March 1, 2023

पुरुषों से महिलाओं के साथ हिंसा न करने की मांग करना भर काफी नहीं है

लैंगिक समानता और महिलाओं के साथ हिंसा रोकने वाले कार्यक्रमों में पुरुषों के लिए संवाद की गुंजाइश बनाने की जरूरत है।
7 मिनट लंबा लेख

2016 में, वाईपी फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक के तौर पर काम करते हुए मैंने लखनऊ के एक कॉलेज में पुरुषत्व (मस्कुलिनिटी/मर्दानगी) पर एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया था। हमारे कार्यक्रम के पब्लिसिटी पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था ‘मर्दानगी क्या है?’; हम चाहते थे कि उस कॉलेज के लड़के इस सवाल का जवाब ढूंढने में हमारी मदद करें। दूसरी तरफ, लड़कों को उम्मीद थी कि हम उन्हें इसका जवाब देंगे। फ़िल्म स्क्रीनिंग और मर्दानगी और लैंगिकता पर बातचीत के बाद उन लड़कों ने कहा ‘लेकिन आपने हमें बताया नहीं कि मर्दानगी होती क्या है। फिर हम इसका प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं?’ मैं चाहता था कि वे लड़के सोचें, सवाल करें और लिंग की धारणा को दोबारा जांचें; लेकिन वे चाहते थे कि मैं उन्हें बताऊं कि इसका बेहतर प्रदर्शन कैसे किया जाता है। यही वह चुनौती है जो भारत में पुरुषों के साथ काम कर रहे लैंगिक कार्यक्रमों के सामने आती है। 

भारत में लैंगिक कार्यक्रम एक लंबे समय से महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करने के लिए पुरुषों को शामिल करते रहे हैं। इन कार्यक्रमों का दायरा ‘लैंगिक जागरुकता’ से ‘लैंगिक रूप से जवाबदेह’ बनाने तक और अब ‘लैंगिक बदलाव लाने वाला’ भी हो गया है। इन कार्यक्रमों में पुरुषों को ताकतवर और महिलाओं के साथ की जाने वाली हिंसा के अपराधियों के रूप में संबोधित किया जाता रहा है। वहीं, बाद के कार्यक्रमों में इन्हें सकारात्मक पुरुषत्व का ढांचा तैयार करने के लिए महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से लड़ने वाले भागीदारों और सहयोगियों के रूप में देखा जाने लगा है।

यह भी है कि लैंगिक समानता से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने वाले पुरुषों को इसमें किसी भी प्रकार की रुचि नहीं होती है। पुरुषों को ‘बेहतर लैंगिक व्यवहार’ सिखाने पर आधारित कार्यक्रम उबाऊ और उपदेशात्मक होते हैं और इनसे सही मायने में पुरुषों के सवालों का जवाब नहीं मिलता है। अब समय आ गया है कि पुरुषों को बदलने में लगायी जाने वाली ऊर्जा का कुछ हिस्सा, उनके लिए बनाए जाने वाले कार्यक्रमों को बदलने में लगाई जाए। लेकिन इस बदलाव के लिए यह ज़रूरी है कि लैंगिकता से जुड़े कार्यक्रमों का डिज़ाइन तैयार करने वाले लोगों में इसकी बेहतर समझ हो कि इसमें शामिल होने वाले लोग कौन हैं और उनके मुद्दे क्या हैं।

पुरुषों एवं लड़कों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? 

कई सालों तक पुरुषों के साथ काम करने के बाद उनकी समस्या के बारे में मैंने यह समझा है:

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1. लड़कों को सिखाया जाता है कि ‘हिंसा’ मर्दानगी है

