशिक्षण से  जुड़े कार्यक्रम डिज़ाइन करते हुए इस आंकड़े को ध्यान में रखा जा सकता है। इसके अलावा परंपरागत प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अलग युवाओं को आकर्षित करने वाले कुछ नए विकल्पों के बारे में सोचा जा सकता है? साथ ही, वे कौन से विकल्प होंगे जो कम आयु और शिक्षास्तर वाले युवाओं के लिए अधिक उपयुक्त होंगे। इस तरह के प्रयास ज़रूरी हैं क्योंकि 40.3% युवा लड़के और 28% लड़कियां अपने घरेलू कामकाज के अलावा बाहर जाकर भी काम करते हैं।

40.3% युवा लड़के और 28% लड़कियां अपने घरेलू कामकाज के अलावा बाहर जाकर भी काम करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से उनकी आमदनी शून्य होती है।

इसमें एक बड़ा हिस्सा अपने घर पर खेती-बाड़ी से जुड़े  काम करने वाले युवाओं का है। इसका एक मतलब यह भी है कि इससे उनके परिवार की आय में तो सहयोग मिलता है लेकिन व्यक्तिगत रूप से उनकी आमदनी शून्य होती है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि कार्यक्रम बनाने के दौरान शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ युवाओं के समय की उपलब्धता का भी ध्यान रखना, उनके लिए सुविधाजनक हो सकता है। इसके अलावा, यह आंकड़ा महिलाओं के लिए अधिक संख्या में और अधिक उपयुक्त आजीविका प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुंजायश होने की बात को भी स्पष्ट करता है।

डिजिटल माध्यमों को अपनाने से पहले

स्मार्टफोन के संदर्भ में सर्वे यह जानकारी देता है कि लगभग 90% युवाओं के घर पर स्मार्टफ़ोन हैं और वे इसका उपयोग करना जानते हैं। लड़कियों के पास उनका निजी मोबाइल फ़ोन होने का आंकड़ा जहां 19.8% था, वहीं लड़कों के मामले में यह दोगुने से अधिक यानी 43.7% था। कम्प्यूटर लैपटॉप की उपलब्धता के मामले में आंकड़ा 9% पर ही रुक जाता है। इसके अलावा, लगभग आधे युवा स्मार्टफ़ोन के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में नहीं जानते हैं। इनमें सोशल मीडिया पर किसी को रिपोर्ट या ब्लॉक करना, प्राइवेट प्रोफ़ाइल बनाना और पासवर्ड बदलने जैसी बातें शामिल हैं।

मात्र एक चौथाई युवा ही डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन आवेदन करने, बिल भरने और टिकट बुक करने जैसे काम कर पाते हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल साधनों तक लोगों की पहुंच तो है लेकिन उनका इस्तेमाल करने के लिए उनके पास पर्याप्त कुशलताएं नहीं हैं। समाजसेवी संस्थाओं को यह ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि युवाओं, ख़ासतौर पर युवा लड़कियों के लिए डिज़ाइन किया गया कोई भी कार्यक्रम न तो पूरी तरह से डिजिटल रखा जा सकता है और न ही इसमें बहुत जटिल तकनीक (ख़ासतौर पर इंटरफ़ेस) का इस्तेमाल किया जा सकता है। डिजिटल फ़र्स्ट कार्यक्रमों में भी ऑफ़लाइन विकल्पों की उपलब्धता उनके सफल होने के मौक़े बढ़ा सकता है।

लैंगिक समानता से जुड़े प्रयासों के दौरान

असर रिपोर्ट के आंकड़े बड़ी स्पष्टता से दिखाते हैं कि पढ़ने-समझने, जीवन में गणित का इस्तेमाल करने और डिजिटल उपयोग के मामले में पुरुषों ने महिलाओं से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। यहां तक कि सर्वे के दौरान दिए गए टास्क को करने से मना करने में भी 8.7% पुरुषों के मुकाबले 13.3% महिलाएं रहीं। एक उदाहरण से देखें तो गूगल मैप्स की मदद से किसी जगह जैसे बस स्टैंड तक पहुंचने के टास्क को करने से जहां केवल 32% पुरुषों ने मना किया था, वहीं 55% यानी आधे से अधिक महिलाओं ने इसके लिए ना कहा। रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं ने इसे करने का तरीक़ा समझने में भी न के बराबर रुचि दिखाई। इसका एक कारण महिलाओं में आत्मविश्वास की कमी भी हो सकती है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आज भी उन्हें घर से बाहर निकालने के अवसर बनाने की जरूरत है। इन अवसरों का इस्तेमाल उन्हें नए प्रयोग करने की जगह देने और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

इस आंकड़े से ऐसा अनुमान भी लगाया जा सकता है कि किसी कार्यक्रम की शुरूआत में उससे जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम और रफ़्तार बहुत धीमी हो सकती है। हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि लड़कियों में पढ़ने की इच्छा लड़कों की तुलना में अधिक होती है और मौक़ा मिलने पर वे अपेक्षाकृत अधिक समय तक शैक्षणिक संस्थान में बनी रहती हैं। लेकिन साथ ही उनके पास संसाधनों और अवसर दोनों की कमी स्पष्टत रूप से  से दिखाई देती है। इसके लिए संस्थाओं में अतिरिक्त और नए  तरह के प्रयासों की गुंजायश होनी चाहिए।

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कॉप बैठकों के बारे में ज़मीनी संस्थाओं को क्या जानना चाहिए और क्यों?

वैश्विक जलवायु शासन (ग्लोबल क्लाइमेट गवर्नेंस) राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, निजी क्षेत्र, गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच हमेशा चलने वाली एक संवाद प्रक्रिया है। इसके जटिल तंत्र के केंद्र में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफ़सीसीसी) के तहत बुलाए गए पक्षों का सम्मेलन यानी कांफ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज़ (कॉप) होता है। दूसरी तरह से कहें तो यह सम्मलेन जलवायु मुद्दों से जुड़े वैश्विक प्रयासों का केंद्र है।

कॉप और जलवायु परिवर्तन में संबंध

कॉप सम्मेलनों की सार्थकता को समझने के लिए, हमें पहले जलवायु परिवर्तन के तंत्र को समझना होगा। पृथ्वी पर जलवायु संतुलन बिगड़ रहा है क्योंकि जीवाश्म ईंधन जलाने, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। ग्रीन हाउस गैसों के कारण वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। वैश्विक तापमान में इस वृद्धि के कई परिणाम होते हैं। इनमें मुख्य रूप से वर्षा और ऋतुओं में परिवर्तन, मौसम में बदलाव, गर्मी की लहर, ध्रुवीय बर्फ की चोटियों का तेज़ी से पिघलना शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्र का स्तर बढ़ता है और कठिन मौसमी घटनाएं बार-बार और अधिक तीव्रता से होने लगी हैं। महज़ सुर्ख़ियां बनने से परे, ये परिणाम दुनिया भर में कई लोगों के लिए दैनिक वास्तविकता बन गए हैं। ये परिणाम दुनियाभर के पारिस्थितिकी तंत्र, अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों को प्रभावित कर रहे हैं और स्वास्थ्य, आजीविका और समग्र अस्तित्व पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, वह भयावह शक्ति जो हमारी दुनिया को नया आकार दे रही है, अब कोई दूर का खतरा नहीं है – यह यहीं है, हमारे समुदायों को प्रभावित कर रही है। राष्ट्र डूब रहे हैं, अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं, लोग विस्थापित हो रहे हैं और संस्कृतियां खो रही हैं।

जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलना हमेशा संभव नहीं होता है इसलिए इससे जुड़े शमन, अनुकूलन और नुकसान पर बात करना जलवायु चर्चा के प्रमुख स्तंभ बन गए हैं।

विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में अनोखी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अनुकूलित करने या कम करने के लिए उनके पास अक्सर सीमित संसाधन होते हैं। उदाहरण के लिए, भारत और वैश्विक दक्षिण के कई देशों में, आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है, जो जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इन देशों में चक्रवात, बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं के प्रभाव का खतरा भी अधिक है जो आजीविका और बुनियादी ढांचे पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकते हैं। 

