October 11, 2023

भारत में मातृत्व लाभ: पीएमएमवीवाई के अधूरे वादे

प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना में गर्भवती महिलाओं के लिए अपर्याप्त प्रावधान भारत में मातृत्व लाभ की चिंताजनक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।
4 मिनट लंबा लेख

दस साल पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को प्रसूति (मातृत्व) लाभ का अधिकार दिया गया था। भले ही इसकी शुरुआत प्रति बच्चा मात्र 6,000 रुपये से हुई थी, लेकिन यह अधिनियम का सबसे क्रांतिकारी प्रावधान था। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि किसी भी गर्भवती महिला को गर्भावस्था और बच्चे के जन्म से जुड़ी आकस्मिक स्थितियों का सामना करने के लिए किसी ना किसी प्रकार के सामाजिक सहयोग की आवश्यकता हो सकती है। बहुत कम विकासशील देशों ने प्रसूति (मातृत्व) अधिकार के प्रति इस तरह के प्रगतिशील दृष्टिकोण को अपनाया है।

यदि इस अधिनियम को लागू किया गया होता और जीडीपी में हो रही वृद्धि के साथ इसके भी लाभ को बढ़ाया गया होता तो, भारतीय महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान लगभग 20,000 रुपये नक़द का लाभ मिलता, जैसा कि तमिलनाडु की गर्भवती महिलाओं को मिलता है। इससे उन्हें यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती कि इस कठिन समय में वे पर्याप्त पोषण, आराम और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहें।

इसकी बजाय, केंद्र सरकार ने इस अधिनियम के तहत मिले अपने दायित्वों से बचने का हर संभव प्रयास किया है। पूरे चार वर्षों तक (2013 से 2017), इस अधिनियम से जुड़ा एक भी कदम नहीं उठाया गया। आखिरकार 2017 में, प्रसूति (मातृत्व) लाभ के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) नाम से एक राष्ट्रीय योजना की शुरुआत की गई। हालांकि इस योजना के तहत, ‘पहले जीवित बच्चे’ के लिए मात्र 5,000 रुपये की धनराशि की सीमा रखी गई है जो तीन किश्तों में दिया जाता है। साल 2020 के शुरुआती दिनों में, कोविड- 19 के आने तक यह सीमित राशि भी दूर की कौड़ी थी।

इस दौरान, लाखों महिलाओं के लिए गर्भावस्था और प्रसव एक कष्टदायक अनुभव ही रहा है। साल 2019 में किए गए जच्चा-बच्चा सर्वे में उत्तर भारत के छह राज्यों में 700 ग्रामीण महिलाओं के साथ सर्वे किया गया। इस सर्वे में गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के अभाव और असुरक्षा के खतरनाक स्तर पर होने की बात सामने आई है। पिछले छह महीनों में बच्चे को जन्म देने वाली 364 महिलाओं में से एक चौथाई से भी कम महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान सामान्य से अधिक बार पौष्टिक भोजन मिला था। साथ ही, लगभग 40% महिलाओं ने उन दिनों में आराम की कमी की शिकायत की थी। गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ना अनुशंसित मानदंड से काफ़ी कम, मात्र औसतन 7 किलोग्राम था। यह स्थिति तब और भी अधिक चिंताजनक हो जाती है जब कई सारी महिलाएं शुरु से ही गंभीर रूप से कुपोषण की शिकार होती हैं। (देखें:  20 नवम्बर, 2021 की इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में ज्यां द्रेज, रीतिका खेड़ा और अनमोल सोमांची द्वारा लिखा लेख “प्रसूति (मातृत्व) अधिकार: महिलाओं के अधिकार पथभ्रमित हो गये हैं।”)

