“मैं अपने आसपास के लोगों का जीवन बेहतर बनाना चाहता हूँ”

मेरा जन्म दिल्ली के मौजपुर इलाके में हुआ था। मेरे पिता एक मजदूर थे और हम लोग किराए के घर में रहते थे। पाँच साल की उम्र में मैं अपने भाईयों और माता-पिता के साथ गाज़ियाबाद के लोनी में रहने आ गया था। हालांकि हम लोग दिल्ली के बहुत ही नजदीक रहते थे लेकिन कई तरह की राजनीतिक समस्याओं और दबाव के कारण वह इलाका विकसित नहीं हुआ था। लोनी में अपराध तेजी से फैल रहा है और हमारे पास अच्छे निजी या सरकारी स्कूल भी नहीं हैं। हालांकि मैंने किसी तरह अपने स्कूल की अपनी पढ़ाई पूरी की। उसके बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई का फैसला किया। मैं हमेशा से बहुत कुछ सीखना चाहता था और जीवन में बहुत आगे जाना चाहता था, और हमारे ही जैसे दूसरे अन्य परिवारों की मदद करना चाहता था जिनके पास मौलिक सुविधाएं भी नहीं हैं। मुझे इस बात का एहसास हुआ कि लोनी में इस तरह के बदलाव लाने के लिए मुझे राजनीति में जाना होगा क्योंकि यहाँ राजनीति से जुड़े नेताओं के पास ही असली ताकत है।

अपने कॉलेज के दिनों में मैंने एक स्थानीय राजनीतिक दल के साथ काम किया था। वहाँ मेरी मुलाक़ात उत्तर प्रदेश के एक प्रसिद्ध नेता से हुई जिन्होंने मेरी आर्थिक स्थिति और परिवार की पृष्ठभूमि के बारे में जानने के बाद मुझे राजनीति में न जाने की सलाह दी। उन्होंने मुझसे कहा कि राजनीति वैसे लोगों के लिए है जिनके पास समय और पैसा है और दुर्भाग्य से मेरे पास दोनों ही नहीं थे। इसके बदले उन्होंने सलाह दी कि मुझे यूपीएससी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करनी चाहिए।

अब मेरे दिन का ज़्यादातर समय परीक्षा की तैयारी और पढ़ाई में निकल जाता है। साथ ही अपने पिता और भाइयों के साथ मैं पास के बाजार में सफाईकर्मी के रूप में काम भी करता हूँ। मेरे दोनों भाई मुझसे छोटे हैं। जहां मेरा एक भाई अब भी पढ़ाई कर रहा है वहीं मेरे दूसरे भाई ने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी है। वह अब घर के कामों में मदद करता है और हल्के-फुल्के काम करके थोड़े से पैसे भी कमा लेता है।

सुबह 6:00 बजे: मेरा दिन ऑनलाइन कोचिंग क्लास से शुरू होता है जो यूपीएससी परीक्षाओं की तैयारी में मेरी मदद करता है। मैं अपने स्मार्टफोन से क्लास में लॉगिन करने के पहले जल्दी से मुंह-हाथ धोता हूँ। मेरे पिता मुझे एक कप चाय देते हैं। यह चाय वह अपने उस निजी स्कूल में जाने से पहले बनाते हैं जहां वह एक सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। यह उनका रोज का काम है। सुबह की यह चाय क्लास में मुझे चौकन्ना रहने में मेरी मदद करती है।

एक आदमी सड़क पर झाडू लगा रहा है-UPSC मैनुअल स्कैवेंजिंग
मैंने अपने सफाई का काम फिर से करना शुरू कर दिया जो मेरा परिवार पीढ़ियों से करता आ रहा है। चित्र साभार: विकीमीडिया कॉमन्स

शुरुआत में मुझे यूपीएससी परीक्षाओं के बारे में सिर्फ इतना ही पता था कि मुझे इसमें सफल होने की जरूरत है। इससे ज्यादा मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता था। ऑनलाइन खोजबीन करने और लोगों से बातचीत करने के बाद मुझे मुखर्जी नगर के कोचिंग केन्द्रों के बारे में पता चला और फिर उनमें से एक में मैंने दाखिला ले लिया। लेकिन यह कोचिंग कोविड-19 के कारण बंद हो गया। उन्होनें अभी तक मेरे पैसे भी नहीं लौटाए हैं। इसलिए मैंने एक ऐसे ऑनलाइन कोचिंग में नाम लिखवा लिया है जिसका शुल्क मैं भर सकता हूँ।

दोपहर 12:00 बजे: अपना क्लास खत्म करने के बाद मैं घर के कामों को खत्म करता हूँ। अगर जरूरत होती है तो मैं पास की दुकान से जाकर कुछ राशन ले आता हूँ। मेरा पूरा दिन मेरी क्लास और उसके समय पर निर्भर करता है। आज चूंकि मुझे आपसे बात करनी थी इसलिए मैंने अपने क्लास का काम पहले ही पूरा कर लिया था और घर का एक भी काम नहीं किया। आज मेरे बदले मेरा छोटा भाई घर के कामों में मदद कर रहा है।