कॉप के प्रमुख स्तंभ

यदि सरल शब्दों में कहा जाये तो कॉप, यानि कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज़, एक सहयोगात्मक प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है जहां वैश्विक नेताओं, नीति निर्माताओं, कॉर्पोरेट्स, गैर-सरकारी संगठन और समुदाय के प्रतिनिधियों समेत लगभग हर देश के प्रतिनिधि सामूहिक जलवायु कार्रवाई की दिशा में रणनीतियों पर चर्चा में भाग लेते हैं। 

संवादों से परे, इसका प्राथमिक उद्देश्य संयुक्त वैश्विक साझेदारी बनाना है जो दुनिया को लंबे समय तक चलने वाले तरीक़ों (सस्टेनेबल प्रैक्टिसेज) और जलवायु लचीलेपन की ओर ले जाए। यह वैश्विक लक्ष्य निर्धारित करने, प्रगति की समीक्षा करने और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को निर्धारित करने के लिए  बनाया गया एक मंच है।

कॉप सम्मेलन में कई देशों के राष्ट्रध्वज_कॉप सम्मेलन
कॉप-28 सम्मलेन जलवायु मुद्दों से जुड़े वैश्विक प्रयासों का केंद्र कहा जा सकता है। | चित्र साभार: फ्लिकर

इस मूलभूत पृष्ठभूमि के साथ-साथ, जलवायु परिवर्तन बहस के मूलभूत स्तंभों को समझना भी महत्वपूर्ण है। ये वैश्विक शिखर सम्मेलनों के दौरान की गई चर्चाओं और निर्णयों का मूल आधार बनते हैं। प्रमुख स्तंभों में शामिल हैं:

शमन (मिटिगेशन): शमन से जुड़े प्रयास जलवायु संकट के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर केंद्रित होते हैं। यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान देने वाले स्रोतों से दूर जाने, स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों, अर्थव्यवस्थाओं में टिकाऊ प्रथाओं को लागू करने के साथ-साथ उत्सर्जन में कमी करने वाले तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के बारे में बात करता है।

अनुकूलन (ऐडप्टेशन): जलवायु परिवर्तन की कड़वी वास्तविकता और निश्चितता को वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया जा चुका है। जलवायु संकट गहराने के साथ, इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर तैयारी सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाता है। अनुकूलन रणनीतियों में कई प्रकार के घटक शामिल हो सकते हैं। जैसे- लचीले बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर, जलवायु स्मार्ट कृषि पद्धतियों को विकसित करने तक, यह सुनिश्चित करने के लिए कि समुदाय और प्रणालियाँ उभरती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच विकसित हो सकें।

वित्त (फाइनेंस): जलवायु कार्रवाई की जीवनधारा के रूप में कार्य करते हुए, वित्त वह आधारशिला है जो एक सुरक्षित दुनिया (सस्टेनेबल वर्ल्ड) की ओर न्यायसंगत परिवर्तन का समर्थन करता है। इस स्तम्भ की चर्चा में, जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने में विकासशील और कम आय वाले देशों को समर्थन देने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

हानि और क्षति (लॉस एंड डैमेज): जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलना हमेशा संभव नहीं होता है। इसलिए इससे हुए नुकसान और क्षति पर बात करना, जलवायु चर्चा का एक और प्रमुख स्तंभ बन गया है। इस चर्चा में विभिन्न प्रकार के नुकसानों की बात की जाती है, कुछ वित्तीय तो कुछ गैर आर्थिक नुकसान। स्थानीय स्तर पर ऐसे नुकसान के उदाहरणों में संस्कृति, भावनात्मक स्थानों, विरासत, भाषा आदि की क्षति शामिल है। हानि और क्षति जलवायु न्याय और समानता की अवधारणा से निकटता से जुड़ा हुआ विषय भी है क्योंकि दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देश अक्सर ग्रीनहाउस गैसों के सबसे कम उत्सर्जक होते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि इन देशों में जहां संसाधन सीमित हैं, नुकसान और क्षति के लिए वास्तव में किसे भुगतान करना चाहिए।

कॉप बैठकों का महत्व

कॉप बैठकें वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए एक पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए राजनयिकों, वैज्ञानिकों, नीति विशेषज्ञों की एक विविध सभा को एकत्रित करती हैं। इन विचार-विमर्शों में बने संकल्प और वैश्विक समझौते जलवायु कार्रवाई पर वैश्विक कथा को आकार देते हैं। कॉप का एक प्रमुख कार्य पार्टियों द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय संचार और उत्सर्जन सूची की समीक्षा करना है। इस जानकारी के आधार पर, कॉप पार्टियों द्वारा उठाए गए उपायों के प्रभावों और कन्वेंशन के अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने में हुई प्रगति का आकलन करता है।

कॉप में गैरसरकारी संगठनों और पर्यवेक्षक संगठनों की भूमिका

राजनयिक क्षेत्र से परे, कुछ गैर-सरकारी संगठन पर्यवेक्षकों  के तौर पर समानांतर तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।पर्यवेक्षक का दर्जा कुछ संगठनों को प्रदान किया गया एक विशेष दर्जा है जो उन्हें यूएनएफ़सीसीसी की गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेने का अवसर प्रदान  करता है। इस तरह गैर-सरकारी संगठन, पर्यावरण समूह और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के समर्थक सम्मेलन में होने वाली चर्चाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते है और होने वाली चर्चाओं और विचार-विमर्श और विकास पर सतर्क नज़र रखते हैं। उनकी भूमिका चर्चाओं में भाग लेने से लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ यह सुनिश्चित करने करने की है कि कॉप सम्मेलनों में लिए गए निर्णय न केवल समावेशी हों, बल्कि सबसे कमजोर लोगों की ज़रूरतों  और अधिकारों को भी ध्यान में रखें। ये संगठन व्यवसाय और उद्योग, पर्यावरण समूहों, खेती और कृषि, स्वदेशी आबादी, स्थानीय सरकारों और नगरपालिका अधिकारियों, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों, श्रमिक संघों, महिलाओं और लिंग और युवा समूहों जैसे कई हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जलवायु न्याय के मुद्दे की गंभीरता

हालांकि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक खतरा है, इसके सभी पर पड़ने वाले इसके प्रभाव समान नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन के परिणाम, वर्तमान उत्सर्जन में न्यूनतम योगदान देने के बावजूद, कम आय वाले और विकासशील देशों को असमान रूप से प्रभावित कर रहे हैं। इसके विपरीत, विकसित देशों ने पहले ही अपनी अर्थव्यवस्थाएं स्थापित कर ली हैं जिन्हें बनाने के लिए किया गया उत्सर्जन मौजूदा जलवायु संकट के लिए मुख्यरूप से ज़िम्मेदार है। कई परस्पर जुड़े कारक समुदायों और प्रणालियों की भेद्यता (यानी, पर्यावरणीय परिवर्तनों या आपदाओं से उनके प्रभावित होने का कितना खतरा है) को निर्धारित करते हैं। परिणामस्वरूप, जलवायु चर्चाओं के भीतर न्याय सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो जाता है और कॉप के मंच पर यह एक सशक्त मुद्दा रहा है।

ज़मीनी संस्थाओं के लिए कॉप का महत्व

जमीनी स्तर के संगठनों के लिए, यूएनएफसीसीसी कॉप एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है जहां जलवायु नीतियों पर चर्चा की जाती है। जमीनी संगठन उभरती जलवायु राजनीति, वैश्विक प्राथमिकताओं और रुझानों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लिए कॉप की कार्यवाही पर बारीकी से नजर रख सकते हैं।अपनी पहलों को विश्व स्तर की कार्रवाइयों और राष्ट्रीय रणनीतियों के साथ जोड़कर, ये संगठन यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनके प्रयास व्यापक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप हैं।

