इंडो-बर्मा बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के किनारे पर स्थित उत्तरी त्रिपुरा जिला वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से समृद्ध है। इस क्षेत्र में कई समुदाय सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीते आए हैं। इनमें रंगलोंग समुदाय भी शामिल है, जो कुकी-चिन वंश का एक जातीय समूह है। ये त्रिपुरा की सामाजिक-सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक बनावट का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
नोआगांग पहाड़ी तथा वन क्षेत्र में रहने वाला रंगलोंग समुदाय मूल रूप से शिकार और वनोपज (हंटर-फॉरेजर) से अपनी गुजर करता था। समय के साथ इन्होंने अपना रुख कृषि की ओर किया। रबर और सुपारी जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए सरकार द्वारा निरंतर प्रोत्साहन मिलने के साथ, यह समुदाय निजी और पट्टे की जमीनों पर धीरे-धीरे एकल-फसल खेती (मोनोकल्चर) को अपना रहा है। सैटेलाइट चित्रों और संग्रहित डेटा से इस वन क्षेत्र में हो रहे बदलाव का पता चलता है। हालांकि, जमीनी स्थिति इससे कहीं गंभीर है।
नोआगांग बाजार से सटे एक छोटे से गांव लाईखुआ के रहने वाले डार्टिनसियाका रंगलोंग कहते हैं, “पहले जब हम शिकारी थे, सभी युवा पुरुषों को रात के खाने के लिए पहले पास के जंगलों में जाकर शिकार करना पड़ता था। यह 20-30 साल पहले की बात है, जब मैं जवान था। अब तो हमें जंगल में एक गिलहरी दिख जाए, तो भी खुद को खुशकिस्मत समझेंगे।”
एक पहाड़ की चोटी पर बसा लाईखुआ, जहां से दक्षिण-पश्चिम में नोआगांग पहाड़ियां दिखाई देती है, शहरीकरण से काफी दूर है। कुछ दशक पहले तक यह गांव त्रिपुरा को असम से जोड़ने वाली केवल एक लेन की सड़क से एक पतली पगडंडी के माध्यम से जुड़ा हुआ था। असम से राशन लेकर आने वाले ट्रकों को नोआगांग के नए बाजार में रूककर सामान उतारना पड़ता था। इस दौरान इन ट्रकों द्वारा लाईखुआ, बालिचेरा, और आस-पास की पहाड़ियों पर बसे अन्य गांवों में की जाने वाली झूम खेती से होने वाली ताजा उपज को भी खरीदा जाता था। आस-पास के श्रम बाजारों में छोटे-मोटे कामों के अलावा, यह गांव वालों के लिए आमदनी का मुख्य स्रोत था।

इन पहाड़ियों पर रहने वाले रंगलोंग और अन्य जनजातीय समुदाय अक्सर विभिन्न पगडंडियों के जरिए शिकार, व्यापार और आवाजाही के लिए लोंगाई नदी पार कर असम जाते थे। लेकिन जब से एक लेन वाली सड़क को दो लेन वाले हाईवे (नेशनल हाईवे-8) में परिवर्तित किया गया है, तब से सब कुछ बदल गया। अब इस हाईवे को चार लेन चौड़ा किया जा रहा है। कई दशकों तक चली इस प्रक्रिया में पहाड़ियों को तोड़ा गया और जंगल साफ किए गए। इस दौरान समुदायों ने अपनी बस्तियां लाईखुआ जैसे ऊंचाई पर बसे गांवों में स्थापित कर ली और धीरे-धीरे मोटर मार्गों ने इन पारंपरिक पगडंडियों की जगह ले ली। आज रंगलोंग समुदाय अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह से नोआगांग बाजार और सड़क परिवहन पर निर्भर है।

वर्तमान में लाईखुआ में ज्यादातर लोग सुपारी और रबर की खेती करते हैं, जिन्हें प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) के लिए नोआगांग बाजार में बेचा जाता है। थांगलियांगजॉय हलाम, जो पेशे से एक युवा ड्राइवर और दुकानदार हैं, कहते हैं, “हालांकि, आजकल उपज की गुणवत्ता में कमी आई है, और मात्रा भी पहले से बहुत कम हो गई है।”
पिछले कुछ दशकों में लाईखुआ और नोआगांग के बड़े हिस्से में बांस की गुणवत्ता और उपलब्धता में लगातार गिरावट देखी गई है। रंगलोंग समुदाय को बांस का कुशल कारीगर माना जाता है। यह पेड़ पारंपरिक रूप से इस समुदाय की जीवनशैली का एक अहम हिस्सा रहा है। शिकार करने और वनोपज जुटाने के दौर में रंगलोंग समुदाय औजार बनाने, आत्मरक्षा और दैनिक निर्वाह के लिए लगभग पूरी तरह बांस पर निर्भर था। घरों में भी टोकरियों, छलनियों और निर्माण सामग्री के रूप में बांस सर्वत्र मौजूद रहता था। आमतौर पर पहाड़ी की ढलान पर बने रंगलोंग समुदाय के मकान लगभग पूरी तरह लकड़ी और बांस से निर्मित होते थे। इन जोखिम भरी ढलानों पर बांस घर को आवश्यक मजबूती प्रदान करता है और वजन में हल्का भी होता है।