अक्सर अपने परिवार, मूल्यों, समुदाय, जाति, धर्म, राष्ट्र और ऐसी ही कई चीजों की रक्षा एवं नियंत्रण के लिए पुरुषों से कहा जाता है कि ‘मर्द बन’। इसका सीधा संबंध हिंसात्मक रवैए से होता है। पुरुषों के आसपास की हर चीज़ आक्रामकता और ‘हर बात में जीतना ही है’ वाले मर्दवाद जैसी धारणाओं से प्रेरित होती है। शिक्षा, रोज़गार और कामकाज से जुड़ी प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाएं, इस मर्दानगी को जल्द से जल्द सीखने और अपनाने पर ज़ोर देती हैं। इन कार्यक्रमों को चलाने वालों के तौर पर हम सहयोग, समुदाय और वैकल्पिक पुरुषत्व की जरूरत की बात तो करते हैं लेकिन अल्फ़ा मेल या कहें मर्द होने के कई वास्तविक फ़ायदे होते हैं। अपनी सामाजिक और सेक्शुअल मांग बनाए रखने, और इस तरह के अधिक मौके हासिल करने के लिए लकीर के फ़क़ीर की तरह व्यवहार करना, उस व्यक्तिगत संतुष्टि की तुलना में अधिक आकर्षक है जो अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने वाला समानतावादी पुरुष बनने पर होती है। जब हम अपने कार्यक्रमों को बनाते हैं तो यह बात ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

2. मर्दवादी दुनिया में संवेदनशीलता के लिए जगह नहीं है

वाईपी फाउंडेशन द्वारा चलाए जा रहे एक साल के कार्यक्रम में 13 लोगों के एक छोटे से समूह में गहन अनुभव प्रक्रियाएं अपनाई गईं। लेकिन इसके बावजूद पुरुषों के लिए अपने डर और संदेह पर बातचीत करना आसान नहीं था। किसी के कुछ साझा करने की स्थिति में समूह के दूसरे लोग या तो उसका मजाक बना देते थे या फिर उससे ज़्यादा अच्छी कहानी सुना देते थे। उस कमरे में मर्दानगी की भावना इतनी प्रबल थी कि हमारी ज़्यादातर ऊर्जा उससे निपटने में ही लगी रह जाती थी और इसे परे करने में लंबा समय लगा। मर्दाना होने और मर्दानगी दिखाने पर अत्यधिक ध्यान देने के कारण लिंग और यौनिकता के दोहरे दृष्टिकोण से बाहर पहचान या इच्छाओं को समझने की प्रक्रिया के लिए बहुत कम जगह बच जाती है।

3. लैंगिक हिंसा अन्य प्रकार की हिंसा के साथ-साथ चलती है

हिंसा के संबंध पुरुष और पुरुष, पुरुष और सरकार, और पुरुष और जाति, वर्ग, या लिंग जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच देखने को मिलते हैं। वाईपी फ़ाउंडेशन द्वारा किए गए एक अध्ययन में भाग लेने वाले लोगों ने बताया कि कैसे बोर्डिंग स्कूल के अच्छे दोस्त, कॉलेज में आने पर जाति और समुदाय आधारित समूहों में बंट गए। इनमें से ज्यादातर ने जाति आधारित व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़े जाने की बात कही।

जाति एक व्यक्ति के कामकाज, उसके एक से दूसरी जगह बसने, शारीरिक छवि, कामुकता और रोमांस को प्रभावित करती है। यह दबावपूर्ण और हिंसक होती है। ख़ासकर पुरुषों के लिए क्योंकि इस दमनकारी व्यवस्था में उन्हें संरक्षक के रूप में भी अपनी भूमिकाएं निभानी होती हैं। हिंसा से भरी इन विशाल व्यवस्थाओं को खत्म किए बग़ैर पुरुषों को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए कहने भर से चाहे गए नतीजे नहीं मिल सकते हैं। असल में, यह व्यवस्था महिलाओं और अन्य लिंगों को किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिंसा से सुरक्षित बनाने में सहयोग किए बिना ही ‘अपनी मां और बहन की रक्षा’ वाली भावना को तुष्ट करती है।