इसके अलावा, कॉप जलवायु परिवर्तन शमन और अनुकूलन में नवीन समाधानों और सबसे कारगर तरीकों (बेस्ट प्रैक्टिसेज) को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच प्रदान करता है। यहां जमीनी स्तर के संगठन दुनियाभर में लागू सफल परियोजनाओं, बेस्ट प्रैक्टिसेज और नीतियों के बारे में जानकारी पा सकते हैं। सीखों को शामिल करके और सिद्ध रणनीतियों को अपने स्थानीय संदर्भ में अपनाकर, ये संगठन अपनी पहलों की प्रभावशीलता को बढ़ा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, जलवायु संकट की तात्कालिकता और दुनियाभर में इस खतरे के बारे में बढ़ती जागरूकता के कारण, विकास परियोजनाओं से जुड़ी कईं फंडिंग जलवायु-संबंधित चुनौतियों से निपटने पर केंद्रित है। जमीनी संगठन इन फंडिंग अवसरों का पता लगा सकते हैं और उन्हें अपनी संसाधन जुटाने की रणनीतियों में एकीकृत कर सकते हैं। कॉप से उत्पन्न वित्तीय परिदृश्य को समझने से इन संगठनों को अपनी परियोजनाओं को बढ़ाने के लिए संभावित दाताओं, साझेदारियों और फंडिंग स्रोतों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, कॉप नेटवर्किंग के अवसरों को बढ़ावा देता है, जिससे जमीनी संगठनों को समान विचारधारा वाली संस्थाओं से जुड़ने, अनुभव साझा करने और सामान्य लक्ष्यों पर जुड़कर काम करने के अवसर मिलते हैं। जमीनी स्तर के संगठन इस वैश्विक नेटवर्क का लाभ उठा सकते हैं और अपनी क्षमता और प्रभाव को मजबूत करने के लिए उपलब्ध संसाधनों, विशेषज्ञता और समर्थन का पता लगा सकते हैं।

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किसान उत्पादक संगठनों की सफलता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?

कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2002 लागू होने के बाद से, पिछले 22 वर्षों में, भारत में लगभग 7 हज़ार किसान उत्पादक संगठन (एफ़पीओ) – जिनमें जिनमें 4.3 मिलियन से अधिक छोटे उत्पादक शामिल हैं – का पंजीकरण हुआ है। इनमें से 92 फ़ीसद कृषि-आधारित हैं। अधिकांश एफ़पीओ कृषि मूल्य शृंखला (वैल्यू चेन) में मध्यस्थों की तरह काम करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि ये ग्रेडिंग, छंटनी और इकट्ठा करने जैसी बुनियादी प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

देश में लगभग 90 फ़ीसद एफ़पीओ मुख्य रूप से इनपुट प्रबंधन से जुड़े हुए हैं। यानी कि वे उर्वरक, बीज और कीटनाशक जैसे उत्पादों की ख़रीदकर इकनॉमीज ऑफ स्केल (कंपनियों को उनके आकार के कारण प्राप्त होने वाला लागत लाभ) प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इनमें अधिकांश एफ़पीओ आउटपुट के प्रबंधन पर ध्यान नहीं देते हैं। यहां तक ​​कि ये प्राथमिक आउटपुट जैसी बुनियादी चीज पर भी ध्यान नहीं देते हैं, जो कि किसानों की उपज को मंडी में ले जाने के लिए एकत्र किया जाता है। अधिकांश उद्यमों के अव्यवहारिक होने के पीछे के प्रमुख कारणों में एफ़पीओ मॉडल का सीमित उपयोग भी एक है। एक अनुमान के अनुसार, 86 फ़ीसद एफ़पीओ की चुकता पूंजी (पेड-अप कैपिटल) 10 लाख रुपये से कम है और इससे निजी किसानों या एफपीओ को बढ़ी हुई आय या बाजार के दबदबे के मामले में बहुत कम फायदा मिलता है।

मूल्यवर्धन, जिसे कि ‘ऑफ-फार्म गतिविधि’ भी कहा जाता है, का अर्थ भोजन, फ़ैशन या जीवन शैली, किसी भी क्षेत्र में बाज़ार के लिए तैयार उत्पादों के निर्माण से है। मूल्य-वर्धक उत्पाद जैसे कि अनाज, जैम, टोकरियां और कपड़े आदि से उत्पादकों को अधिक लाभ मिलता है। इस प्रकार वे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन हैं।

मूल्यवर्धन का सीधा अर्थ उत्पादन से है

खेती से उलट, विनिर्माण व्यक्तिगत स्तर पर की जाने वाली गतिविधि नहीं है। 1-5 एकड़ ज़मीन वाला कोई छोटा किसान अकेले ही खेती कर सकता है और अपनी उपज को बेच सकता है। लेकिन विनिर्माण व्यक्तिगत स्तर पर किया जाने वाला प्रयास नहीं है; उत्पादन और मार्केटिंग के लिए लोगों के एक समूह द्वारा किए जाने वाले ठोस प्रयास की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, एक महिला अकेले ही टमाटर केचप का उत्पादन करके उसे फ़ास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड (एफएमसीजी) कंपनी को नहीं बेच सकती है।

इसका मतलब यह है कि यदि ऑफ-फार्म उत्पादक कंपनियों (ओएफ़पीओ) को फलना-फूलना है तो उसके लिए हमें सिर्फ़ एक किसान के काम करने की मानसिकता से निकलकर उत्पादन-उन्मुख सोच को अपनाने की ज़रूरत होगी। भारत में अधिकांश एफ़पीओ का मूल्यवर्धन में योगदान लगभग शून्य के बराबर होता है और वे केवल कृषि उत्पादों की बिक्री से जुड़े होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एफपीओ के मार्जिन को बढ़ाने के लिए उपज पर आवश्यक प्रसंस्करण की मात्रा काफी अधिक होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर कोई किसान दाल की खेती करता है और उसे बेचने से पहले पॉलिश मिल में ले जाकर उसकी पॉलिशिंग पर करवाता है तो इससे एफ़पीओ स्तर पर मार्जिन में किसी तरह का सुधार नहीं आता है।

अगर हम किसानों की आय में बढ़ोतरी देखना चाहते हैं तो हमें विनिर्माण की मानसिकता अपनानी होगी।

अगर हम किसानों की आय में बढ़ोतरी देखना चाहते हैं तो हमें सिद्धांत एवं व्यवहार दोनों में विनिर्माण की मानसिकता अपनानी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि हम एक अत्याधुनिक विनिर्माण के सिद्धांतों पर चलने वाले वितरित एवं विकेंद्रीकृत उत्पादन वाले मॉडल का पालन करें।

वैश्विक स्तर पर, श्रमिकों की कमी के कारण अब सभी उत्पादन इकाइयां स्वचालित हो गई हैं। हालांकि, भारत के मामले में यह एक सही समाधान नहीं हो सकता है क्योंकि हम एक रोज़गार निर्माण करने की ज़रूरत वाला देश हैं। इसके अलावा, हमारे पास विभिन्न प्रकार के बाजार हैं – क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वैश्विक- जिसके लिए प्रक्रियाओं का मानकीकरण, उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादों और अच्छी क़ीमत की ज़रूरत होती है। 100 फ़ीसद ऑटोमेशन के बिना इस लक्ष्य को कैसे पाया जा सकता है?