दोपहर 3:00 बजे: इस समय मैं दोपहर का खाना खाता हूँ और थोड़ी देर आराम करने की कोशिश करता हूँ। हम सब शाम 4 बजे के करीब साथ बैठकर चाय पीते हैं, और उसके बाद मैं अपनी शाम की क्लास के लिए बैठ जाता हूँ।

शाम 6:00 बजे: मैं पास के बाजार से हमारे काम के बदले मिलने वाले पैसे लेने के लिए घर से निकलता हूँ। अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए मैंने बहुत कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। स्कूल के दौरान दो महीनों की गर्मियों की छुट्टियों में मैं सभी सरकारी समितियों और निजी कंपनियों में काम के लिए आवेदन दिया करता था। मेरी पहली नौकरी 2012 में रेलवे के साथ थी। मैं एक ठेकेदार के साथ काम करता था जो मुझे महीने के 4,000 रुपए देता था। मुझे लगता था कि स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद स्थिति शायद बेहतर होगी लेकिन मेरी डिग्री पूरी होने के बाद भी कुछ नहीं बदला।

घर के खर्चों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे मैंने भी सफाई का काम ही शुरू कर दिया जो मेरा परिवार कई पीढ़ियों से कर रहा है।

मैं जब भी काम ढूँढने के लिए जाता हूँ तब नियोक्ता मेरे काम के अनुभवों के बारे में पूछते हैं। जैसे ही मैं उन्हें अपने सफाई कर्मचारी होने की बात बताता हूँ तब वह मुझसे आगे भी यही काम करने की बात कहते हैं। इसके पीछे का कारण बताते हुए वे ये कहते हैं कि मेरे पास किसी दूसरे काम का कोई अनुभव नहीं है। मुझे याद है कि एक बार मैंने अपने ही दफ्तर में रूम अटेंडेंट की नौकरी के लिए आवेदन दिया था जहां मैं पहले से ही काम कर रहा था। हालांकि वेतन में लगभग हजार रुपए से ज्यादा का अंतर नहीं था। लेकिन मुझसे कहा गया कि चूंकि वहाँ के लोगों ने मुझे सफाई का काम करते देखा है इसलिए वे मुझसे अपने कमरे की चादर और तकिया के खोल बदलवाना पसंद नहीं करेंगे। घर के खर्चों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे मैंने भी उसी सफाई का काम फिर से शुरू कर दिया जो मेरा परिवार कई पीढ़ियों से कर रहा है। हालांकि आजकल यूपीएससी प्रवेश परीक्षा की तैयारियों के कारण मैं काम को बहुत अधिक समय नहीं दे पाता हूँ।

रात 10:00 बजे: दिन भर की पढ़ाई और क्लास खत्म करने के बाद मैं और मेरा परिवार रात के खाने के लिए साथ में बैठते हैं। यह खाना हमारी माँ हमारे लिए पकाती हैं। रात के खाने के बाद, मेरे पिता, मेरे भाई और मैं दुकानों की सफाई के लिए बाजार की तरफ निकल जाते हैं। कोविड-19 लॉकडाउन के कारण हमें काम पर रखने वाले दुकानदार अपनी दुकानें नहीं खोल पाते थे। जिन्होंने अपनी दुकानें खोलने की कोशिश की उन्हें पुलिस की मार पड़ी। एक बार मुझे भी पुलिस ने मारा था जब मैं पैसे लेने बाहर निकला था। उन्होंने कहा, “तुम्हें दिखाई नहीं देता है कि यहाँ लॉकडाउन लगा है?” हम सब दिहाड़ी मजदूरी पर जिंदा हैं और बिना पैसे का एक दिन भी हमें बहुत भारी पड़ सकता है।

नहाने से पहले भी सोचना पड़ता था क्योंकि साबुन बचाना था। यह सबकुछ उस दौरान हो रहा था जब लोग साबुन से बार-बार हाथ धोने की बात कर रहे थे।

लेकिन उन मुश्किल दिनों में कोई भी हमारी मदद के लिए नहीं आया। महामारी के पहले मेरे पिता एक निजी कंपनी में सफाई कर्मचारी थे। जब लॉकडाउन शुरू हुआ तब 400–500 कर्मचारियों के साथ उन्हें भी काम से निकाल दिया गया। उन्हें मार्च महीने की आधी तनख्वाह मिली और उसके बाद कुछ नहीं। हमने अपने बचाए हुए पैसों पर ही गुजारा किया। हमारे जीवन में अलग-अलग किस्म की समस्याएँ थीं। हम पहले आधा लीटर दूध खरीदते थे लेकिन अब 250 मिली ही लाते थे, हमें अपने खाने का खर्च में कटौती करनी पड़ी थी और हम लोगों को नहाने से पहले भी सोचना पड़ता था क्योंकि साबुन की बचत करनी थी। यह सबकुछ उस दौरान हो रहा था जब लोग साबुन से बार-बार हाथ धोने की बात कर रहे थे।

