July 20, 2022

2022 में FCRA: अब तक का सफ़र और उसका असर

FCRA में हुए संशोधनों के संक्षिप्त इतिहास से लेकर स्वयंसेवी संस्थाओं और आम आदमी पर इनके असर तक, इस क़ानून के बारे में वह सबकुछ जो आपको जानना चाहिए।
8 मिनट लंबा लेख

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफ़सीआरए) हमारे देश में स्वयंसेवी संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी अनुदानों को नियंत्रित करने वाला कानून है। यह कानून तय करता है कि स्वयंसेवी संस्थाएं कहां से धन प्राप्त कर सकती है, इसका इस्तेमाल कौन कर सकता है और किस तरह के उद्देश्यों के लिए इस धन का उपयोग किया जा सकता है।

1 जनवरी 2022 को यह अधिनियम तब एक बार फिर चर्चा में आ गया जब सरकार ने लगभग 6,000 स्वयंसेवी संस्थाओं का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया। यानी, अब ये संस्थाएं विदेशों से आर्थिक मदद नहीं ले सकती थीं। इन संस्थाओं में मदर टेरेसाऽज मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी, ऑक्सफ़ैम इंडिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी दिल्ली और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके बाद इस फ़ैसले पर नराज़गी की खबरें मीडिया में छाई रहीं, दिग्गज राजनेताओं ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं दीं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसने लोगों का ध्यान खींचा। शायद इसी के चलते इनमें से कुछ संस्थाओं के लाइसेंस फिर से बहाल कर दिए गए।

हम यहां तक कैसे पहुंचे?

2010 में जब एफसीआरए में संशोधन किए गए तो उनमें से एक संशोधन संस्थाओं के लाइसेंस की वैधता से संबंधित था। इससे पहले एफसीआरए के तहत रजिस्टर्ड संस्थाएं अनिश्चित समय तक विदेशों से अनुदान लेने के लिए स्वतंत्र थीं। वहीं, 2010 के संशोधन में प्रावधान किया गया कि इन संस्थाओं को हर पांच साल में अपने लाइसेंस को रिन्यू करवाने की ज़रूरत होगी। इस बदलाव के चलते अब हर पांच साल में लगभग 20,000 संगठनों को अपना एफसीआरए लाइसेंस रिन्यू करवाना पड़ता है।

इस साल भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी और लगभग 20,000 आवेदन रिन्यूअल के लिए आए थे। जहां तक हमारी जानकारी है (अपर्याप्त सूचना के कारण) समय सीमा समाप्त होने की वजह से लगभग 6,000 आवेदन रद्द हो गए। इसका मतलब यह हुआ कि यह सरकार नहीं थी जिसने 6,000 संगठनों के लाइसेंस रद्द किए, बल्कि ये वे संस्थाएं ही हो सकती हैं जिन्होंने खुद अपने लाइसेंस रिन्यू न करवाने का फ़ैसला लिया।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि किन संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुए हैं और क्यों।

सरकार द्वारा वास्तव में रद्द किए गए लाइसेंसों की संख्या 179 है। ये वे मामले हैं जिसमें इन संगठनों ने लाइसेंस रिन्यूअल के लिए आवेदन दिए पर इन्हें अनुमति नहीं मिली। एक अंदाज़े के मुताबिक़ इन 179 संस्थाओं में से 83 का लाइसेंस बाद में बहाल कर दिया गया। लेकिन न तो इन आवेदनों को अस्वीकार किए जाने का कोई कारण पता चला है और ना ही बाद में इस फ़ैसले को पलटे जाने का। (डेवलपएड पर संगठनों के एफसीआरए स्टेटस का पता लगाया जा सकता है। यहां पर ‘अप्रूव्डऽ (स्वीकृत), ‘डिनाइडऽ (अस्वीकृत) और ‘ऑन होल्डऽ (रोका गया) से लेकर ‘क्लेरिफिकेशन रिक्वायर्डऽ (स्पष्टीकरण चाहिए), ‘इन प्रोसेसऽ (प्रक्रिया जारी) और ‘अदर्सऽ (अन्य) जैसी श्रेणियों में आवेदनों को बांटा गया है।) फरवरी में लगभग 12,000 संगठन ऐसे थे जिनके आवेदन पर मंत्रालय को एफसीआरए से जुड़ी प्रक्रिया शुरू करनी थी और उनके रजिस्ट्रेशन की तिथि 31 मार्च 2022 तक बढ़ा दी गई थी। इन संगठनों के बारे में साफ किया गया था कि जब तक उन्हें उनकी स्थिति के बारे में सूचित नहीं किया जाता तब तक वे यथावत बने रहेंगे।

दुर्भाग्यवश यह रिपोर्ट लिखे जाने तक स्पष्ट नहीं था कि किन संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस रद्द हो चुके हैं और उनके रद्द होने का कारण क्या है।

नतीजा क्या रहा?