4. पुरुषों की यौन जिज्ञासा को अक्सर गलत नज़र से जाता है

यौन शिक्षा और अन्य लिंग के लोगों से संवाद न होने, और उनसे जुड़ी गलत सूचनाओं और मिथकों के प्रसार के कारण लड़कों के मन में कई सारे ऐसे सवाल होते हैं जिन्हें पूछने में उन्हें शर्म आती है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य होता है कि लड़के सुरक्षित, जिम्मेदारी पूर्वक और दोतरफ़ा सहमति के साथ यौन संबंध बनाएं। लड़के भी अच्छा, आनंददायक यौन अनुभव चाहते हैं। वाईपी फाउंडेशन में, यौन शिक्षा कार्यक्रमों में शामिल होने वाले ग्रामीण एवं शहरी युवा अक्सर यह पूछते हैं, ‘मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे साथी को अच्छा लग रहा है?’ यह लड़कों के पूछने के लिए बहुत अच्छा प्रश्न है लेकिन पुरुषों को शामिल किए जाने वाले ज़्यादातार कार्यक्रमों में इस सवाल के जवाब में केवल इतना ही बताया जाता है कि ‘नहीं का मतलब नहीं होता है।’ यौन जिज्ञासाओं को स्वीकार करने और उन्हें इनके बारे में बताने के बजाय सहमति के एक संकीर्ण विचार को सिखाना एक स्वस्थ, पूर्ण और सुखी यौनिकता की सोच का अपमान है।

एक आदमी पीछे से दूसरे आदमी के कंधे पर हाथ रख रहा है-महिला हिंसा
भावनाओं और अस्वीकृति के अनुभवों पर चर्चा को प्रोत्साहित करने से पुरुषों को हिंसा का सहारा लिए बिना इन पर विचार करने का मौका मिल सकता है। | चित्र साभार: जेकब जंग / सीसी बीवाई

युवा पुरुषों की इन वास्तविकताओं को लेकर लिंग संबंधी कार्यक्रम क्या कर सकते हैं?

पुरुषों के साथ कई मुद्दों पर एक साथ काम करने का मतलब उन दबावों के बारे में बात करना है जिनका वे सामना करते हैं और साथ ही उन्हें मिले विशेषाधिकारों पर भी चर्चा करना होता है। यह पुरुषों को केवल महिलाओं के ही संबंध में नहीं बल्कि एक सम्पूर्ण, कई चीजों को साथ लेकर चलने वाले मनुष्य के रूप में देखकर उनके साथ काम करने पर जोर देता है। इस संदर्भ में, हमें अपने-आप से यह ज़रूर पूछना चाहिए कि क्या हमारे कार्यक्रम संवादात्मक हैं और उन पुरुषों की बातों को शामिल कर रहे हैं जिनके लिए उन्हें डिजाइन किया गया है। इसके लिए, कार्यक्रमों को वास्तविक दुनिया की उन स्थितियों की जानकारी रखनी होगी और उन पर बात करनी होगी जिनसे आगे चलकर पुरुषों एवं लड़कों को निपटना है। लेकिन यह साफ है कि इनमें से कुछ उन क्षेत्रों से बाहर होंगे जिनके लिए विकास सेक्टर में फंडिंग हासिल करना और जिन्हें करना प्रमुख माना जाता है। पुरुषों और लड़कों के साथ लिंग या किसी अन्य मुद्दे पर आधारित कार्यक्रम बनाते और लागू करते समय कुछ संबंधित पहलुओं को ध्यान रखा जाना चाहिए:

1. किशोरों में विश्लेषण और तार्किक विचार क्षमता का विकास करना

मीडिया और सूचना के इस दौर में जरूरी है कि हम युवाओं (विशेष रूप से लड़कों और पुरुषों के लिए) को प्रचार, गलत सूचना और नकली सूचनाओं के ढेर से प्रामाणिक और तथ्यात्मक जानकारी को अलग करना सिखाएं। गलत सूचनाओं का प्रसार हमारे दैनिक जीवन के लगभग हर पहलू को प्रभावित करता है। भारत में कोविड-19 के बारे में लगातार गलत सूचनाओं की भरमार रही है, लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है। किसी खास समूह के लिए गलत सूचनाओं और संदेशों के ऐसे कई पैटर्न रहे हैं जो लोगों के बीच लिंगवादी, जातिवादी और सांप्रदायिक विचारों को फैलाते हैं।

