October 8, 2025

गिग कामगारों को बुनियादी अधिकार देने वाले कानूनों की राह इतनी कठिन क्यों है

लंबे समय तक एडवोकेसी और संघर्ष के बाद बने कानूनों से कई राज्यों में गिग और प्लेटफार्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन तो मिला है लेकिन इतना भर होना काफी नहीं है।
10 मिनट लंबा लेख

भारत में गिग और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े कामगारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। साल 2021 में जहां यह संख्या 77 लाख थी, वहीं 2030 तक इसके 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन इस बढ़ोतरी के साथ कई बड़ी चिंताएं भी उभर रही हैं, जिनमें कामकाज की अन्यायपूर्ण शर्तों से लेकर शोषण तक के मामले शामिल हैं। इन तमाम छोटी-बड़ी दिक्कतों के पीछे एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती है, जिसका गिग और प्लेटफार्म कामगार नियमित रूप से सामना करते हैं। आमतौर पर कंपनियां उन्हें कर्मचारी की तरह नहीं, बल्कि एक ‘पार्टनर/यूजर’ की तरह अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ती हैं। इसके चलते वे भारत के श्रम कानून के तहत मिलने वाले तमाम अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। जैसे पेंशन, मातृत्व अवकाश, स्वास्थ्य बीमा या काम के दौरान चोट लगने और दुर्घटना के कारण मौत होने पर मिलने वाला मुआवजा।

बीते कुछ सालों में गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों के बुनियादी अधिकारों के लिए कई राज्यों, जैसे झारखंड, कर्नाटक, तेलंगाना और राजस्थान में नए श्रम कानून लागू किए गए हैं। इन कानूनों के मसौदे और चर्चा की प्रक्रिया में कई यूनियन और कामगार संगठन सक्रिय रहे हैं। मैं स्वयं भी ऐसे कई संगठनों, जैसे तेलंगाना गिग एंड प्लेटफार्म वर्कर्स यूनियन्स (टीजीपीडब्ल्यूयू) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (आईएफएटी) का हिस्सा हूं। गौरतलब है कि यह कानून देश में गिग अर्थव्यस्था के फलने-फूलने के तकरीबन एक दशक बाद अस्तित्व में आए हैं।

मेरे गृह राज्य में भी इस साल अप्रैल में तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स (रजिस्ट्रेशन, सोशल सेक्योरिटी एंड वेलफेयर) बिल, 2025 लागू किया गया है। इसमें कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और कल्याण निधि, एग्रीगेटर कंपनियों द्वारा अनिवार्य भुगतान, शिकायत निवारण तंत्र और गिग व प्लेटफॉर्म कामगारों के लिए वेलफेयर बोर्ड स्थापित करने जैसे प्रावधान शामिल हैं।

फेसबुक बैनर_आईडीआर हिन्दी

लेकिन भारत में इस तरह के कानूनों तक पहुंचने का रास्ता बहुत लंबा और कठिन रहा है। इस दौरान एग्रीगेटर कंपनियों तथा सरकार के साथ लगातार टकराव और कई विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं, जिनमें यूनियन लीडर्स को जेल तक जाना पड़ा है।

आंदोलन के लिए जमा हुए गिग वर्कर हाथ उठाकर नारे लगाते हुए—गिग और प्लेटफार्म कामगार
भारत में गिग कामगारों की बढ़ती संख्या के साथ अनुचित कामकाजी शर्तों से लेकर शोषण तक की चिंताएं भी बढ़ रही हैं। | चित्र साभार: टीजीपीडब्ल्यूयू

एग्रीगेटर कंपनियों के शुरूआती दिन

ओला और उबर जैसी एग्रीगेटर कंपनियां भारतीय बाजार में 2010 के दशक की शुरूआत में दाखिल हुई। ठीक उसी समय, जब करोड़ों लोग इंटरनेट और स्मार्टफोन अपनाने की तरफ बढ़ रहे थे और बाजार 2008 की मंदी से उबर रहा था। मैं एक लंबे समय से निजी ड्राइवर का काम कर रहा हूं और इन कंपनियों के आने से पहले से ही यूनियन के कामकाज के साथ जुड़ा रहा हूं।