विनिर्माण का एक विकेंद्रीकृत, वितरित मॉडल

विनिर्माण का एक दृष्टिकोण हब-एंड-स्पोक मॉडल है। स्पोक के लिए हम अनौपचारिक गतिविधि कर सकते हैं लेकिन हब में औपचारिकता का एक उचित स्तर बना रहा है। समुदाय, स्पोक पर यानी कि हब के 5 -10 किलोमीटर के दायरे में रहते हैं।

किसी गांव की 30 महिलाओं के समूह का उदाहरण लेते हैं जो घर से काम करती हैं और केले के रेशे से बर्तन बनाती हैं। उनके पास एक कमरा है जहां वे अपने सामान को इकट्ठा करती हैं, जोड़ती हैं और उनका भंडारण करती हैं। हर, एफ़पीओ का एक प्रतिनिधि सप्ताह भर की टोकरियां लाने गांव में जाता है और उन्हें सार्वजनिक सेवा केंद्र में लेकर आता है जहां उनकी जांच की जाती है। उसके बाद महिलाएं प्रक्रिया के अनुसार अपने हाथों से छोटा-मोटा काम करती हैं। उदाहरण के लिए, केले से बनी प्रत्येक टोकरी को सौर हीटर में 60 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में रखा जाता है। मैन्यूफ़ैक्चरिंग इकाइयों की तरह ही, इस स्तर पर (केंद्र में), आवश्यक ढांचे को स्थापित किया जा सकता है, प्रक्रियाओं को स्थापित और मानकीकृत किया जा सकता है, और उत्पाद की गुणवत्ता की जांच की जा सकती है।

स्पोक फैक्ट्री अधिनियम के दायरे से बाहर मौजूद हो सकते हैं, जो कार्यस्थलों पर व्यक्तियों के लिए सुरक्षा और दक्षता मानक निर्धारित करता है, क्योंकि वे छोटे होते हैं और वितरित होते हैं और देश में विशाल अनौपचारिक कार्यबल का लाभ उठाते हैं। हालांकि, हब को औपचारिक होना चाहिए और इसमें वे सभी नीतियां शामिल होनी चाहिए जो इसे एक औपचारिक व्यवस्था का रूप देती हैं। उदाहरण के लिए, खाद्य उत्पादों के मामले में, इसमें एफएसएसएआई अनुपालन शामिल होगा। यह मॉडल समुदायों को अनौपचारिक से औपचारिक श्रम प्रणाली की ओर बढ़ने में भी मदद करता है।

जग से मक्के के डिब्बों में पानी डालना_किसान उत्पादक संगठन
खेती के विपरीत विनिर्माण एक व्यक्तिगत स्तर पर की जाने वाली गतिविधि नहीं है। | चित्र साभार: आईएफपीआरआई / सीसी बीवाय

6सी रूपरेखा

इंडस्ट्री ने पिछले कुछ वर्षों में सफल ओएफ़पीओ का निर्माण किया है और हमारे अनुभव और अंतर्दृष्टि को 6सी फ्रेमवर्क में कैद किया जा सकता है। इस रूपरेखा को ओएफपीओ स्थापित करने के इच्छुक अन्य संगठनों द्वारा अपनाया जा सकता है।

1. निर्माण

बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण के लिए एकत्रीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। एक बार उस लक्ष्य को हासिल कर लेने के बाद आपको सेवाओं और बुनियादी ढांचों तक पहुंचने की ज़रूरत होती है। सेवा वाले हिस्से में एफ़पीओ में काम करने के लिए लोगों की नियुक्ति और परिसर और इमारत जैसी चीजें आती हैं। मूल्यवर्धन के लिए ऐसी जगहों का होना अनिवार्य है।

जहां, एक सामान्य एफपीओ में, शेयरधारक अकेले किसान होते हैं, वहीं हमने उत्पादक संस्थानों को शेयरधारकों के रूप में शामिल करने का विकल्प चुना है। उत्पादक संस्थानों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), फेडरेशन, या पारस्परिक लाभ ट्रस्ट (एमबीटी) शामिल हैं। हमने एमबीटी वाले विकल्प का चयन किया। वर्तमान में हमारे पास 35 एमबीटी हैं, और उनमें से प्रत्येक के सदस्यों की संख्या लगभग 2 सौ से 4 सौ के बीच है। हमारा अनुभव कहता है कि मूल्य वर्धन के लिए यह मॉडल अधिक कारगर है। एमबीटी में, सभी प्रक्रियाओं का हस्ताक्षरकर्ता उत्पादक को ही बनाया जाता है, इसलिए स्वामित्व का भाव उच्च होता है। इससे उत्पादकों को अपनी पहचान स्थापित करने में मदद मिलती है और भविष्य के लिए निश्चित स्थिरता मिलती है।

2. प्रणाली

मूल्यवर्धित उत्पादों पर काम करने वाले ओएफपीओ द्वारा उठाये जाने वाले कदमों में सबसे महत्वपूर्ण है कि वे संभावित बाजारों और ग्राहकों की पहचान के बारे में सोचें। इसके समानांतर, उन्हें क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों (मक्का, बांस, मोटे अनाज, घास आदि) का मूल्यांकन करने के साथ ही उन उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचाने के लिए प्रणालियों का निर्माण करना चाहिए।

हालांकि, हमेशा ही अंतिम उत्पाद का उत्पादन करना आवश्यक नहीं होता है। ओएफपीओ, बड़ी कंपनियों के लिए आपूर्तिकर्ता के रूप में भी काम कर सकते हैं। उदाहरण के लिए वृत्ति, छत्तीसगढ़ में एक एफ़पीओ के साथ काम करता है जो शरीफे के गूदे के उत्पादन के काम से जुड़ा हुआ है। इसके बाद इस गूदे को आइसक्रीम कंपनियों को बीच दिया जाता है। हालांकि, भारतीय एफ़पीओ, किसी बड़े ब्रांड के उप-आपूर्तिकर्ता बनने के इस सेमी-प्रोसेसिंग वाले रास्ते के बारे में विस्तार से जानते भी नहीं हैं और ना ही इससे संबंधित किसी तरह की खोजबीन ही की है।

3. क्षमता

मूल्य शृंखला में लोगों को प्रशिक्षित करना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे उद्यमों को संचालित करने के लिए किसानों को आवश्यक पेशेवर कौशल की ज़रूरत होती है। हब-एंड-स्पोक मॉडल में, नियमित रूप से चलने वाला प्रशिक्षण होना चाहिए, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो दूर वाले (स्पोक) के स्तर पर होते हैं। वे अलग-थलग रह कर काम नहीं कर सकते हैं और उन्हें नियमित रूप से अपने काम पर कौशल और प्रतिक्रिया की ज़रूरत होती है ताकि वे अपेक्षित मानकों को पूरा कर सकें।

केंद्र (हब) के स्तर पर, इस मॉडल को विनिर्माण की दुनिया में काम करने वाले पेशेवरों की ज़रूरत होती है – ऐसे लोग जो न्यूनतम वेतन, मानव संसाधन प्रबंधन, गुणवत्ता, प्रक्रियाएं और प्रणालियों के अलावा सभी प्रासंगिक कानून और अनुपालन जैसे मामलों की समझ रखते हैं।

एफ़पीओ उद्यम हैं और उनका प्रत्येक सदस्य एक माइक्रो-आंत्रप्रेन्योर होता है।

वर्तमान में, यह सब एफ़पीओ की दुनिया से ग़ायब है, और यहीं पर आकर कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा एक ठोस प्रयास आवश्यक हो जाता है। मंत्रालय को अपने कार्यक्रमों में उद्यमशीलता, विनिर्माण और प्रबंधन के इन पहलुओं पर विस्तार से काम करने की ज़रूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि, एफ़पीओ उद्यम हैं और प्रत्येक सदस्य सूक्ष्म-उद्यमी (माइक्रो-आंत्रप्रेन्योर) होता है।

सरकार को उद्यमशीलता के संबंध में सिद्धांत और अभ्यास, दोनों विकसित करना चाहिए। उन्हें एफपीओ उद्योग के लिए पारा-प्रोफेशनल को प्रशिक्षित करने के बारे में सोचना चाहिए जो मानव संसाधन, वित्त, गुणवत्ता, विनिर्माण, अनुपालन आदि जैसे विषयों को सम्भाल सकें। इन कार्यक्रमों का संचालन सामूहिक रूप से किया जाना ताकि पर्याप्त संख्या में पेशेवर उपलब्ध रहें।

4. क्रिएट (निर्माण)

