June 8, 2022

स्वयंसेवी संस्थाओं को क्यों लगता है कि नया FCRA उनके मौलिक अधिकारों का हनन करता है

अप्रैल 2022 में आए FCRA (एफसीआरए) से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बारे में जानिए और समझिए कि यह स्वयंसेवी संस्थाओं को कैसे प्रभावित करता है।
9 मिनट लंबा लेख

8 अप्रैल 2022 को माननीय न्यायमूर्ति एएम खानविलकर सर्वोच्च न्यायालय के कोर्टरूम-3 में आए और अपनी उस कुर्सी पर बैठे जो न्यायालय के प्रतीक चिन्ह के नीचे लगी हुई थी। इस प्रतीक चिन्ह में चक्र, अशोक स्तंभ और महाभारत से लिया गया आदर्श वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ शामिल है। यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि आख़िर में जीत के लिए केवल धर्म (या सच्चाई) ही काफ़ी है। जस्टिस खानविलकर जिस मामले पर फ़ैसला सुनाने बैठे थे, उस पर बहस और सुनवाई शीतकालीन सत्र में हो चुकी थी और न्यायपीठ अपना फ़ैसला सुरक्षित कर चुकी थी। उस दिन कुछ पत्रकारों, वकीलों और एकाध दर्शकों के अलावा अदालत में ज़्यादा लोग मौजूद नहीं थे। कुछ देर की शांति के बाद जज ने गंभीर और उदास कर देने वाला यह​ फ़ैसला सुनाया कि विदेशी अनुदान स्वीकार करना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है।

हालांकि कई लोगों को इस फ़ैसले का आभास पहले से ही था लेकिन कुछ लोगों को अब भी उम्मीद थी कि शायद अदालत इस मुद्दे पर उदार नज़रिया अपनाएगी।

पृष्ठभूमि

भारत सरकार ने भारतीय राजनीति में विदेशी एजेंसियों के हस्तक्षेप को रोकने के लिए 1976 में फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) यानी विदेशी अनुदान (विनियमन) अधिनियम लागू किया था। साल 1984 में ग़ैर-लाभकारी संगठनों या स्वयंसेवी संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी अनुदानों को भी इसमें शामिल करने के लिए इस अधिनियम का विस्तार किया गया। 2010 में चुनावी प्रक्रियाओं की बजाय स्वयंसेवी संस्थाओं पर अधिक ध्यान देने के उद्देश्य से इस क़ानून के स्वरूप और लक्ष्य को पुनर्व्यवस्थित किया गया। यह परिवर्तन नई प्रस्तावना में शामिल किया गया, जिसमें लोकतांत्रिक संस्थानों से जुड़े संदर्भों के साथ-साथ मुख्य प्रावधानों के उन सभी संदर्भों को भी हटा दिया गया था जो राजनेताओं की बजाय स्वयंसेवी संस्थाओं की गतिविधियों पर केंद्रित थे।1

डेस्क पर गेवेल_FCRA NGO
कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने इन बदलावों को अपने मौलिक अधिकार के हनन की तरह देखा और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। चित्र साभार: फ़्लिकर

2020 में इस क़ानून को और अधिक सख़्त बनाया गया और सभी स्वयंसेवी संस्थाओं के सामने निम्न मांगें रखी गईं:

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

• मिलने वाली राशि सबसे पहले दिल्ली में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) के गेटवे खाते में प्राप्त करें।

• प्रशासनिक ख़र्चों के लिए उपलब्ध विदेशी अंशदान को कम करें।

• एफ़सीआरए फंड का पैसा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं को देना बंद करें, भले ही उनके पास एफ़सीआरए के लिए मंज़ूरी क्यों ना हो।2

उचित परामर्श प्रक्रियाओं का पालन किए बिना ही इन बाधक बदलावों को लागू करने से स्वयंसेवी संस्थाएं नाराज़ हो गईं। ये संस्थाएं पहले से ही अपने ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर चल रहे अभियानों से जूझ रहीं थीं और क़ानून में आए तेज रफ्तार बदलावों ने इनकी चाल और बिगाड़ दी। ऐसा तब हुआ जब इनके सामने महामारी के कारण देशभर में फैली अव्यवस्था से निपटने की चुनौती थी। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसे अपने मौलिक अधिकारों का हनन माना और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।