साल 2013-14 में इन कंपनियों ने लोगों को प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचा। मैं भी उनमें से एक था। उस समय कंपनियों से मिलने वाले लाभ सच में कमाल थे और कर्मचारियों की किस्मत बदल देने का वादा करते था। हर चौथी राइड पर 1000 रुपए का बोनस मिलता था, एक नए ड्राइवर को कंपनी से जोड़ने पर 5000 रुपए का बोनस था और प्रति किलोमीटर किराया भी अच्छा था। हर बस-अड्डे, रेलवे स्टेशन और बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर दिखने वाले विज्ञापनों में 1-1.5 लाख की आमदनी का वादा किया जाता था। इन वादों में फेर में ग्रामीण क्षेत्रों से अनगिनत लोग अपनी खेती-बाड़ी या पारंपरिक काम और दुकानदारी छोड़कर शहर की ओर निकल पड़े। कंपनियों द्वारा बेचे गए सपनों को पूरा करने की दौड़ शुरू हो चुकी थी।

कई यूनियनों और नागरिक संगठनों की मदद से पहला कानून राजस्थान में बना।

दूसरी ओर इन कंपनियों ने मुफ्त राइड और भारी छूट के साथ ग्राहकों को भी खूब आकर्षित किया। जैसे-जैसे समय बीता, इन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स पर ड्राइवरों और ग्राहकों की संख्या बढ़ती चली गई। ठीक इसी समय सपनों की रफ्तार पर अचानक लगाम लगा दी गयी। कंपनियों की ओर से ड्राइवरों को मिलने वाला लाभ और ग्राहकों को मिलने वाले ऑफर, दोनों ही बंद कर दिए गए। कंपनियों की विज्ञापन नीति रंग ला चुकी थी। उन्हें बड़ी संख्या में ग्राहक और ड्राइवर मिल चुके थे। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन वे देशभर में टैक्सी सर्विस के पुराने मॉडल को बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे थे।

आने वाले सालों में, गिग-वर्क से जुड़ी कई एग्रीगेटर कंपनियां बाजार में उतरती गयी। हर कंपनी ने बेहतर आजीविका का वादा किया और उसे कामगारों के शोषण में बदलने में देर नहीं लगायी। इन सभी कंपनियों में कामगारों के लिए आमदनी की कोई गारंटी और निश्चित आय नहीं थी और श्रम कानूनों के अंतर्गत मिलने वाले कई लाभ और सुविधाएं भी नदारद थे। एक अपारदर्शी अल्गोरिदम से यह तय होता कि किसे कितने भुगतान की एवज में कितना काम मिलेगा। कई बार कर्मचारियों की आईडी अकारण ही डिलीट कर दी जाती थी, जिससे उनकी आजीविका का एकमात्र साधन छिन जाता था। ऐसा हर तरह के गिग और प्लेटफार्म कामगार के साथ हो रहा था, फिर चाहे वे डिलीवरी बॉय हों, ड्राइवर हों, ब्यूटीशियन या मैकेनिक हों।

सड़क पर बैनर—पोस्टर के साथ नारे लगाते कर्मचारी—गिग और प्लेटफार्म कामगार
तेलंगाना की छोटी-छोटी यूनियनें जो अलग-अलग तरह के कामगारों के अधिकारों के लिए लड़ रही थीं, वे सब साथ आ गईं। | चित्र साभार: टीजीपीडब्ल्यूयू

हमें एक होकर लड़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

यही वह समय था जब हमें एहसास हुआ कि राज्य में काम करने वाली तमाम यूनियनों और एडवोकेसी समूहों को साथ मिलकर काम करने और कामगारों के अधिकारों के लिए लड़ने की जरूरत है।

अकेली आवाजों को दबाया जा सकता है, लेकिन सामूहिक जनशक्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तेलंगाना की कई छोटी-बड़ी यूनियनें, जो अलग-अलग तरह के कामगारों के अधिकारों के लिए लड़ रही थी, साथ आ गयी। हमने राजस्थान और कर्नाटक के उन समूहों से बात की जो गिग कामगारों के अधिकारों से जुड़ा कानून लाने की मांग कर रहे थे। इन दोनों ही राज्यों में उस समय कांग्रेस की सरकार थी। राष्ट्रीय स्तर पर आईएफएटी एक प्रमुख संस्था के रूप में उभरी, जो गिग कामगारों के लिए समान अधिकार, सुरक्षित कामकाजी माहौल और उचित भुगतान के लिए आवाज उठा रही थी।