एक दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है उत्पाद के डिज़ाइन और विकास के बारे में सूचना। बाज़ार की समझ विकसित होने और ग्राहक की मांग को समझ लेने के बाद आप क्या बनायेंगे? यह चरण किसानों की उपज के साथ उपभोक्ताओं की आकांक्षाओं को जोड़ता है। आमतौर पर, अंतिम उपभोक्ता के साथ किसानों का किसी तरह का सीधा संबंध नहीं होता है। इसलिए उत्पादों को डिज़ाइन करने वालों को इस अंतर को कम करने वाले कदम उठाने चाहिए। वे कुछ प्रश्नों को पूछ कर इस काम को कर सकते हैं: उत्पाद का डिज़ाइन कैसे किया जाना चाहिए? विधि क्या है? उदाहरण के लिए, अगर किसी क्षेत्र विशेष के स्थानीय किसान मोटे अनाज की खेती करते हैं तो उस स्थिति में उस कृषि उपज के प्रयोग से बनने वाले बाजरा बार या बाजरा अनाज जैसे उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं जिनके वितरण में भी आसानी होगी।

क्रिएट उन उत्पादों के विकास में मदद करता है जो बाज़ार की प्राथमिकता के अनुरूप हों और जिन्हें बनाना आसान हो। इस चरण में अनुसंधान एवं विकास, डिज़ाइन और उत्पाद विकास शामिल होता है। उदाहरण के लिए, हमने बुनाई में उपयोग किए जाने वाले केले की छाल का रेशम और फाइबर बनाने के लिए केले की छाल मूल्य श्रृंखला के भीतर नई प्रक्रियाएं विकसित करने के लिए अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ काम किया।

5. पूंजी

ओएफपीओ को एक विनिर्माण उद्यम की तरह चलाने के लिए उच्च स्तर के अग्रिम निवेश के साथ-साथ सस्ती कार्यशील पूंजी की भी ज़रूरत होती है। ये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ओएफपीओ को अपने ग्राहकों के लिए 60 से 90 दिन की क्रेडिट अवधि बढ़ानी होगी। ऐसा करने और नकदी प्रवाह का प्रबंधन करने में सक्षम होने के लिए, उन्हें कार्यशील पूंजी के फ़ंडिंग की ज़रूरत होती है।

16 फ़ीसद ब्याज दर पर ऋण देने वाली ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से कार्यकारी पूंजी लेना एक महंगा सौदा होता है। इसके कारण एफ़पीओ को वित्तीय रूप से सुदृढ़ होने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कृषि विपणन अवसंरचना, उद्यम पूंजी सहायता और बागवानी के एकीकृत विकास मिशन जैसी सरकारी योजनाएं एफपीओ की स्थापना के लिए आवश्यक पूंजी का केवल 40-60 फ़ीसद हिस्सा ही देती हैं। शेष राशि दानदाताओं और सीएसआर से मिलने वाले अनुदानों से जुटानी पड़ती है।

अनिवार्य रूप से हमें, मिश्रित वित्त – सरकार, बाजार और परोपकारी पूंजी का मिश्रण – पर ध्यान देने की जरूरत होती है क्योंकि पहले तीन वर्षों के दौरान, अकेले सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले पैसे से गुजारा करना मुश्किल होता है।

इस अवधि के बाद, कंपनी को आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में बढ़ना चाहिए, ताकि एफ़पीओ को अपने बूते चलाये रखने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो।

पूंजी की व्यवस्था करने की प्रक्रिया में अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए और संरचित बोर्ड भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आमतौर पर एफ़पीओ अपनी शुरुआत उप-आपूर्तिकर्ताओं के रूप में करते हैं। इसलिए, समुदाय के कुछ लोगों के अलावा, उनके बोर्ड में कम से कम उनके दो ग्राहक होने चाहिए। सरकार, निजी क्षेत्र और समुदाय के सदस्यों का मिश्रण ओएफपीओ को विकास और लाभप्रदता बढ़ाने में मदद कर सकता है।

6. कनेक्ट/संपर्क

6सी ढांचे के अंतिम तत्व में उत्पादकों को एक बड़े पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ने और ट्रेसबिलिटी और पारदर्शिता के साथ अवसरों को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना शामिल है, जो विनिर्माण के मामले में महत्वपूर्ण हैं। ओएफपीओ के लिए ट्रैसेबिलिटी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्राहकों के बीच एक प्रमुख विक्रय बिंदु है।

इंडस्ट्री एक सहयोगी डिजिटल सोशल प्लेटफॉर्म का निर्माण कर रही है जिसे प्लेटफॉर्म फॉर इनक्लूसिव एंटरप्रेन्योरशिप (पीआईई) कहा जाता है। इसका उद्देश्य नॉलेज असेट्स (सामग्री, प्रक्रियाएं, उपकरण, समाधान) और डेटा एनालिटिक्स को नवाचार और प्रतिक्रिया देने के लिए एक सामूहिक स्थान प्रदान करना है), जिससे प्रत्येक हितधारक को सक्षम बनाया जा सके ताकि वे एकीकृत रूप से अपनी शक्ति का उपयोग कर सकें।

इंडस्ट्री में, ग्रीनक्राफ़्ट 6सी का एक ऐसा उदाहरण है जिसे व्यवहार में लाया जा रहा है। 10 हज़ार सदस्यों वाले एक एफ़पीओ, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, कंपनी रीसायकल हुए केले के छाल, साल के पत्तों से बनने वाले प्लेट और बांस के उत्पादों से टोकरियां बनाती है। ये सभी उत्पाद हाथ से बनाए जाते हैं। 2012 में अपनी स्थापना के बाद से, कंपनी ने बिक्री के क्षेत्र में 50 लाख अमेरिकी डॉलर की कमाई की है और इसके ग्राहकों में एच&एम, टीजे मैक्स और आइकिया जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

भारत में ओएफ़पीओ का परिदृश्य, संभावनाओं और चुनौतियों दोनों को दिखाता है। बड़े पैमाने पर ओएफ़पीओ को प्रभावी ढंग से बनाने के लिए, हमें एक विनिर्माण मानसिकता अपनाने की जरूरत है जो विभिन्न संदर्भों में एक समग्र ढांचे को शामिल करती है।

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चित्र साभार: मीत ककाड़िया

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अच्छे लड़के और बेहतर मर्द बनाने की ज़िम्मेदारी आप कैसे निभा सकते हैं?

सामाजिक विकास के क्षेत्र में लैंगिक बराबरी से जुड़े मुद्दों पर होने वाले काम में पारम्परिक रूप से महिलाओं और लड़कियों को ही शामिल किया जाता रहा है। नब्बे के दशक के मध्य तक आने के बाद ही कुछ चुनिंदा गैर-सरकारी संगठनों ने लैंगिक मुद्दों को लेकर लड़कों और पुरुषों के साथ काम करना शुरू किया। इसके शुरूआती बिंदुओं में से एक था जनसंख्या नियंत्रण और प्रजनन स्वास्थ्य, जिसके अंतर्गत लड़कों और पुरुषों को कॉन्डोम का इस्तेमाल करने और अपनी गर्भवती पत्नियों के साथ स्वास्थ्य केंद्रों तक जाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इसका उद्देश्य पुरुषों को लैंगिक संवेदीकरण कार्यशालाओं के माध्यम से महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य में शामिल करना था। जल्दी ही इसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा, खासकर पत्नियों के साथ मारपीट के रूप में होने वाली हिंसा को रोकने का भी हो गया। साल 2000 के अंत तक आते-आते ‘मेन एंगेज’ जैसे कई वैश्विक मंच दक्षिण एशिया में सक्रिय हो गए और इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर ‘फोरम टु एंगेज मेन (एफईएम)’ का भी उदय हुआ। यह बहुत हाल की ही बात है जब लड़कों और पुरुषों के साथ जेंडर पर होने वाले काम में ‘मर्दानगी’ की ओर गौर करना शुरू किया गया है। हिंसा को लिंग आधारित हिंसा से परे हटकर एक अधिक व्यापक नज़रिए से देखने की कोशिश हुई है।

नारीवादी प्रयासों में मर्दों की क्या भूमिका है? यह वह प्रश्न है जिसे विकास के क्षेत्र में काम कर रहे कुछ शिक्षक स्वयं से पूछते आ रहे हैं और इसका जवाब तलाशने की कोशिश में हैं। बहुत लम्बे समय तक पुरुषों को एक विशुद्ध चुनौती की श्रेणी में रखा गया जिन्हें शराब पीने, जुआ खेलने, पत्नी को पीटने, और बच्चों पर चिल्लाने से रोका जाना चाहिए।

