March 2, 2022

स्वयंसेवी संस्थाओं में मानवाधिकार से जुड़े कामों के लिए वित्तपोषण

बाल अधिकार, श्रम अधिकार और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर काम कर रहे पंद्रह लोगों ने आजमाए गए फंडरेजिंग और वित्तपोषण की रणनीतियों को लेकर अपने अनुभव और इस प्रक्रिया से मिलने वाले सबक को साझा किया।
7 मिनट लंबा लेख

पिछले दशक में भारत में सामाजिक क्षेत्र ने वित्तपोषण के मामले में अचानक से आए एक बदलाव का अनुभव किया। जहां इसमें कोविड-19 ने नए आयाम जोड़े वहीं इसके आगमन के पहले से ही अन्य कारकों ने अपनी भूमिकाएँ निभानी शुरू कर दी थीं, और स्वयंसेवी संस्थानों और कार्यान्वयन संगठनों को इस लगातार बदलते परिदृश्य में समायोजित करना पड़ रहा था। पिछले कुछ सालों में विदेश से आने वाले धन की निश्चितता में कमी आई है और वित्तपोषण के शब्दकोश में कुछ नई शब्दावलियाँ जुड़ी हैं (‘इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग’, ‘पी2पी’, ‘क्राउडफंडिंग’, ‘हैकेथोंस’)। शायद सबसे जरूरी बात यह है कि सीएसआर निवेश ने सेवा वितरण के पक्ष में धन को हटा दिया है, खास कर उनके लिए जो वार्षिक ‘प्रोजेक्ट’ मोड में शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं।

जहां सामाजिक बदलाव को लागू करने वाले सभी लोगों को नए परिदृश्य के साथ तालमेल बैठाने में निवेश करना पड़ रहा है वहीं इसका सबसे अधिक प्रभाव उन संगठनों पर पड़ा है जो सशक्तिकरण के ढांचे के साथ मुख्य रूप से मानव अधिकार के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। उनकी स्थिति को और बेहतर तरीके से समझने के लिए हम लोगों ने कार्यान्वयनकर्ताओं, अनुदानकर्ताओं, मध्यवर्ती संस्थाओं और उन शोधकर्ताओं के प्रतिनिधियों से बात की जो काम करते हैं और मानव अधिकार से जुड़े कामों को अपना समर्थन देते हैं। हम लोगों ने उनसे एक सवाल किया: आपने ऐसे फंडरेजिंग और वित्तपोषण की कौन सी रणनीतियों का प्रयोग किया जो सफल रहीं और जिन्होनें जमीन पर आपके काम को जारी रखने में आपकी मदद की?

हम लोगों ने जिन 15 लोगों से बातचीत की वह बाल अधिकार, श्रम अधिकार, लैंगिक न्याय और स्वास्थ्य अधिकार (मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिकता सहित) से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। यह उनकी प्रतिक्रियाओं का एक संश्लेषण है—जो उन्होनें आजमाया, परखा और सीखा है।

1. पुनर्विन्यास और पुनर्रचना

ज़्यादातर संगठनों ने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण को अपनाया है। उनके द्वारा आकर्षित किए जाने वाले वित्तपोषण पर इस बात का प्रभाव पड़ता है कि वे अपने काम के किस पहलू को मुख्य रूप से दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, घर से निकाल दी गई या छोड़ दी गई विधवाओं के सशक्तिकरण पर काम करने का एक महत्वपूर्ण घटक सम्मान के साथ जीवन यापन करने के लिए उनकी क्षमता का निर्माण करना है। इसमें कौशल-निर्माण, उद्यमशीलता का विकास और आय सृजन जैसी गतिविधियां शामिल हैं—ये सभी सीएसआर के अधिदेश के अधीन हैं और निवेशकों को उस स्थिति में भी प्रभावित करते हैं जब औरतों के अधिकारों की सिफ़ारिश करने वाली बातें भी उन्हें प्रभावित नहीं कर पाती हैं।