समस्याएं

जीवन ज्योति चैरिटेबल ट्रस्ट, तिरुवनंतपुरम जैसे याचिकाकर्ताओं ने गेटवे खाते की ज़रूरत का विरोध किया। केयर एंड शेयर चैरिटेबल ट्रस्ट, विजयवाड़ा के नोअल हार्पर और नेशनल वर्कर वेलफ़ेयर ट्रस्ट, सिकंदराबाद का मानना है कि नई दिल्ली में एसबीआई की मुख्य शाखा (एनडीएमबी) में एफ़सीआरए गेटवे के लिए खाता खुलवाने का यह निर्देश पूरी तरह से एकतरफा है और इस फ़ैसले से नौकरशाही की बू आ रही है। इससे पूरे देश की स्वयंसेवी संस्थाओं की मुश्किलें बढ़ जाएंगी क्योंकि इन खातों को नई दिल्ली की एक विशेष शाखा में खोलने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, पुनरानुदान पर लगाया गया प्रतिबंध भी अनुचित है क्योंकि इससे स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए एक दूसरे का सहयोग करना मुश्किल हो जाएगा। इस तरह यह क़ानून अनुच्छेद 19 में निहित सहयोग के मौलिक अधिकार का हनन करता है। पंजीकरण के समय सभी ट्रस्टियों द्वारा अपना आधार दिए जाने की आवश्यकता को सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का उल्लंघन माना गया है।3 इसलिए इस समूह ने अदालत से पहले की स्थिति ही बहाल करने का अनुरोध किया जिसके तहत स्वयंसेवी संस्थाएं किसी भी स्वीकृत बैंक में अपना मुख्य एफ़सीआरए खाता रख सकती हैं और एफ़सीआरए पंजीकरण वाली दूसरी संस्थाओं को पुनर्दान कर सकती हैं।

सरकार ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा है कि विदेशी अनुदान राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल हो सकता है इसलिए इनके उपयोग पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए। इन कड़े प्रतिबंधों के बावजूद हर साल विदेशों से आने वाले अनुदानों में लगातार वृद्धि हो रही है। अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने दान का हिस्सा हस्तानांतरित करने के कारण उनके आवंटन के ऑडिट का काम मुश्किल हो जाता है। साथ ही, इसके चलते लोकहित पर खर्च होने वाले धन का एक बड़ा हिस्सा अब व्यय का लेखाजोखा रखने वाली व्यवस्था पर खर्च होने लगा है। सरकार ने यह भी कहा है कि व्यापक स्तर पर पाए गए ग़ैर-अनुपालन (कम्प्लायन्स) के कारण 19,000 से अधिक स्वयंसेवी संस्थाओं की अनुज्ञप्तियां (लाइसेंस) रद्द कर दी गई हैं। इस बदलाव को सुविधाजनक बनाने के लिए एसबीआई ने ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं की हैं जिनकी मदद से दूर-दराज बैठे लोग भी अपना खाता खुलवा सकते हैं। इन सुविधाओं का लाभ उठाकर बहुत सारे लोगों ने सफलतापूर्वक अपना खाता खुलवाया भी है। सरकार ने यह भी दावा किया है कि कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं केवल अनुदान की राशि के लेनदेन में शामिल थी जिससे अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ इनके ख़ास ग्राहक संबंध बन गये। अंत में, सरकार ने कहा कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को विदेशी अनुदान लेने का मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं था और विधायिका इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करने या अपनी निगरानी में आंशिक रूप से लागू करने का अधिकार रखती है।

फ़ैसला

अदालत का फ़ैसला सरकार के रुख का समर्थन करता है। इस फ़ैसले में कहा गया कि एसबीआई ने लोगों को गेटवे खाता खोलने में मदद के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं की हैं और अपने आप में भी इसकी आवश्यकता का औचित्य है। इस फ़ैसले में यह भी कहा गया कि भारत की संप्रभुता को अनुचित विदेशी प्रभावों से बचाने की ज़रूरत थी और विधानमंडल द्वारा उठाए गए इस कदम को ग़लत नहीं ठहराया जा सकता है। इसके अलावा इस बात में कोई दम नहीं है कि इस परिवर्तन ने साथ काम करने, अभिव्यक्ति और आजीविका के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया है या यह कि यह आवश्यकता ही एकतरफा है। इस मामले में अदालत ने एकमात्र मामूली सी छूट देते हुए कहा कि ट्रस्टी एफ़सीआरए पंजीकरण के समय पहचान पत्र के रूप में अपनी आधार संख्या देने के बजाय पासपोर्ट दे सकते हैं।

मिथक

क़ानूनी तर्कों के अलावा 132 पृष्ठों वाले इस आदेश में कई अतिरिक्त टिप्पणियां भी शामिल हैं जो पूरी तरह से अदालत में सरकार की प्रस्तुतियों पर आधारित हैं, जैसे:  