एफसीआरए नियमों में बदलाव का तात्कालिक नतीजा यह है कि स्वयंसेवी संस्थाओं पर अनिवार्य नियमों के पालन (कंप्लायंस) का बोझ बहुत बढ़ गया है। सभी स्वयंसेवी संस्थाओं को एफसीआरए, आयकर और अन्य कई नियामक संस्थाओं के नियमों का पालन करना होता है। लेकिन अब बड़े स्तर पर काम करने और पर्याप्त संसाधन वाली स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए भी ऐसा कर पाना और इसका लेखा-जोखा रख पाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया है।

इसका दूसरा और अतिविकट प्रभाव पूरे सेक्टर को डांवाडोल करने वाला है। दरअसल जब किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द किया जाता है तब न केवल उसके विदेशी अनुदान लेने की योग्यता समाप्त हो जाती है बल्कि सरकार इन संगठनों की एफसीआरए फंड से अर्जित सारी सम्पत्ति भी ज़ब्त कर लेती है। इतना भारी-भरकम नतीजा संस्थाओं को कुछ भी ऐसा करने से रोकता है जिससे उनकी नकारात्मक छवि बन सकती हो। इसके साथ ही ऐसा होना देश के भीतर दानदाताओं पर भी विपरीत असर डालने वाला हो सकता है और वे ऐसे संगठनों से अपने जुड़ाव को लेकर असमंजस में पड़ सकते हैं।

तीसरे परिणाम पर आएं तो एफसीआरए में बदलाव के चलते उन संगठनों (जैसे थिंक-टैंक, शोध संस्थान और एडवोकेसी ऑर्गनाइजेशन्स) का संचालन बुरी तरह प्रभावित होता है जो विदेशी अनुदानों पर ही अधिक निर्भर होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घरेलू दानदाता सीधे सेवा पहुंचाने वाली संस्थाओं को सहायता देने को वरीयता देते हैं।

और अंत में, इन बदलावों का असर ज़मीनी-स्तर के संगठनों पर पड़ता है जो एफसीआरए-लाइसेंस प्राप्त मध्यस्थ संगठनों से मिलने वाले अनुदानों पर निर्भर होते हैं। ऐसे संगठनों का काम ठप्प पड़ जाता है क्योंकि उनके पास अंतर्राष्ट्रीय दानकर्ताओं से सीधे सम्पर्क करने का कोई साधन नहीं होता है।

ये सभी परिस्थितियां मिलकर हमारे लोकतंत्र की जड़ों को हिला देने वाली हैं। इससे एक मूक समाज तैयार होता है जो कोई जोखिम उठाकर अपनी भूमिका निभा पाने में अक्षम होता है। ऐसा समाज सरकार, व्यापारिक तबके और मीडिया को जवाबदेह नहीं ठहरा सकता है। ना तो यह हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए आवाज़ उठा सकता है और न ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि बनाई जाने वाली नीतियां समावेशी और लोकतांत्रिक हों।

सभा में तालियां बजाती महिलाएं-एफ़सीआरए
हमारे देश में ऐसा कोई नागरिक नहीं है जो किसी प्रकार के नागरिक समाज का लाभार्थी न रहा हो। । चित्र साभार: फ़ेमिनिजम इन इंडिया

ऐसा क्यों हो रहा है?

