हालिया वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत ने 180 देशों में 159वां स्थान पाया है। इस रैंकिंग के चलते, एक बार फिर यह बात चर्चाओं में है कि भारत में पत्रकारिता करना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। तो, कई बार इस पर भी बहस होती है, “भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को भला उसके पड़ोसी देशों से पीछे कैसे रखा जा सकता है?”
हर किसी की अपनी राय है। पत्रकारिता, खासकर हिंदी टीवी पत्रकारिता को लेकर भी सबके अपने-अपने विचार हैं। ‘गोदी मीडिया’, ‘राष्ट्रवादी मीडिया’, ‘स्वतंत्र मीडिया’ इत्यादि–हर मीडिया संस्थान के ऊपर कोई न कोई लेबल लग ही गया है। कोई इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानता है, तो कोई जनता को गुमराह करने वाला टूल।
लेकिन क्या ज़मीन पर सभी पत्रकारों के पास स्वतंत्रता हैं? क्या वे जो देख रहे हैं उसे जैसा का तैसा लोगों से साझा कर सकते हैं? जवाब का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। इसी बात की तस्दीक करने वाली कुछ समाचार सुर्खियां जो आप तक कभी पहुंच नहीं सकीं –
सोचः “सड़क निर्माण में करोड़ों का घोटाला, मंत्री के करीबियों पर आरोप”
सचः “सड़क की गुणवत्ता में कमी, मंत्री ने आधी रात बेटे के साथ किया निरीक्षण”
सोचः “भारत में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर युवाओं में आक्रोश, सरकार से कर रहे सवाल”
सचः “भारत में बढ़ रहा स्वरोजगार, युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की पहल”
सोचः “दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 13 भारत के, दिल्ली सबसे प्रदूषित राजधानी”
सचः “अफ्रीकी देश कांगो से बेहतर भारत, सबसे प्रदूषित देशों की लिस्ट में 5वें स्थान पर”
सोचः “महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 4% की बढ़ोतरी, हर दिन 1200 से ज्यादा मामले दर्ज”
सचः “महिला सुरक्षा को लेकर सरकार प्रतिबद्ध, योजनाओं में होगा और विस्तार”
सोचः “सरकारी अस्पतालों में 40% विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली, इलाज नहीं इंतज़ार मिलता है”
सचः “स्वास्थ्य क्षेत्र में रोज नए कीर्तिमान, युवाओं को मेडिकल क्षेत्र में बढ़ते अवसर”
सोचः “दबंगों ने बंदूक के दम पर हड़पी दलित व्यक्ति की जमीन, प्रशासन पर मिलीभगत का आरोप”
सचः “स्थानीय विवाद में हुई कई राउंड फायरिंग, प्रशासन हरकत में, देखें वायरल वीडियो”
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