  • पिछले दस वर्षों में विदेशी योगदान की राशि दोगुनी हुई है
  • स्वयंसेवी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर क़ानूनों का उल्लंघन किया है
  • कल्याणकारी गतिविधियों के लिए भारत में पर्याप्त धन है
  • लोक कल्याणकारी गतिविधियां एक तरह का व्यापार बन गई है

सरकार के ये दावे नॉन-प्रॉफिट सेक्टर की एक भ्रामक तस्वीर पेश करते हैं जो बीते 50 सालों से अधिक समय से लाखों गरीब और हाशिए पर जी रहे भारतीयों की मदद करता आ रहा है। इन ग़लत धारणाओं को विस्तार से देखते हैं:

1. पिछले कुछ वर्षों में विदेशी योगदानों में काफ़ी वृद्धि हुई है

सरकारी आंकड़ों के अनुसार विदेशी योगदान 2009–10 में 10,292 करोड़ रुपए से बढ़कर 2018–19 में 16,457 करोड़ रुपए हो गया। यह 10 सालों में 1.6 गुना बढ़ा है। औसत वार्षिक वृद्धि दर मात्र 5.4 प्रतिशत है जो मुद्रास्फीति की वार्षिक दर से कम है। अगर इन आंकड़ों को मुद्रास्फीति (सरकार के सूचकांक का उपयोग करते हुए) के अनुसार समायोजित किया जाता है तो प्राप्त आंकड़ा इशारा करता है कि असल में विदेशी अनुदान में पिछले 10 वर्षों में कमी आई है।

2. स्वयंसेवी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर एफ़सीआरए का उल्लंघन किया है

स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए क़ानून ‘उल्लंघन’ का संदर्भ वास्तव में एफ़सीआरए रिटर्न नहीं दाखिल करने से हैं। रिटर्न दाखिल नहीं करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं में ज़्यादातर संस्थाएं या तो निष्क्रिय हो चुकी है या फिर उन्हें किसी भी तरह का अनुदान नहीं मिलता है। परिणामस्वरूप, 19,000 स्वयंसेवी संस्थाओं का एफ़सीआरए पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया। ग़लत इस्तेमाल, संस्था का उद्देश्य बदलना (डायवर्जन) या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े वास्तविक उल्लंघनों की संख्या बहुत कम है। गृह मंत्रालय की एफ़सीआरए वेबसाईट पर ऐसे दर्जन भर ही मामलों को सूचीबद्ध किया गया है जहां ऐसे किसी उल्लंघन के लिए किसी संगठन के एफ़सीआरए को या तो निलम्बित कर दिया गया है या रद्द कर दिया गया है।

3. भारत में ही पर्याप्त धन उपलब्ध है

भारत में अधिकांश निजी कल्याणकारी अनुदान साधारण कल्याण और राहत (उदाहरण के लिए ग़रीबों को खाना खिलाना और आपदाओं के बाद बचाव और पुनर्वास) कार्यों में लगाए जाते हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं को सरकार से मिलने वाला धन उन सुविधाओं को मुहैया करवाने के लिए दिया जाता है जो सुविधाएं सरकार सीधे अपने स्तर से नहीं देना चाहती हैं। सीएसआर फ़ंडिंग भी अनुच्छेद VII में सूचीबद्ध चुनिंदा गतिविधियों तक ही सीमित है। इसमें कई महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन, मानव अधिकार, शोधकार्य, सशक्तिकरण और संघर्ष समाधान जैसा बड़ा हिस्सा बिना किसी घरेलू सहयोग के छूट जाता है। ये ऐसे मुद्दे हैं जहां भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले विकास के साथ तालमेल रखने के लिए समझ और बौद्धिक दृढ़ता विकसित करने की ज़रूरत है। यही कारण है कि इन मुद्दों पर काम कर रहीं संस्थाएं सीमा पार यूरोप और अमेरिका से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर होती हैं।

4. लोक कल्याणकारी गतिविधि एक व्यापार बन गई है

लोक कल्याणकारी संस्थाओं को अपनी बिक्री या शुल्क से मिलने वाले कुल राजस्व का 20 प्रतिशत से अधिक स्वीकार करने की अनुमति नहीं है। इसके अतिरिक्त, ये संस्थाएं ऐसे काम तभी कर सकती हैं जब यह व्यापारिक गतिविधि उनके लोक कल्याण उद्देश्य से जुड़ी हुई हों। इसलिए लोक कल्याणकारी संस्थाओं को व्यापारिक संगठन के रूप में देखना कठिन है।