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2. कम लागत का लाभ होना

वित्तपोषण की अनिश्चितता से बचे रहने के लिए कम लागत एक मुख्य योगदानकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाता है। अधिकार-आधारित काम में सेवा वितरण की तुलना में कम लागत वाला लाभ अंतर्निहित होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक समुदाय को उन समान सेवाएँ मुहैया करवाने में लगने वाली लागत की तुलना में अधिकारों तक पहुँचने के लिए सशक्त बनाने के काम में बहुत ही कम खर्च आता है। उदाहरण के लिए, पूरे प्रखण्ड में राज्य के साथ समुदाय और अभिभावकों के एक समूह की बातचीत के माध्यम से सरकारी विद्यालय की व्यवस्था को मजबूत करने की पहल में आने वाला खर्च उतने ही बच्चों की क्षमता वाले नए विद्यालय के निर्माण में आने वाले खर्च से बहुत कम होता है। इससे संगठनों द्वारा धन जुटाने की प्रक्रिया में तेजी आती है क्योंकि इन कार्यक्रमों की ‘दानकर्ताओं के निवेश से मिलने वाले लाभ (रिटर्न ऑन डोनर इनवेस्टमेंट) की दर अच्छी होती है। क्योंकि अंतिम विश्लेषण में, खुद ही काम को आगे बढ़ा सकने वाले लोगों के समुदायों के निर्माण से ज्यादा टिकाऊ कौन सी चीज है?

एक गोले में बैठकर एक ऐसा खेल खेलती हुई औरतें जो परिवार के कल्याण को बढ़ावा देता है_वित्तपोषण स्वयंसेवी संस्थाएं
आधिकार-आधारित, सशक्तिकरण की दिशा में होने वाले पहलों में भरोसा करने वाले दानकर्ताओं ने यह पाया कि उनके वित्तपोषण के लिए दीर्घकालिक दृष्टिकोण होनी चाहिए। | चित्र साभार: बिल & मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन/बारबरा किन्ने

3. जानकारी हासिल करते रहना और उसका अनुपालन करना

कानून, नियम, दिशानिर्देश, पंजीकरण, पुनर्पंजीकरण, दस्तावेजीकरण, और बहुत कुछ— अनुपालन के लिए अनिवार्य चीजों की सूची अंतहीन है और समय-समय पर इसमें बदलाव आता रहता है। उनके साथ तालमेल बिठाए रखने के लिए संगठन फोरम (ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों) का उपयोग करते हैं जैसे कि ऐसे वेबिनार और लेख हाल में विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम (एफ़सीआरए) संशोधनों की व्याख्या करते हैं। इसके अलावा, वे टीम के सदस्यों (खासकर वित्तीय टीम के सदस्यों) को हाल में किए गए संशोधनों के बारे में पता लगाने और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपते हैं। सबसे जरूरी यह होता है कि वे अपने जैसे अन्य संगठनों के साथ सहक्रियात्मक संबंध बनाए है ताकि वे वास्तविक समय पर उठाए जाने वाले सही कदम और उचित सलाह के स्त्रोत को सुनिश्चित कर सकें। 

4. वित्तपोषण के नए स्त्रोत की तलाश 

जहां वित्तपोषण के कुछ पारंपरिक स्त्रोत घटते जा रहे हैं, खासकर विदेशी अनुदान, वहीं दानकर्ताओं की एक पूरी ऐसी नई पीढ़ी इस मैदान में कदम रख रही है जो असामान्य कारणों का समर्थन करती है। इस तरह के कुछ फंड पुरस्कारों और प्रतियोगिता, हितों की अभिव्यक्ति (एक्स्प्रेशन ऑफ इंटरेस्ट) की पुकार, शोध अनुदान और फ़ेलोशीप के रास्ते आते हैं। भारत में भी, कुछ दानकर्ताओं ने दुस्साहस दिखाया और खुद को मुख्यधारा वित्तपोषण के विषयों से अलग कर लिया। अधिकार-आधारित संगठनों को यह एहसास हुआ कि धन के इन नए स्त्रोतों की तलाश में लगातार पैनी नजर रखते हुए समय और ऊर्जा खर्च करना बहुत महत्वपूर्ण है। 

5. समय के साथ वित्तीय भंडार का निर्माण

संगठनात्मक भंडार और कोष के लिए वित्तपोषण एक ख़त्म होते हुए बजट की चीज बन गया है। फिर भी कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं एक ठोस आधार-निर्माण के काम में लगी हुई हैं। इन ठोस आधार के तैयार हो जाने के बाद वित्तपोषण के स्त्रोत की अनुपस्थिति में भी ये संस्थाएं कम से कम तीन से छ: महीनों तक अपने बुनियादी काम करने में सक्षम हो सकती हैं। इन संगठनों ने जो अनुभव हासिल किया वह यह था कि कोशिश करना बंद नहीं करना है। हो सकता है कि हर बार प्रस्ताव पेश करने के समय कुल बजट का एक छोटा हिस्सा संगठन के बचत कोष के लिए देने का विचार सफल न हो। लेकिन लंबे समय तक छोटी-छोटी राशियों को जमा करने से आपात की स्थिति में यह राशि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

6. क्राउड और खुदरा वित्तपोषण की दिशा

क्राउड और खुदरा वित्तपोषण दोनों ही उस चीज का निर्माण कर सकते हैं जिसकी संगठनों को जरूरत होती है—अप्रतिबंधित, असम्बद्ध संसाधनों का एक तालाब:

  • खुदरा वित्तपोषण का अर्थ होता है उनके नाम को छुपाने के विकल्प के साथ व्यक्ति विशेष और शुभ-चिंतकों से धन जुटाना। वित्तपोषण का यह तरीका धन जुटाने के लिए एक महत्वपूर्ण स्त्रोत की तरह काम कर सकता है और साथ ही दोबारा समर्थन के लिए प्रतिबद्धता को सुनिश्चित करता है। हालांकि, इसके काम करने का तरीका और मुख्य उद्देश्य जमीनी संगठनों के काम की प्रवृति से विपरीत होता है। इसके लिए बेचने की मानसिकता, लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत और उगाहे गए धन के महत्वपूर्ण पुनर्निवेश की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, एक ऐसा संगठन जो महीने में औसतन 1.8 करोड़ रुपए अनुदान में प्राप्त करता है वह इस राशि का आधा हिस्सा खुदरा वित्तपोषन इंजन के परिचालन में ल‍गाता है—यह एक ऐसा अभ्यास है जो अधिकांश विकास संगठनों के लिए असामान्य है।
  • क्राउडफंडिंग एक बार होने वाले आयोजन, अभियानों और ऐसी गतिविधियों के लिए बेहतर विकल्प है जो संस्थागत वित्तपोषण को अपनी ओर आकर्षित नहीं करते हैं। ऐसा देखा गया है कि जो इसे एक स्वयंसेवियों द्वारा संचालित आंदोलन के साथ जोड़ पाने में सफल होते हैं उन्हें सोशल मीडिया में अपने इस अभियान को चलाने में बहुत अधिक सफलता मिली है। जहां क्राउडफंडिंग लंबे समय तक चलने वाले कार्यक्रमों को चलाने में सक्षम नहीं होता है वहीं इसने यह साबित किया है कि यह काम में रुचि रखने वाले नए दानकर्ताओं (और ऐसे लोग जो सीमा पर खड़े हैं) को ला सकता है।

7. संचार पर ध्यान केन्द्रित करना

‘जो लोग जमीन पर अच्छा और अर्थपूर्ण काम करते हैं वे इसका प्रसारण नहीं करते हैं’ एक ऐसा सिद्धान्त है जिसका समय जा चुका है। इसमें निवेश करना और संचार के जिम्मेदार बनने के लिए कौशल का विकास करना, संचार और मिडिया रणनीति को विकसित करना, सोशल मीडिया पर गहरी और लोकप्रिय अपील वाली उपस्थिती को सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है। इसके अलावा दानकर्ताओं और शुभ चिंतकों (भूतपूर्व, वर्तमान और संभावित) के साथ समय-समय पर संवाद बनाए रखने जैसी गतिविधियों को उतना ही महत्वपूर्ण माना जाने लगा है जितना महत्वपूर्ण किसी संगठन का जमीन पर उतरकर वास्तविक काम करना है।

8. अंतर-क्षेत्रीय चैम्पियनों की तलाश

काम करने वालों और दानकर्ताओं के बीच भरोसे की कमी पर विस्तार से बात की जा चुकी है। सामाजिक परिवर्तन प्रारूप के बारे में जानकारी की कमी से पैदा होने वाले, कार्यकर्ताओं के काम करने के तरीके और गैर-जवाबदेही की सामान्य धारणा के कारण अधिकार के ढांचे में काम करने वाले लोगों का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस कमी को कम करने की क्षमता क्षेत्र में कारण विशेष से जुड़े उन काम कर रहे चैम्पियनों (कॉज़-चैम्पियन्स) के पास है जिनपर दानकर्ता विश्वास करते हैं।

उदाहरण के लिए स्वास्थ्य के अधिकारों पर काम कर रहे एक संगठन को अपने दानकर्ताओं से कम से कम तीन वर्षों तक की प्रतिबद्धता हासिल करने में मुश्किल हो रही थी। बातचीत का रुख़ उस समय बदल गया जब उन्होनें सरकारी और निजी क्षेत्र के ऐसे प्रतिनिधियों की मदद लेनी शुरू की जिन्होनें बहु-वर्षीय वित्तपोषण की जरूरत के बारे में बार-बार बताया। 