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

वर्तमान में पीएमएमवीवाई का प्रदर्शन कैसा है? इसके बारे में बता पाना आसान नहीं है क्योंकि पीएमएमवीवाई के पास किसी भी तरह का सार्वजनिक पोर्टल नहीं है जहां से जानकारियां इकट्ठा की जा सकें। इस संबंध में, यह भारत के सामाजिक कार्यक्रमों से अलग दिखता है, और सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के सक्रिय प्रकटीकरण मानदंडों का उल्लंघन करता है। हमें पीएमएमवीवाई के विकास से जुड़े सबसे मूल आंकड़ों के लिए भी आरटीआई के प्रश्नों का सहारा लेना पड़ा। जनवरी 2023 में (प्रश्नों को जमा किए जाने के चार महीने बाद), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने अपनी सबसे नई प्रतिक्रिया में पीएमएमवीवाई के पिछले कुछ वर्षों के प्राप्तकर्ताओं की राज्य-वार और वर्ष-वार सूची को शामिल किया है।

इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2019 के अंत तक पीएमएमवीवाई के तहत जो भी सीमित प्रगति हुई थी, वह कोविड-19 संकट के दौरान काफी हद तक कोविड-19 [से] पहले की स्थिति में पहुंच गई थी। 2019-20 में 96  लाख महिलाओं को पीएमएमवीवाई के तहत मिलने वाले कुछ लाभ प्राप्त हुए थे, लेकिन इनकी संख्या 2020-21 में 75 लाख और 2021-22 में 61 लाख पर पहुंच गई – [यानी] दो वर्षों में लगभग 40% की गिरावट।

इसे परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, प्रति हजार 19.5 की जन्म दर (2020 के लिए सैंपल पंजीकरण प्रणाली अनुमान) और कुल जनसंख्या को 140 करोड़ मानने की स्थिति में, आज भारत में जन्म लेने वालों की वार्षिक संख्या लगभग 270 लाख होनी चाहिए। इनमें से बमुश्किल 23% जन्म 2021-22 में पीएमएमवीवाई के तहत कवर किए गए थे (चार्ट देखें)। यदि हम आशावादी होकर मान भी लेते हैं कि औपचारिक सेक्टर में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या का अन्य 10% हिस्सा भी प्रसूति (मातृत्व) लाभ योजनाओं में शामिल है, फिर भी यह कुल जन्म के एक तिहाई से भी कम ही होगा।

प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना के अनुमानित कवरेज को मापने वाला एक ग्राफ_ प्रधान मंत्री मातृत्व वंदना योजना
स्रोत: दी इंडिया फोरम

पीएमएमवीवाई के ये आंकड़े उन माताओं की संख्या को दर्शाते हैं जिन्हें तीन में से कम से कम एक किस्त मिली है। यदि हम अपना दायरा बढ़ाते हैं और तीनों किस्त मिलने वाली महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं तब, इसके तहत आने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है। 2021-22 में, पीएमएमवीवाई की तीसरी किस्त प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या केवल 35 लाख थी – जो वार्षिक जन्म-दर का लगभग 13% है। तालिका- 1 में राज्य-वार आंकड़े दर्शाये गये हैं। 2019-20 और 2021-22 के बीच, केरल और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के सभी प्रमुख राज्यों में पीएमएमवीवाई कवरेज में गिरावट आई। पश्चिम बंगाल की स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह योजना ठप पड़ चुकी है। ऐसा शायद ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की तरह ही इस योजना का भी केंद्र-राज्य विवाद का शिकार हो जाने के कारण है? 2021-22 तक पीएमएमवीवाई अन्य कई अन्य राज्यों में भी लगभग ठप हो गई, जिसमें गुजरात जैसे कुछ “डबल इंजन” सरकार वाले राज्य भी शामिल थे। अधिकांश राज्यों में अधिकांश महिलाओं को तीसरी किस्त नहीं मिल पाई है।

भारत और प्रमुख राज्यों में पीएमएमवीवाई लाभ प्राप्त करने वाले सभी जन्मों के अनुमानित अनुपात को दर्शाने वाली एक तालिका_ प्रधान मंत्री मातृत्व वंदना योजना