5. देश में 30 लाख से अधिक स्वयंसेवी संस्थाएं हैं

इस क्षेत्र से जुड़ा एक और सबसे बड़ा मिथक (हालांकि इस फ़ैसले में इसे संदर्भित नहीं किया गया है) भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं की संख्या को लेकर है। इसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि इनकी कुल संख्या 30.17 लाख है। यह आंकड़ा केंद्रीय सांख्यिकी संगठन4 द्वारा जारी 2009 की रिपोर्ट पर आधारित है। इस आंकडें में सक्रिय और निष्क्रिय सभी पंजीकृत संस्थाओं और ट्रस्टों को शामिल किया गया है। आय कर पोर्टल पर कर-मुक्त कल्याणकारी संगठनों और धार्मिक इकाइयों की कुल संख्या 2,20,225 दिखाई गई है। इस सूची में सभी कर-मुक्त इकाइयों (स्कूलों एवं अस्पतालों) को शामिल किया गया है और यह आंकड़ा वास्तविकता के ज़्यादा नज़दीक प्रतीत होता है। सरकार के एनजीओ दर्पन पोर्टल के अनुसार इनमें से सिर्फ़ 1,39,097 इकाईयों को सही अर्थों में ‘ग़ैर-लाभकारी संस्था’ कहा जा सकता है। इसमें एफ़सीआरए पंजीकरण वाले संस्थान (16,888) और बिना एफ़सीआरए पंजीकरण वाले संस्थान (1,22,209) दोनों शामिल हैं। इस तरह स्वयंसेवी संस्थाओं की वास्तविक संख्या शायद 33 लाख के आंकड़े का 5–10 प्रतिशत ही है।

भविष्य

जब इस फ़ैसले से मिलने वाले वास्तविक लाभ के बारे में सोचें तो हमें यह विचार करना चाहिए कि: अगर विदेशी अनुदान को हतोत्साहित करना सरकार का राजधर्म है तो उन्हें देश के भीतर जनकल्याण को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक और सार्थक कदम उठाने के बारे में भी उतनी ही तत्परता से सोचना चाहिए। ऐसा हुआ तो यह स्वयंसेवियों, दानदाताओं और वंचितों, हम सभी के लिए एक वास्तविक जीत होगी।

फुटनोट:

  1. इससे संबंधित विनियमन (चुनावी बॉन्ड योजना, 2018) में विदेशी कंपनियों को अपनी भारतीय सहायक कंपनियों के माध्यम से राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकने से संबंधित कोई उपाय नहीं रखा गया है।
  2. एफ़सीआरए लाइसेंस वाले कई संगठनों ने अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से प्राप्त विदेशी धन को उप-अनुदान के जरिए दूर-दराज इलाक़ों में काम करने वाले छोटे स्तर की अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग करने का ऐतिहासिक काम किया है। ये अनुदान इन संगठनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अक्सर इन संगठनों के पास विदेशी एजेंसियों से सम्पर्क करने और चंदा लेने के तरीक़े उपलब्ध नहीं होते हैं। नए बदलाव के बाद भले ही छोटे स्तर के किसी स्वयंसेवी संस्था के पास एफ़सीआरए लाइसेंस क्यों न हो, उसके लिए ऐसा करना प्रतिबंधित होगा।
  3. केएस पुट्टास्वामी (सेवानिवृत) & Anr (आधार) बनाम भारत संघ & Anr (2019) 1 SCC 1 (अनुच्छेद 490 और 494). 
  4. राष्ट्रीय लेखा प्रणाली के ढांचे में भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए खातों का संकलन (सर्वे के फ़ेज़-1 की रिपोर्ट), राष्ट्रीय खाता विभाग, केंद्रीय सांख्यिकी संगठन, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

अधिक जानें

  • 2020 एफ़सीआरए संशोधन पर इस प्रेजेंटेशन को देखें।
  • इस लेख को पढ़ें और समझें कि कैसे 2020 एफ़सीआरए संशोधन ने स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रभावित किया है।
  • 2020 में हुए एफ़सीआरए संशोधन इतिहास और परिणामों को जानने के लिए यह व्याख्या पढ़ें।

लेखक के बारे में
संजय अग्रवाल-Image
संजय अग्रवाल

संजय अग्रवाल भारत में अंतर्‌राष्ट्रीय और भारतीय लोककल्याण संगठनों के साथ काम करने वाले अकाउंटेंट हैं। इनका मुख्य काम एनपीओ से संबंधित नियामक मुद्दों पर ऑडिट, आश्वासन, सिस्टम सलाह और क्षमता निर्माण से संबंधित है। संजय की प्रकाशित किताबों में एकाउंटेबल हैंडबुक ऑन एफ़सीआरए (2002, 2012, 2021), एनजीओ एकाउंटिंग एंड रेगुलेशन (2002) और दान एंड अदर गिविंग ट्रेडिशंस इन इंडिया (2010) शामिल हैं।

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