ख़बर एवं ग़लत सूचना के बीच की रेखा अक्सर बहुत पतली और धुंधली होती है।

युवक अक्सर जानकार होने पर गौरव महसूस करते हैं। असली खबर एवं ग़लत जानकारी के बीच की रेखा अक्सर बहुत ही पतली और धुंधली होती है। सभी सामाजिक बदलाव कार्यक्रमों के लिए मुख्य काम लोगों में तार्किक सोच और विश्लेषण क्षमता विकसित करना होना चाहिए ताकि वे सभी पहलुओं पर गौर करने और झूठ को सच से अलग करने में सक्षम हो सकें। ‘व्यावसायिक प्रशिक्षण’ और ‘रोजगार’ के युग में, हम शिक्षा के इस महत्वपूर्ण उद्देश्य को भूल जाते हैं या इसे प्राथमिकता सूची से हटा देते हैं।

2. विविधता के साथ जुड़ाव को प्रोत्साहित करें

दुनिया के साथ समग्र और विचारशील जुड़ाव के लिए विविधता (डायवर्सिटी) की वास्तविक और अनुभव संबंधी विवेचना करना जरूरी है। मुझे एक विश्वविद्यालय परिसर की घटना याद आ रही है जहां हम युवा छात्रों के साथ काम कर रहे थे। वहां एक राजनीतिक रैली हो रही थी और हमारे कार्यक्रम में दो विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से संबंध रखने वाले प्रतिभागी थे। पुरुष प्रतिभागियों में से एक ने खुद को दो महिला सह-प्रतिभागियों से राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर पाया। हमने पाया कि इस प्रतिभागी ने जब अपने साथियों को महिलाओं को लैंगिक गालियां देते देखा तब उसने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन पर लिंग के असर के बारे में सोचना शुरू कर दिया। राजनीतिक दल के अपने साथियों द्वारा बहस के दौरान बार-बार लैंगिक अपशब्दों के प्रयोग ने उसे अपने राजनीतिक जुड़ाव पर भी सवाल करने को मजबूर कर दिया। यह पहली बार था जब उसकी दोस्ती महिलाओं या किसी अन्य धार्मिक पृष्ठभूमि या राजनीतिक विचारधारा के लोगों से हुई थी। उसके अनुभव एवं वास्तविक जीवन में नए जुड़ाव से उसकी सोच बदल गई और इससे दुनिया को देखने के उसके नज़रिए का विस्तार हुआ। अक्सर इस तरह के बदलाव लाने वाले अनुभवों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है क्योंकि लिंग संबंधी गतिविधियों से इनका सीधा जुड़ाव नहीं होता है।

ज़्यादातर पुरुष विभिन्न लिंगों, जातियों और समुदायों के लोगों के साथ दोस्ती नहीं रखते हैं। खासतौर पर ऐसे पुरुष जो विशेषाधिकार प्राप्त जातियों और समुदायों के परिवारों में पले-बढ़े होते हैं। हालांकि शहरी समृद्ध परिवारों में विविध लिंग, जाति और साम्प्रदायिकता से संबंध रखने वाले लोगों के साथ दोस्ती की अनुमति होती है। लेकिन वहां भी इसकी कमी है। हमें राजनीतिक विचारों, जातियों और अन्य सामाजिक पहचानों पर सीधे तौर पर बात शुरू करने की ज़रूरत है। फिर भले ही वे हमारे संकेतकों और परिणाम रूपरेखाओं के दायरे में फिट होते हों या नहीं।