पहला आरोप यह लगाया जाता है कि स्वयंसेवी संस्थाओं का उपयोग आतंकवाद की फंडिंग या काले धन को सफ़ेद करने के लिए आसानी से किया जा सकता है। हमें इस धारणा को बदलना चाहिए। जहां तक मैं जानती हूं पिछले 45 सालों में मात्र एक ऐसा मामला सामने आया है जब सरकार ने किसी स्वयंसेवी संस्था को इस तरह की गतिविधियों में शामिल पाया है। इसका मतलब यह भी हुआ कि यह कानून न केवल असंवैधानिक बल्कि बेअसर भी है।

दूसरा कारण सरकार द्वारा फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का इस्तेमाल है। एफएटीएफ अंतर-सरकारी (कई देशों की सरकारों के साथ काम करने वाली) एजेंसी है जो आंतकवाद की फ़ंडिंग और मनी लॉन्डरिंग को रोकने का काम करती है। बीते सालों में सरकार ने बार-बार यह कहा है कि उनके द्वारा उठाए गए कदम एफएटीएफ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हैं। वहीं, एफएटीएफ ने सरकारों को यह सुनिश्चित करने का सुझाव दिया है कि उनका नियमन या नियंत्रण जोखिम के अनुपात में होने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन हमारे पास ख़तरे को मापने का कोई पैमाना नहीं होने की वजह से हम यह नहीं कह सकते हैं कि लगाए गए प्रतिबंध अनुपातिक हैं या नहीं।

हमें स्वतंत्र नियामकों (जैसे माइक्रोफिनांस, टेलीकॉम आदि के लिए हैं) को लाने की ज़रूरत है। ऐसे नियामक रजिस्ट्रेशन करने और रजिस्ट्रेशन रद्द करने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे नियामक स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने और नियमों के पालन को सुविधाजनक बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इनकी जगह आज हमारे देश में गृह मंत्रालय और कभी-कभी वित्त मंत्रालय स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए भाग्य विधाता की भूमिका निभाता है। इनमें से कोई भी वास्तव में स्वयंसेवी संस्थाओं को अनुपालन के लिए सक्षम बनाने में एक रुपये का भी निवेश नहीं करता है।

लोगों को इसकी चिंता क्यों करनी चाहिए?

अगर महामारी के दौरान आप भारत में थे तब आपने देखा होगा कि स्वयंसेवी संस्थाएं इस काम में लगी रहीं थीं कि लोगों तक तमाम तरह की सेवाएं पहुंचती रहें। ख़ासतौर पर तब जब सरकार ने हमें हमारे भरोसे छोड़ दिया था।

एफसीआरए विनियमों को विनियमों के उस समूह के हिस्से के रूप में देखा जाना ज़रूरी है जिसका पालन सभी स्वयंसेवी संस्थाओं को करना अनिवार्य है। इसमें नए सीएसआर नियम और आय कर अधिनियम के तहत किए जाने वाले आवश्यक बदलाव भी शामिल हैं। जब आप सभी को एक साथ मिलाकर देखेंगे तो पाएंगे कि इसने केवल 20,000 स्वयंसेवी संस्थाओं को नहीं बल्कि देश की सभी स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रभावित किया है। यहां तक कि वे समुदाय भी इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं जिनके लिए ये संस्थाएं काम करती हैं।

समाज और समाजसेवी संस्थाओं को अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करने की आवश्यकता है।

भारत अपने सतत विकास लक्ष्यों (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स – एसडीजी) को प्राप्त करने में पहले से ही पिछड़ रहा था; महामारी ने इसे और पीछे धकेल दिया है। बीते कुछ समय में हमने असमानता में वृद्धि, बेरोजगारी, कुपोषण और बाल विवाह के बढ़ते मामले देखे हैं। इन कमियों को दूर करने के लिए नागरिक संगठनों और समाजसेवी संस्थाओं को अपनी पूरी क्षमता से काम करने की जरूरत है।

आखिरकार हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल है। चाहे यह अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों के लिए हो, निचली जातियों के लिए हो, महिलाओं के लिए हो या विशेष भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए, हम जानते हैं कि हमारा लोकतंत्र अपने आदर्श स्तर से बहुत नीचे के स्तर पर काम कर रहा है। नागरिक संगठनों द्वारा इन आवाज़ों को सशक्त किए बिना सरकार को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम पाएंगे कि भारत के ज़्यादातर नागरिक लोकतंत्र और विकास के दायरे से बाहर छूटते जा रहे हैं।

लोग क्या कर सकते हैं?