नब्बे के दशक के मध्य में एक नया नज़रिया उभरा जिसमें विकास क्षेत्र ने महिलाओं के साथ काम को आसान और अधिक स्थाई बनाने के लक्ष्य को पाने के लिए पुरुषों को भी हितधारक मानना शुरू किया। हमने उन प्रशिक्षकों से कुछ सवाल पूछे जो कि लड़कों के साथ और/अथवा मर्दानगी पर काम कर रहे थे: उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? वे अपने ज़मीनी अनुभवों से मर्दानगी के बारे में क्या सीख रहे हैं? पुरुषों और मर्दानगी पर काम करने के लिए नारीवादी शिक्षण पद्धती (पेडागॉजी) कैसे खुद में फेर-बदल करती है? जैसे कि जब आप लड़कों से भरे हुए किसी कमरे में घुसते हैं तो लिंग या यौनिकता या मर्दानगी के बारे में उन्हें सिखाने का जो लक्ष्य आप सोचकर जाते हैं उसकी जगह आप खुद और उन्हें क्या सिखाने में सफल हो पाते हैं?

हमने 11 लोगों से बात की, जिनमें फैसिलिटेटर, प्रशिक्षक, फिल्म निर्माता, अकादमिक आदि शामिल थे, ताकि हम उन विभिन्न तरीकों की शिनाख्त कर पाएं जिनके द्वारा पुरुष एक नई दुनिया में; जहां महिलाएं बदल चुकी हैं, खुद को देखते और महसूस करते हैं। इससे एक बात उजागर हुई कि लैंगिक विषयों पर काम करना कितना गड़बड़ या ऐसा जिसमें सारे पहलू मिल-जुले हों, से भरा हो सकता है, और तब जब जिस लिंग को लेकर आप काम कर रहे हैं वो स्वयं ताकतवर हो।

सत्ता को क्यों छोड़ा जाए?

वाईपी फाउंडेशन के पूर्व डायरेक्टर मानक मटियानी ने इस सवाल के साथ वाईपी के समक्ष मर्दानगी के एजेंडे को रखा कि, ‘मर्दों को बिना अलगाव में डाले जेंडर के कार्यक्रम कैसे उनसे जुड़ी बात करें…’ अपनी आंखों में एक चौंध लिए वे जोड़ते हैं, ‘और इस बात के प्रति भी सचेत रहते हुए कि उनके विशेषाधिकार और मज़बूत न हो जाएं?’

यही तो पहला संकट है, क्योंकि युवा महिलाओं के साथ की जानेवाली कार्यशालाएं, सकारात्मक रूप से अपने बारे में बात करने और सशक्तीकरण जैसे पहलुओं पर केंद्रित हैं, उससे ठीक इतर युवा लड़कों के साथ किए जाने वाले सत्र उन्हें सज़ा देने जैसे लगते हैं। जैसा कि मानक कहते हैं, ‘ये सकारात्मक अनुभवों के ठीक उलट हैं’ जिनमें काफी हद तक लगता है कि लड़कों को कैद में रखा गया है और अब उन्हें बताया जाएगा कि उन्होंने क्या गलत किया है। ऐसे में लड़के इस तरह के सत्रों/ मंचों का हिस्सा बनेगें ही क्यों?

‘लाख टके का सवाल यह है कि इससे (जेंडर के बारे में सीखने से) मुझे बदले में क्या मिलेगा, क्योंकि एक चीज़ जिससे हम सभी जूझते हैं कि पुरुषों को अपने विशेषाधिकार छोड़ने होंगे। अगर मैं अपने सभी विशेषाधिकार छोड़ दूं, जिनका फायदा मैं वर्षों से उठाता आ रहा हूं, तो मुझे बदले में क्या मिलेगा? वे कौन से व्यक्तिगत लाभ होंगे जो मुझे मिलेंगे?’ मुम्बई स्थित मेन अगेंस्ट वायलेंस एंड एब्यूज़ (मावा) के सचिव और मुख्य कर्ताधर्ता हरीश सदानी कहते हैं।

सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस (सीएचएसजे) के प्रबंध संरक्षक अभिजीत दास, जिन्हें मर्दानगी के क्षेत्र में बीते तीन दशकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के ज़रिए हुए हस्तक्षेपों का अनुभव है, तर्क देते हैं कि मर्दानगी की पैरवी करने वालों के लिए  ‘लैंगिक समानता’ इकलौता लक्ष्य नहीं हो सकता। पहला, वे इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि अधिकांश बार महिलाओं के साथ किये जाने वाले कार्यक्रमों में अक्सर सिर्फ उनके हाशियाकरण या उनकी उपेक्षा पर ध्यान दिया जाता है, इसके मुकाबले पुरुषों के साथ काम करने के दौरान हमेशा यह समझा जाता है कि वे अपने विशेषाधिकारों के साथ आएंगे। मर्दानगी पर विकास क्षेत्र के द्वारा किए जाने वाले काम विशुद्ध रूप से गरीबी-आधारित कार्यक्रम मालूम पड़ते हैं जो कि ग्रामीण इलाके और/अथवा वंचित जाति/वर्ग से आने वाले पुरुषों से जुड़ा है। ऐसे में इन पुरुषों के पास जेंडर संबंधी विशेषाधिकार तो हैं लेकिन दूसरी ओर ये रोज़ाना जाति और/अथवा वर्ग के कारण दमन का शिकार होते हैं (वैसे, यह स्थिति तब अलग होती जब विकास क्षेत्र के यह कार्यक्रम सवर्ण, उच्च-वर्गीय सिस-विषमलैंगिक पुरुषों के साथ चल रहे होते हैं, हालांकि तब इसकी अपनी चुनौतियां होती हैं)। इस तरह से विशेषाधिकार के साथ हमेशा अधीनता की भावना मौजूद रहती है। वे कहते हैं कि, ‘महज़ मर्दानगी ही नहीं बल्कि किसी भी तरह की समानता पर किए जा रहे काम के दौरान आपको विशेषाधिकार को समझना ज़रूरी है क्योंकि समानता किसी भी अधीन समूह का इकलौता हित नहीं हो सकती। ऐतिहासिक रूप से भी अधीन सामाजिक समूहों ने ही समानता की मांग की है। लेकिन जब समानता महज़ अधीन समूह की ही सामाजिक आकांक्षा होगी तो फिर असल में समानता कहां है?’

पर, जब लड़कों से विशुद्ध रूप से यह उम्मीद की जाएगी कि वे सत्ता छोड़ दें, तो…

लड़के इस प्रक्रिया में शामिल ही क्यों होंगें?

जैसा कि मानक कहते हैं कि, ‘पितृसत्तात्मक मर्दानगी के हिसाब से काम करने के एवज़ में एक तरह से असली फायदे मिलते हैं… मैं कैसे जाकर लड़कों से यह कहूं कि भाई अपने को इस तरह के दबाव में मत रखो (और जो फायदे मिल रहे हैं उसे लेने से बचो)?’ जेंडर लैब के सह-संस्थापक अक्षत सिंघल कहते हैं कि, ‘बतौर मर्द हमारे लिए यह बहुत आसान और आरामदेह है कि वर्तमान में मौजूद ढांचों के साथ जुड़े रहें। यह हमारे लिए बेहद आसान है कि बगैर सवाल पूछे चुपचाप सब करते रहें क्योंकि इससे कोई समस्या नहीं आएगी। क्योंकि ज्यों ही मैं लड़कों के सामने उनकी ताकत और विशेषाधिकार पर सवाल उठाउंगा तब उन्हें खुद पर काम करना पड़ेगा और उसकी अलग कीमत होगी। खुद पर काम करना इतना आसान नहीं होता। उन्हें एक स्तर पर आने के बाद वह सब कुछ छोड़ना पड़ेगा जो उन्हें विरासत में मिल रहा था।’