इस क्षेत्र में बांस की भरपूर मौजूदगी के कारण पूरे साल निर्धारित अंतराल पर संतुलित और टिकाऊ ढंग से पेड़ों की कटाई होती थी। साथ ही रंगलोंग समुदाय को इससे प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुरूप घरों के निर्माण के लिए पर्याप्त मात्रा में सामग्री मिल जाती थी। लेकिन स्थानीय वन, जो कभी लकड़ी और बांस के पारंपरिक स्रोत थे (जहां विशाल साल और डिप्टेरोकार्पस जैसे पेड़ मूल्यवान लकड़ी प्रदान करते थे), अब उनकी जगह सुपारी और रबर के बागानों ने ले ली है।

सुपारी और रबर जैसी मुनाफा देने वाली नकदी फसलों की खेती को प्रोत्साहन मिलने से बांस की उपयोगिता और महत्व में कमी आई है। बांस उद्योग में कुशल श्रम की आवश्यकता होती है और इसकी आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चेन) छोटी होती है, जिसमें मात्रा से अधिक गुणवत्ता पर जोर दिया जाता है। यह प्रायः सुपारी और रबर के बाजार के विपरीत है। आज इस क्षेत्र में होने वाले अधिकांश बांस को थोक विक्रेताओं द्वारा खरीदा जाता है और धर्मनगर तथा आसपास के कस्बों में बेचा जाता है। सस्ते प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते प्रचलन ने स्थानीय स्तर पर बांस के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) और निर्माण कला को लगभग खत्म कर दिया है। इस कारण रंगलोंग समुदाय से संबंधित स्थानीय कारीगरों की आजीविका में लगातार गिरावट आ रही है।

लाईखुआ में आजीविका के अन्य स्रोत धीरे-धीरे बांस-आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था की जगह ले रहे हैं। यहां के युवा अब गांव से बाहर जाकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं।
थांगलियांगजॉय कहते हैं, “मैं अब ट्रांसपोर्ट गाड़ी चलाता हूं। मेरे पिता किसान और कारीगर थे। हमारे समुदाय के कई लोग बांस के कुशल कारीगर थे। लेकिन अब कोई आमदनी नहीं होने के कारण, हमें दूसरी नौकरियां करनी पड़ रही हैं।”
डार्टिंसियाका कहते हैं, “मैं बांस की कला में निपुण था और मुझे शिकार और मनोरंजन के लिए नई-नई चीजें बनाना पसंद था। मैं महसूस कर सकता हूं कि उम्र के साथ मेरे हुनर कमज़ोर पड़ रहे हैं और मुझे नहीं मालूम कि मेरे बाद कोई युवा इन्हें याद रखेगा या नहीं।” पारंपरिक वास्तुकला (आर्किटेक्चर) से जुड़ा अधिकांश ज्ञान अब केवल बुज़ुर्गों के पास ही रह गया है। ज्ञान के आदान-प्रदान के अभाव में ऐसे कौशल और परंपराओं के ऊपर सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है।

पिछले एक साल के भीतर, गांव के आसपास रंगलोंग समुदाय के कई घरों में नए निर्माण का काम हुआ है। अब बांस और लकड़ी की पारंपरिक परतों की जगह कंक्रीट की दीवार और ईंटों के पैनल ने ले ली है। ऐसे में रंगलोंग समुदाय के टिकाऊ तरीकों की विरासत लगातार कमजोर हो रही है।
जहां पारंपरिक रंगलोंग वास्तुकला (आर्किटेक्चर) समुदाय की जीवनशैली और आसपास के परिदृश्य (लैंडस्केप) के अनुकूल थी, वहीं ये आधुनिक कंक्रीट के घर ढलान वाले भूभाग के लिए कतई उपयुक्त नहीं हैं। लेकिन, यह संकट समुदाय के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों (जिसमें कच्चे माल का खर्च भी शामिल है) के सामने दब दब जाता है। एक ईंट की कीमत लगभग 18 रुपये है, जबकि अच्छे बांस के तने की कीमत लगभग 80 रुपये है। यह एक बड़ा कारण है कि समुदाय में बांस से बनने वाले घरों और शिल्प कौशल में कमी देखी जा रही है। जैसे-जैसे एकल-फसल (मोनोकल्चर) खेती स्थानीय बांस की जगह लेगी, यह संकट आने वाले समय में और विकट होता जाएगा।

लाईखुआ इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे विकास और आजीविका से जुड़ी दिशाहीन योजनाएं किसी समुदाय की रिवायतों और प्राकृतिक वातावरण के साथ उसके संबंध को प्रभावित करती हैं। बांस की पौध से रंगलोंग समुदाय का जुड़ाव और उससे जुड़े कौशल की समृद्ध विरासत अब खत्म होने की कगार पर है। स्वदेशी पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) तौर-तरीकों और विविधीकृत कृषि के लिए राज्य द्वारा दिए जाने वाले प्रोत्साहन के अभाव से यह प्रक्रिया और तीव्र होगी।
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