मैंने लॉकडाउन के दौरान ही एक स्वयंसेवी संस्था के साथ काम करना शुरू किया। मैंने एक ऐसे स्वयंसेवी संस्था के कामों में मदद की जो हमारे इलाके में खाना बांटने आया था। मैंने सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) के साथ काम करना शुरू कर दिया था। मुझे उनसे जुड़े एक या दो साल ही हुए थे लेकिन उनके काम के बारे में मैं बचपन से ही जानता था। मुझे याद है कि वह पहली बार हमारे इलाके में 2010 में आए थे और हमें यह बताया था कि हमें मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम बंद कर देना चाहिए। मेरी माँ और इलाके की अन्य औरतें हाथ से मैला ढ़ोने वालों के साथ काम करती थीं। 2013 में मेरी माँ ने यह काम छोड़ दिया।

संभवत: उच्च वर्ग के एक सरकारी अधिकारी ने हमें यह समझाया था कि आदमी के मैले को ढ़ोने के लिए किसी दूसरे आदमी को काम पर रखना एक दंडनीय अपराध बन गया था। हम खुश थे कि अब हमें मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम नहीं करना पड़ेगा। लेकिन अब सवाल यह था कि हम करेंगे क्या?

सरकार वादे करती रहती है लेकिन असलियत में कुछ नहीं होता है।

वह 2010 था और अब 2021 है—ये औरतें अब भी ‘पुनर्वास’ के इंतजार में बैठी हैं। सरकार वादे करती रहती है लेकिन असलियत में कुछ नहीं होता है। वे हम लोगों से स्व-घोषणा पत्रों पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं और कई चरणों तक कागजी कारवाई करते रहते हैं। मैं अब इन औपचारिकताओं में मदद के लिए एसकेए के साथ काम करता हूँ। संगठन लोगों को और अधिक काम दिलवाने की कोशिश कर रही है लेकिन नगर निगम से किसी भी तरह की सहायता नहीं मिलती है।

रात 12:00 बजे: मैं आधी रात तक दुकानों की सफाई का काम पूरा करता हूँ। घर पहुँचने के बाद मैं अपने कपड़े बदलता हूँ और उन्हें धोता हूँ। उसके बाद बैठकर थोड़ी देर पढ़ाई करता हूँ। मैं सुबह की क्लास के अपने नोट्स को देखता हूँ और किसी तरह का सवाल होने पर उसे लिख लेता हूँ। इस दौरान मेरा छोटा भाई भी मेरे फोन पर अपनी पढ़ाई का काम पूरा कर लेता है।

अपनी परीक्षा में सफल होने के बाद मैं वास्तव में अपने आसपास के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनकी मदद करना चाहता हूँ। मैं लोगों की न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाने के क्षेत्र में काम करना चाहता हूँ ताकि कम से कम उनकी मौलिक जरूरतें पूरी हो सके। उदाहरण के लिए मदर डेयरी के दूध की कीमत 44 रुपए प्रति लीटर है, और 250 ग्राम दाल भी 20 रुपए में आती है। अगर एक परिवार में दो बच्चे हैं और परिवार की कुल कमाई 300 रुपए है तो उनका गुजारा कैसे होगा?

दूसरी चीज कौशल का विकास है जिस पर मैं ध्यान देना चाहता हूँ। मैं प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना के तहत मोबाइल रिपेयरिंग का प्रशिक्षण हासिल करने गया था। लेकिन प्रशिक्षक को कौशल सिखाने की चिंता नहीं थी; वे सिर्फ सरकार से अपने हिस्से का पैसा लेना चाहते थे। मुझे इस पाठ्यक्रम की डिप्लोमा डिग्री भी नहीं मिली। सरकार योजना बनाती हैं लेकिन इसके कार्यान्वयन पर नजर नहीं रखती है।

कौशल विकास बहुत महत्वपूर्ण है। लोग कह सकते हैं कि मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम खत्म हो गया है। लेकिन जो इस काम में लगे हैं उन्हें अब भी मैनुअल स्कैवेंजिंग और सफाई का काम करना पड़ता है। क्यों? ऐसा इसलिए है क्योंकि वह कोई दूसरा काम नहीं खोज पाते हैं—उनके पास कोई दूसरा कौशल नहीं है। न ही उन्हें किसी तरह का प्रशिक्षण दिया गया है और न ही इन कौशलों के विकास और काम ढूँढने के लिए उन्हें किसी तरह की अनिवार्य सहायता मिली है। लोग इंतजार करके थक गए और अंतत: अपने पुराने काम पर वापस लौट गए। मुझे भी वापस सफाई के काम में लौटना पड़ा। सिर्फ इतना ही अंतर आया है कि पहले यह कच्चा (गड्ढे वाला शौचालय) था, अब हम झाड़ू लगाते हैं, गंदगी उठाते हैं और उसे फेंकते हैं। प्रक्रिया शायद कागजों पर बदल गई होगी लेकिन काम और उत्पीड़न अब भी वैसा ही है।

जैसा कि आईडीआर को बताया गया था।

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

अधिक जानें