9. आंकड़ों में निवेश

संगठनों ने पाया कि आंकड़ों और प्रमाणों के होने से वित्तपोषण से संबंधित बातचीत नाटकीय रूप से बदल जाती है। जब संगठन ऐसा कहने में सक्षम होते हैं कि वे आंकड़ों पर नजर रखते हैं और इस पर काम करते हैं तब उन्हें अपने मॉडल के लिए एक मामला तैयार करने और साथ ही यह भी बताने में सुविधा होती है कि वित्त की जरूरत न केवल कार्यक्रमों को है बल्कि शोध, और निगरानी और मूल्यांकन (एम&ई) के लिए भी है। शोध के लिए अनुदान की जरूरत, मजबूत एम&ई व्यवस्था में निवेश और सफलता और चुनौतियों के प्रमाण को विस्तृत रूप से साझा करने की प्रक्रियाएँ भी क्षेत्र में जवाबदेही की कमी के बहस का जवाब देने में मददगार साबित हुई है।

10. उपयुक्त मध्यस्थता वाले साथी की खोज

अपने संगठन के लिए एक उपयुक्त मध्यस्थता वाले साथी की पहचान भर करने से बहुत अधिक बदलाव आ जाता है। लागू करने वाले संगठन के दृष्टिकोण से एक उपयुक्त मध्यस्थ वह होता है जो न केवल उस अनुदानकर्ता का प्रतिनिधित्व करता है जिसने उसे नियुक्त किया है बल्कि वास्तव में संगठन के कारण, चुनौतियों और क्षमताओं को भी समझता है। वे दानकर्ताओं को असामान्य कारणों, संगठनों और भौगोलिक क्षेत्रों पर विचार करने के लिए तैयार कर सकते हैं। वे वर्तमान में न केवल संगठन के वित्तपोषण इंजन को चलाने की क्षमता को सशक्त बनाने में मदद कर सकते हैं बल्कि भविष्य के लिए कौशल और संचालन व्यवस्था के आधार का निर्माण भी कर सकते हैं। और, वे संगठन को अपने मूल तत्व को खोये बिना अपने कामों के प्रदर्शन के नए तरीकों के बारे में सोचने में उनकी मदद कर सकते हैं। और हाँ ऐसे मध्यस्थ मौजूद हैं!

अनुदानकर्ताओं की नजर से

अधिकार-आधारित, सशक्तिकरण उन्मुख पहलों के समर्थन में भरोसा करने वाले अनुदानकर्ताओं ने यह सीखा है कि जिस तरह से वे उन कामों के प्रभाव को दीर्घकालिक रूप में देखने की उम्मीद करते हैं जिनका उन्होने समर्थन किया है, उसी तरह से उनके वित्तपोषण को भी एक लंबी अवधि वाले दृष्टिकोण की जरूरत है। अनुदानकर्ताओं के बीच ‘प्रगतिशीलता’ का एक सूचकांक उन मुख्य अनिवार्यताओं में निवेश की योग्यता है जो संगठनो को उनके प्रभाव को बनाए रखने में मदद करती है—सामुदायिक नेतृत्व को मजबूत करती है; भविष्य में ड्यू डिलिजेंस के अभ्यासों को आसान बनाने वाले अनुपालनों के निर्माण में मदद करती है; वित्तपोषण के इंजन की स्थापना में निवेश करवाती है; प्रस्ताव लेखन के लिए संगठनों को क्षमता निर्माण के साथ जोड़ती है; और उन्हें प्रासंगिक मध्यस्था वाले साथियों से जोड़ने का काम करती है।

अंत में, ऐसे अनुदानकर्ता संगठनों को इस तरह से मजबूत बना सकते हैं ताकि वे मुख्यधारा के वित्तपोषण की भाषा बोल सकें और अनुपालन के दायरे का मजबूती से जवाब दे सकें, जिससे कि ये संगठन परियोजना के लिए अकेले ही वित्तपोषण करने की प्रक्रियाओं की संकीर्ण सीमाओं से परे जा सकें।

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  • उन तीन रणनीतियों के बारे में पढ़ें जिससे मानव अधिकार को बचाने वालों का समर्थन किया जा सकता है।

लेखक के बारे में
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रुक्मिणी दत्ता

रुक्मिणी दत्ता मुंबई की एक स्वतंत्र सलाहकार हैं जो सामाजिक परिवर्तन और स्थिरता के मुद्दों पर काम करती हैं। उन्हें स्वयंसेवी संस्थाओं में परियोजनाओं को लागू करने से लेकर सीएसआर और निजी परोपकारी टीमों के लिए फंडिंग एजेंडा तैयार करने और निष्पादित करने तक के सामाजिक क्षेत्र में बीस से अधिक वर्षों का अनुभव है। जमीनी स्तर पर बदलाव लाने वालों और नवोन्मेषकों से गहराई से प्रेरित होकर, वह उनके साथ रणनीतिक सोच, संस्थागत विकास और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में काम करती हैं।

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