हम अपने लक्ष्य को बदल कर अपना ध्यान पहले (बच्चे के) जन्म पर केंद्रित कर सकते हैं, जो पीएमएमवीवाई का आधिकारिक लक्ष्य है। जब प्रजनन दर प्रति महिला दो बच्चा है, और ज्यादातर महिलाएं कम से कम एक बच्चे को जन्म देती हैं, जैसा कि आज भारत की स्थिति है, उस स्थिति में पहले बच्चे का जन्म ही सभी बच्चों के जन्म का आधा हिस्सा होता है। इसलिए यदि हम सूचकांक में सभी बच्चों के जन्म के बदले पहले बच्चे का जन्म रखते हैं तो उस स्थिति में लाभ प्राप्तकर्ता का आंकड़ा लगभग दोगुना हो जाएगा (चार्ट देखें)। हालांकि, इस स्थिति में भी यह बहुत कम है और 2021-22 में ‘कम से कम एक किस्त प्राप्त महिलाओं’ की संख्या मात्र 46% और तीसरी किस्त प्राप्त महिलाओं की संख्या 26% ही है।

इस बात की कोई संभावना नहीं दिखाई पड़ती है कि 2022-23 में पीएमएमवीवाई कवरेज में तेज विस्तार होगा। दरअसल, सामर्थ्य पैकेज (जिसका पीएमएमवीवाई मुख्य घटक है) पर केंद्रीय व्यय 2021-22 की तुलना में 2022-23 में मुश्किल से 10% अधिक था। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत प्रसूति (मातृत्व) लाभ के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए प्रति वर्ष लगभग 14,000 करोड़ रुपये की अनुमानित आवश्यकता की तुलना में प्रति वर्ष बमुश्किल 2,000 करोड़ रुपये की राशि मिलती है जो कि ऊंट के मुंह में जीरा वाली बात है।

2020-21 और 2021-22 में पीएमएमवीवाई को लगा झटका, कोविड-19 संकट के कुप्रबंधन का संकेत है। पीएमएमवीवाई मात्र एक नकद हस्तांतरण योजना है, इसके इतने बुरी तरह बाधित होने का कोई भी कारण नहीं है। और निश्चित रूप से 2022-23 में भी इस व्यवधान का कुछ ख़ास कारण नजर नहीं आता है।

इस असफलता की जड़ें इस तथ्य में निहित हैं कि सार्वजनिक नीतियों और चुनावी राजनीति में गर्भवती महिलाओं का महत्व बहुत कम है। “प्रसूति (मातृत्व) लाभ को सार्वभौमिक बनाने के वास्तविक प्रयास से हलचल मच सकती थी।” इसके बदले, केंद्र सरकार ने एक ऐसी लचर योजना की शरण ली जो वास्तव में आगे नहीं बढ़ पाई। तीन मौक़ों पर, वित्त मंत्री ने प्रसूति (मातृत्व) लाभ पर होने वाले खर्च को बढ़ाने की 60 भारतीय अर्थशास्त्रियों की अपील को नजरअंदाज कर दिया। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने भी इस जड़ता को चुनौती देने के बहुत कम प्रयास किए हैं। इसका परिणाम यह है कि एक और दशक के लिए महिलाएं प्रसूति (मातृत्व) लाभ अधिकारों से वंचित रही हैं।

यह लेख मूल रूप से दी इंडिया फोरम पर प्रकाशित हुआ था।

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लेखक के बारे में
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ज्यां द्रेज

ज्यां द्रेज एक विकास अर्थशास्त्री एवं कार्यकर्ता हैं। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन का काम किया है और वर्तमान में रांची विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में ऑनरेरी प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने विशेषकर भारत में विकास अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति में व्यापक योगदान दिया है। ज्यां द्रेज की रुचि ग्रामीण विकास, सामाजिक समानता, प्राथमिक शिक्षा, बाल पोषण, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे विषयों में है।

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रीतिका खेड़ा

रीतिका खेड़ा आईआईटी, दिल्ली में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले उन्होंने अहमदाबाद में भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) और आईआईटी दिल्ली में मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग का अध्यापन किया है। रीतिक ने अपना एमए और अपनी पीएचडी दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और एमफिल की पढ़ाई यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स से पूरी की है। रीतिक ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अख़बारों में खाद्य सुरक्षा, मनरेगा, शिक्षा, बाल पोषण और भारत में चुनाव जैसे मुद्दों पर कई लेख लिखे हैं।

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