मेरी पहली अपील नागरिक संगठनों से ही है। हमें इन मुद्दों पर दोगुना ध्यान देना होगा। बीते सालों में हुई घटनाओं के बावजूद आज भी कई ऐसे सीईओ और बोर्ड के सदस्य हैं जिन्हें या तो अपने ऑडिट की जानकारी नहीं है या फिर उन्होंने कंप्लायंस रिक्वायरमेंट को समझने या उसकी समीक्षा के लिए अपने ऑडिटर के साथ बैठकर बातचीत नहीं की है। जहां नियामकों को चुनौती देना आवश्यक है वहीं हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हम अपनी पूरी योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इसकी बारीकियों पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं।

दूसरा, व्यवसायिक तबके और समाजसेवा से जुड़े लोगों और संस्थाओं को आवाज़ उठानी होगी। वर्तमान में इन्होंने भारत के लोकतंत्र की लड़ाई उन लोगों के ज़िम्मे डाल दी है जिनके पास लड़ने की ताक़त सबसे कम है। यह स्थिति व्याकुल और भयभीत करने वाली है। हमें चेम्बर्स ऑफ़ कामर्स और बिज़नेस एसोसिएशन द्वारा दिए जाने वाले सख़्त संदेशों की ज़रूरत है। साथ ही ऐसे लोगों के साथ की भी ज़रूरत है जिनकी सीधी पहुंच पीएमओ, गृह मंत्रालय या वित्त मंत्रालय तक हो और जो यह कह सकें कि ‘इसका नतीजा ठीक नहीं होगा।ऽ

मीडिया पहले ही इस चुनौती के लिए अपना कदम बढ़ा चुका है। बेशक यह टुकड़ों में है क्योंकि मीडिया संस्थानों ने समझ लिया है कि वे भी उतनी ही कठोर नीतियों का सामना कर रहे हैं। बहरहाल यह देखना सुखद है कि मुख्यधारा के मीडिया मंचों ने भी मानव-हित से जुड़ी कहानियों के बजाय नीति और नियामक के संदर्भ में नागरिक समाज से जुड़े मुद्दों पर बात करनी शुरू कर दी है।

अब हमें नागरिक संगठनों के क्षेत्र में अधिक समर्थन की ज़रूरत है ताकि हम सामूहिक रूप से जनता के बीच व्यापक स्तर पर योजनाओं का निर्माण कर सकें।

अंत में मैं फिर नागरिक संगठनों पर लौटूंगी। हमें इस क्षेत्र में ही सबसे अधिक साथ आने की ज़रूरत है ताकि हम मिलकर जनता में व्यापक स्तर पर दृष्टिकोण और समझ विकसित कर सकें। आम लोगों को नागरिक समाज की महत्ता को समझने की ज़रूरत है। हमारे देश में एक भी ऐसा नागरिक नहीं है जो किसी ना किसी रूप में नागरिक संगठनों का लाभार्थी न रहा हो। चाहे वह स्कूल या कॉलेज हों या फिर अस्पताल, उपभोक्ता संगठन या व्यापार संघ या मनरेगा के माध्यम से आने वाले बदलाव, यहां तक कि सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार और काम का अधिकार भी इसमें शामिल हैं। हमें सभी को यह कहानी सुनाने की ज़रूरत है ताकि आम लोग लोकतंत्र में नागरिक संगठनों की भूमिका को समझ सकें।

यह आलेख इंग्रिड श्रीनाथ द्वारा आईडीआर के साथ किए गए एक इंस्टाग्राम लाइव पर आधारित है जिसे आप यहां देख सकते हैं।

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लेखक के बारे में
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इंग्रिड श्रीनाथ

इंग्रिड श्रीनाथ अशोका यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर सोशल इम्पैक्ट एंड फ़िलैन्थ्रॉपी (सीएसआईपी) की संस्थापक निदेशक हैं। सीएसआईपी भारत का पहला ऐसा अकादमिक केंद्र है जिसका उद्देश्य भारत में परोपकार और सामाजिक प्रभाव के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक प्रभावशाली, प्रासंगिक, लोचदार और पहचान युक्त बनाना है। भारतीय प्रबंधन संस्थान, कोलकाता से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने वाली इंग्रिड श्रीनाथ इससे पहले सिविकस के महासचिव और क्राई, चाइल्डलाइन इंडिया और हिवोस इंडिया जैसी संस्थाओं के सीईओ रह चुकी हैं। वह मानव अधिकार, सामाजिक न्याय और नागरिक समाज के क्षेत्र में काम करने के प्रति जुनूनी हैं।

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