3. पुरुषों के लिंग, कामुकता और इच्छाओं को उचित ठहराएं

कामुकता और इच्छाओं के क्षेत्र में सबसे पहली जरूरत गलत जानकारी से आए अपराधबोध, अयोग्यता और भ्रम की स्थिति पर बात करने की है। किशोर लड़के और युवक आत्म-संदेह और जिज्ञासाओं से ग्रस्त होते हैं। ‘अगर वह मना करती है तो मैं बिना डरे या चिढ़े उसे कितनी बार प्रोपोज कर सकता हूं?’, ‘क्या लड़कियों को भी सेक्स में मज़ा आता है?’, ‘उसने पूछा कि क्या मैं ब्लू फ़िल्में देखता हूं। अगर मैंने हां कहा तो क्या वह मुझे एक बुरा आदमी समझेगी लेकिन अगर मैंने ना कहा तो शायद उसे लगेगा कि मैं कूल नहीं हूं।’ कार्यक्रमों को युवा पुरुषों और लड़कों को परेशान करने वाले इन वास्तविक प्रश्नों पर बात करने की आवश्यकता है।

कामुकता और रिश्तों के प्रति एक अतिसाधारण ‘नहीं का मतलब नहीं’ वाला नजरिया अपनाना, सेक्शुअल पार्टनरों के बीच एक सुरक्षित, खुश और दोनों तरफ से साफ ‘हां’ की गुंजाइश खत्म कर देता है। भावनाओं और अस्वीकृति के अनुभवों पर चर्चा को प्रोत्साहित करने से पुरुषों को हिंसा का सहारा लिए बिना इन पर विचार करने की जगह मिल सकती है। लैंगिक कार्यक्रमों को लोगों में यह कौशल विकसित करना चाहिए कि वे अपने यौन साथियों के साथ सेक्स और अपनी इच्छाओं के बारे में बिना किसी भय के बातचीत कर सकें। यह युवाओं और विशेष रूप से युवा पुरुषों के जीवन के सकारात्मक और आवश्यक पहलू के रूप में कामुकता को स्वीकार करने वाले कार्यक्रमों से शुरू होता है। इसके अलावा, इसके लिए एक सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है जहां एक समानुभूति वाली मानसिकता बनाना और सीखना हमेशा सही बात कहने से अधिक जरूरी होता है।

4. विशेषाधिकार प्राप्त पुरुषों के साथ काम करें

विकास कार्यक्रम हाशिए पर और उत्पीड़ित समुदायों पर केंद्रित होते हैं। लेकिन, मर्दानगी पर काम करने के लिए प्रमुख और विशेषाधिकार प्राप्त समुदायों और पृष्ठभूमि वाले पुरुषों को शामिल करना आवश्यक है। अधिकांश संस्थान इन समुदायों और पृष्ठभूमि के लड़कों में शक्ति और अधिकार की भावना को मजबूत करना जारी रखते हैं, लेकिन विशेषाधिकार छोड़ने के काम में उन लोगों को शामिल करना चाहिए जो इसका सबसे अधिक लाभ उठाते हैं। इसी बिंदु पर विकास के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों को पुरुषों द्वारा सामना किए जाने वाले दबावों की स्वीकार्यता और उनके द्वारा की जाने वाली हिंसा की जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए। यह कई मुद्दों को संबोधित करने वाला काम है और इसके लिए पुरुषत्व और लिंग संबंधी कार्यक्रमों को स्वयं प्रतिबद्ध होना चाहिए। यह किसी भी तरह से विचारों का एक विस्तृत समूह नहीं है। यह मेरे अनुभव और पुरुषों और लड़कों के साथ जुड़ाव और लैंगिक कार्यक्रमों पर आधारित शुरुआत है। मुझे उम्मीद है कि यह पुरुषों के साथ कार्यक्रम के बारे में सोचने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक शुरुआती बिंदु हो सकता है, विशेष रूप से उनके लिए जो मर्दानगी और लिंग संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

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लेखक के बारे में
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मनक मटियानी

मनक मटियानी एक नारीवादी और क्वीयर कार्यकर्ता हैं, जो एक दशक से अधिक समय से लिंग और पुरुषत्व के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। मनक ने ऐसे कार्यक्रमों, अभियानों और संगठनों का नेतृत्व किया है जो लिंग आधारित हिंसा की रोकथाम पर काम करते हैं और विशेष रूप से लिंग, कामुकता और हिंसा के मुद्दों पर पुरुषों और लड़कों को शामिल करते हैं।

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