लेकिन क्या वर्तमान में मौजूद ढांचा लड़कों और मर्दों के लिए सुचारु रूप से काम कर रहा है? हरीश अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि, ‘मैं उस वक्त अकेला और तनावग्रस्त रहा करता था’ क्योंकि मुझे ‘नाज़ुक और लड़कियों के जैसा’ होने की वजह से छेड़ा जाता और ताने मारे जाते थे। नियम कायदों से हटकर जीने वाले मर्दों (सिस-विषम हों या नहीं) का अपना अकेलापन है और अति-मर्दवादी पुरुषों का अपना अकेलापन है जिसकी वजह से वे कभी सार्थक रिश्ते नहीं बना पाते हैं। जहां एक ओर नारीवादी पैरवी महिलाओं को सामूहिकता, दोस्ती, और एकजुटता का भाव मुहैया कराती है वहीं, दूसरी ओर इस देश के युवा मर्दों को यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अकेलापन ही दे पाती है। यह बात न सिर्फ़ हमें साक्षात्कार देने वाले प्रशिक्षकों के अनुसार सही है, बल्कि युवा संस्था द्वारा 50 भारतीय शहरों के लगभग 100 कॉलेजों में किए गए सर्वेक्षण से भी यही बात सामने निकलकर आती है। (यह अध्ययन 2022 में मुम्बई स्थित रोहिणी निलेकनी, लोकोपकार – फिलैन्थ्रपिस की संस्था द्वारा आयोजित ‘बिल्ड टुगेदर: जेंडर एंड मैस्क्युलिनिटीज़ सम्मेलन’ में युवा द्वारा प्रस्तुत किया गया था।)

युवा संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और संस्थापक निखिल तनेजा कहते हैं कि, ‘ऐसा क्यों है कि अधिकतर लड़कों द्वारा लड़कियों के प्रति दर्शाया जाने वाला इकलौता भाव प्रेम ही है? क्योंकि यही वह भाव है जिसे दर्शाने की उन्हें अनुमति है। वे हमेशा प्रेम और दिल टूटने की ही बात करते हैं क्योंकि उदासी जताने का यही एकमात्र रास्ता उन्हें दिखाई पड़ता है।’ दिल टूटना एक आम बहाना है जिसके ज़रिये मर्द संगठित हो सकते हैं।

ऑस्ट्रेलियाई समाजशास्त्री आरडब्ल्यू कॉनेल के मर्दवाद के सिद्धांत से प्रभावित होकर मानक, इस काम के सैद्धांतिक आधार की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि, ‘मर्दानगी को आमतौर पर सत्ता तक पहुंच या सत्ता की धुरी समझा जाता है जबकि असल में वह सत्ता की अपेक्षा है। आपसे यह अपेक्षा की जाती है कि आप हमेशा ताकतवर रहें जबकि मर्दानगी का अनुभव बताता है कि असल में ऐसा है नहीं!’

मर्दों के सत्ता के उनके अनुभव और सत्ता की अपेक्षाओं में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। मर्दों के विभिन्न समूह इस फ़र्क को अलग-अलग तरीके से अनुभव करते हैं जो कि इस बात से तय होता है कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की सीढ़ी में उनका स्थान कहां है और यही वह वजह है जिससे भिन्न-भिन्न किस्म की मर्दानगियों का उदय होता है। यानी मर्दानगी का संकट शायद तब सामने आता है जब पितृसत्ता सता के अपने वादे से मुकर जाती है।

प्रशिक्षक, जेंडर और मर्दानगी पर बातचीत की कई भिन्न-भिन्न तरीकों से शुरुआत करते हैं, जैसे- यौनिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य, यौनिकता, रोमांस, और कई मामलों में मर्दानगी के प्रचलित विचार से ही। मानक, के एक सत्र में बातचीत इस सवाल से शुरू होती है कि ‘आप कूल होने से क्या समझते हैं और क्या आप खुद को एक कूल इंसान मानते हैं?’ बिना जेंडर और मर्दानगी का ज़िक्र किए यह सवाल मर्दानगी के प्रति असुरक्षाओं की ओर स्वतः ही ध्यान ले जाता है। मानक इसे ‘आत्म-छवि की खोज’ का नाम देते हैं- जिसमें बाहर की ओर देखने से पहले खुद के अंदर झांकने से शुरुआत होती है।

‘मर्दों वाली बात’ नामक अपने कार्यक्रम पर आई प्रतिक्रिया के बारे में वे बताते हैं कि, ‘जो पहला पोस्टर हमने एक कॉलेज में लगाया उसपर सुपरमैन की फोटो के साथ ‘मर्दानगी क्या होती है’ लिखकर एक प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया और उस कार्यक्रम में ऐसे बहुत सारे लड़के आए क्योंकि उन्हें इस सवाल का जवाब चाहिए था! उनका मानना था कि  हां, हम जानना चाहते हैं कि मर्दानगी क्या होती है ताकि हम इसे ढंग से निभा पाएं।’

शिक्षा और मनोरंजन दोनों ही क्षेत्रों में काम करने का अनुभव लिए हुए निखिल यह बात जानते हैं कि हास्य एक ऐसा माध्यम है जिससे लोगों को निहत्था करने में आसानी होती है। ‘मैं एक कहानी से बात शुरू करता हूं और उन्हें बातचीत में शामिल करता हूं ताकि वे यह न समझें कि, यह इंसान सिर्फ़ हमें उपदेश देने, पकाने और यहां तक कि चुनौती देने के लिए आया है।’ जितनी जल्दी वे बातचीत में शामिल हो जाते हैं तब वह अपनी एक सधी हुई असुरक्षा उनके सामने रखते हैं, जैसे कि पैनिक अटैक की कोई घटना। निखिल के अनुसार, अगर आप चाहते हैं कि लड़के आपसे खुलें तो आपको उन्हें इतना सम्मान देना होगा ताकि वो आपके सामने अपनी असुरक्षा को ज़ाहिर कर सकें। ‘मेरा विश्वास है कि कहानियां हमें सिर्फ़ कहानियों की ओर ले जाती हैं और असुरक्षा हमें असुरक्षा की ओर।’

साल 2021 में डॉ केतकी चौखानी ने मुम्बई में मध्य-वर्गीय और उच्च-वर्गीय विषमलैंगिक लड़कों के साथ एक शोध अध्ययन किया जिसमें उनसे उनकी किशोरावस्था के रोमांस के अनुभवों के बारे में पूछा गया और यह भी पूछा गया कि इसके बारे में उनकी जानकारी के स्रोत क्या हैं। उनके अध्ययन में एक बात उभर कर आई कि अनिश्चितता, यानी परिभाषा की अनुपलब्धता, और रोमांस में ‘विफलता’ किशोरों के लिए बेहद आम अनुभव हैं और यह घटनाएं बहुत कम ही हिंसा का रूप ले पाती हैं, चाहे रिश्ता कितना ही संजीदा क्यों न रहा हो।

‘इससे हिंसक मर्द का समूचा विचार ही पूरी तरह से बदल गया। मैंने यह महसूस किया कि उनके भीतर ढेर सारा डर और ढेर सारा ख्याल रखने का भाव मौजूद था। हमारा शुरुआती बिंदु आमतौर पर हिंसा होता है लेकिन क्या हो अगर हम यह बिंदु असुरक्षा रखें? अगर हम अनिश्चितता, विफलता, असुरक्षा, और झिझक को हिंसा से बदल दें तो लैंगिक संबंधों का क्या होगा?’ इस शोध के दौरान डॉ केतकी ने यह भी अनुभव किया कि शोध की जगह, धीरे-धीरे ‘थेरेपी’ का रूप ले रही थी। ‘उन्हें लगता था कि मैं एक मनोवैज्ञानिक हूं और वे इस पूरी प्रक्रिया को ‘थेरेपी की प्रक्रिया’ की ही तरह देखते थे।’ इस प्रक्रिया ने उन्हें अपनी किशोरावस्था के दौरान मिली रोमांटिक विफलताओं और अस्वीकार होने के बारे में बोलने में मदद की, जिन्हें अक्सर मर्दानगी की प्रचलित छवियों और समझदारी के अंतर्गत नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

और इस तरह प्रशिक्षकों ने पहले आए संकट का जवाब दिया। इस तरह से उन्हें लड़कों को बातचीत के स्तर पर लाने में मदद मिली। उन्होंने लड़कों को इस बात के प्रति आश्वस्त भी किया कि लड़कों की कहानियां उसी तरह सुनी जाएंगी जैसे एक पैडगॉजी वाली जगहों पर सुनी जानी चाहिए और किसी भी तरह से उन्हें पूर्वाग्रह से नहीं देखा जाएगा। लेकिन इससे एक अन्य गहरा संकट उभर कर सामने आया।

(लेख में दी गई महत्त्वपूर्ण जानकारी के लिए निरंतर ट्रस्ट के लर्निंग रिसोर्स सेंटर का आभार)

इस लेख का हिंदी अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है।

यह आलेख मूलरूप से दथर्डआई पर प्रकाशित हुआ है जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

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आकांक्षी जिलों को सीएसआर फंड का एक सीमित हिस्सा ही मिलता है

जनवरी 2018 में, भारत सरकार ने ‘आकांक्षी जिला परिवर्तन’ नाम से एक पहल की शुरुआत की। न्यू इंडिया बाय 2022 के दृष्टिकोण के साथ, इसके केंद्र में मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के तहत भारत की रैंकिंग में सुधार करना, अपने नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना और सभी के लिए समावेशी विकास सुनिश्चित करना था। आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत हमारे देश के सात सौ से अधिक जिलों में सबसे कम विकसित जिलों की पहचान की गई।
यह कार्यक्रम हमारे विकास पिरामिड के निचले स्तर पर स्थित इन 115 जिलों की प्रगति में तेजी लाने के लिए विशेष ध्यान देने के साथ आवश्यक सहायता भी प्रदान करता है।

नोट: पश्चिम बंगाल के जिलों ने इस कार्यक्रम में भाग ना लेने का फैसला किया है। वर्तमान में, केवल 112 जिले ही एडीपी के हिस्सा हैं। हालांकि, हमारे विश्लेषण में हम उन सभी 115 जिलों में होने वाले सीएसआर फंड के खर्च को शामिल करते हैं जिनकी पहचान साल 2018 में एडीपी के लॉन्च के समय की गई थी।

आकांक्षी जिलों का परिवर्तन_सीएसआर

नीति आयोग ने स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, कृषि और जल संसाधन, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास और बुनियादी ढांचे के समग्र संकेतकों के आधार पर 28 राज्यों में 115 जिलों की पहचान की, जिनका एचडीआई पर प्रभाव पड़ता है। एडीपी के लागू होने के पांच सालों में, समग्र कंपोज़िट स्कोर में 72 फीसद से अधिक का सुधार देखा गया है। सबसे अधिक बदलाव शिक्षा, कृषि एवं जल संसाधन तथा स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में हुआ है।

5 वर्षों में औसत स्कोर परिवर्तन_सीएसआर

एडीपी की व्यापक रूपरेखा झुकाव (केंद्रीय एवं राज्य योजनाओं का), सहयोग (केंद्र, राज्य स्तर के अधिकारियों एवं जिला कलेक्टरों का) और जन आंदोलन की भावना से प्रेरित जिलों के बीच प्रतिस्पर्धा है। एडीपी में जिलों को पहले अपने राज्य (सीमांत जिलों) के भीतर सर्वश्रेष्ठ जिलों में से एक बनने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाता है। इसके बाद, उनमें प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद की भावना में दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करके और उनसे सीखकर देश में सर्वश्रेष्ठ में से एक बनने की इच्छा पैदा की जाती है। अगस्त 2023 तक, उत्तर-पूर्वी राज्यों में आकांक्षी जिलों (एडी) और बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों में बड़ी संख्या में एडी का समग्र समग्र स्कोर 50 या इससे कम था। वे अब सीमांत जिलों के साथ दूरी कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इन राज्यों में एडी की हिस्सेदारी भी अधिक है।

सीमा से राज्यवार दूरी_सीएसआर

सरकार द्वारा एडी में सीएसआर निवेश की हिमायत करने के बावजूद, 2014-22 के दौरान कुल सीएसआर का केवल 2.15%* इन जिलों में निवेश किया गया है, जहां भारत की 15 फ़ीसद से अधिक आबादी रहती है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में, एडी ज़िलों में किए गये सीएसआर खर्च में पिछले वर्ष कि तुलना में 50 फीसद से अधिक की वृद्धि देखी गई।

आकांक्षी जिलों में सीएसआर खर्च_सीएसआर

कुल सीएसआर फंड का आधे से अधिक हिस्सा (53%) इन पांच राज्यों – मध्य प्रदेश (448 करोड़), आंध्र प्रदेश (387 करोड़), झारखंड (328 करोड़), छत्तीसगढ़ (301 करोड़) और गुजरात (291 करोड़) में एडी पर खर्च किया जाता है।

आकांक्षी जिलों में सीएसआर खर्च_सीएसआर

साथ ही, एडी में खर्च हुए कुल सीएसआर फंड का तीन चौथाई हिस्सा (78%) इन चार टॉप सेक्टर्स (शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, और पर्यावरण स्थिरता) में किया गया है। कोविड-19 वाले वर्षों के दौरान, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाला सीएसआर खर्च 70 फ़ीसद से अधिक था। 2020-21 और 2021-22 के बीच पर्यावरण स्थिरता परियोजनाओं में सीएसआर खर्च में पांच गुना वृद्धि देखी गई।

शीर्ष प्राप्तियां क्षेत्र_सीएसआर

जनवरी 2023 में, एडीपी के शुरुआत के पांच साल बाद, भारत सरकार ने ‘आकांक्षी प्रखंड कार्यक्रम (एबीपी)’ की शुरुआत की। यह कार्यक्रम, भारत के सबसे कठिन और अविकसित प्रखण्डों (ब्लॉक) में नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने पर केंद्रित है। भारत के 27 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों के 500 ब्लॉक की पहचान स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, कृषि और संबद्ध सेवाओं, पेयजल और स्वच्छता, वित्तीय समावेशन, मूलभूत सुविधाओं, और समग्र सामाजिक विकास जैसे प्रमुख क्षेत्रों के तहत वर्गीकृत प्रमुख सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की निगरानी करके आकांक्षी ब्लॉकों में बदलाव लाने के लिए की गई थी। एबीपी की शुरुआत के साथ, भारत में 45 फ़ीसद से अधिक जिले (~350 जिले) अब या तो एडीपी और/या एबीपी के जिले का हिस्सा हैं।

एडीपी और एबीपी के तहत कवर किया गया जिला_सीएसआर

पिछले पांच वर्षों में 115 एडी जिलों में विभिन्न विषयगत क्षेत्रों में किस प्रकार के परिवर्तन हुए हैं? किन जिलों में सभी विषयगत क्षेत्रों में लगातार सुधार देखे जा रहे हैं? उन्हें कितनी मात्रा में सीएसआर फंडिग प्राप्त हुई? इन एडी ज़िलों में किन कंपनियों का निवेश है? हम अपने पिरामिड के निचले स्तर पर निवेश को कैसे मजबूत करें और इन जिलों को उनके परिवर्तन लक्ष्यों तक पहुंचने में कैसे मदद करें? क्या कुल सीएसआर निवेश का 2 फ़ीसद आवंटन आकांक्षी जिलों के परिवर्तन को सुविधाजनक बनाने के लिए पर्याप्त है?

एडीपी और एबीपी तथा एडी एवं एबीपी के जिलों में खर्च होने वाले सीएसआर के बारे में विस्तार से जानने के लिए एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स पर हमारे डाटा संपत्ति पर एक नज़र डालें।

*एमसीए सीएसआर पोर्टल पर उपलब्ध जिलों के प्रत्यक्ष श्रेय के अनुसार – सीएसआर का एक बड़ा हिस्सा किसी विशेष जिले को आवंटित नहीं किया जाता है।

यह लेख मूल रूप से इंडिया डेटा इनसाइट्स पर प्रकाशित हुआ था।

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