यूनियनों ने मिलकर एग्रीगेटर कंपनियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना और बेहतर कामकाजी माहौल की मांग करना शुरू कर दिया। इस दौरान हमें श्रम मंत्रालय, परिवहन मंत्रालय या आईटी मंत्रालय से कोई सहयोग नहीं मिला। हम जब भी श्रम मंत्रालय के सामने अपने मुद्दे रखते थे, तो हमें बताया जाता था कि हम एग्रीगेटर्स के बस ‘पार्टनर’ हैं, उनके कर्मचारी नहीं। इसलिए हमारे मुद्दे श्रम कानून के तहत नहीं आते हैं। फिर भी हमने अपना विरोध जारी रखा। ओला ने कई बार हमारे खिलाफ पुलिस में शिकायतें दर्ज करवाई और इन मामलों में मुझे दो-तीन बार जेल भी जाना पड़ा।

साल 2020 में कोविड-19 महामारी के साथ हालात और खराब हो गए। कई कंपनियों ने हमें कम कीमतों पर ड्राइव या डिलीवर करने को कहा। गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को कोविड-19 से संक्रमित होने का सबसे अधिक खतरा था। वे अक्सर मरीजों को भी यातायात सुविधाएं मुहैया करवा रहे थे। जब एग्रीगेटर कंपनियां पीएम केयर्स फंड (जिसमें महामारी के पहले साल में 900 करोड़ रुपए एकत्र हुए थे) के लिए भारी-भरकम रकम दान कर रही थी, तब उनके कामगार हजारों की संख्या में महामारी की चपेट में आकर मर रहे थे और उन्हें कोई राहत नहीं दी जा रही थी। हमारे पास इस बात का कोई अनुमानित आंकड़ा भी नहीं है कि महामारी के दौरान कितने लोग अपनी नौकरी के कारण जान गंवा बैठे। आखिरकार, हमने इसके खिलाफ विरोध करना शुरू कर दिया और तब जाकर हमें पीपीई किट और दाल-गेंहू समेत कुछ राशन उपलब्ध करवाया गया।

अकेली आवाजों को दबाया जा सकता है, लेकिन सामूहिक जनशक्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वहीं महामारी की दूसरी लहर के दौरान, ओला ने अपने ग्राहकों से यह कहकर दान मांगा कि कंपनी इसे अपने ड्राइवरों तक पहुंचाएगी। लेकिन ग्राहकों को यह मालूम नहीं था कि ओला यह पैसा ड्राइवरों को कर्ज की तरह दे रही थी, जिसे उन्हें अगले 30-60 दिनों में चुकाना होता था। इस दौरान ओला ने कार-लीजिंग की स्कीम भी शुरू की, जिसमें ड्राइवर कंपनी से 1100 रुपए रोजाना के किराए पर वाहन उधार ले सकते थे। समझौते के मुताबिक, तीन साल तक रोज़ाना किराया चुकाने के बाद वह कार ड्राइवर को मिल जाती। इस स्कीम के तहत कई लोग अपने तीन साल पूरे करने ही वाले थे कि ओला ने ‘सैनिटाइजेशन’ का बहाना बनाकर गाड़ियों को वापस बुलाया और ड्राइवर की जानकारी के बिना उन्हें बेच दिया। यह घटना पूरे देश के अधिकांश हिस्सों में हुई।

इस पूरे समय में, कामगारों को किसी तरह की राहत देने के बजाय एग्रीगेटर कंपनियों ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया। ऐसे में सरकार से कोई मदद न मिलने के चलते हमारे पास विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र रास्ता बचा था। जब तक महामारी खत्म हुई, हम कंपनियों से कुछ छोटे बदलाव करवा पाने में जरूर सफल हुए। पहले कामगारों को साप्ताहिक भुगतान मिलता था जिसे बाद में 24 घंटे की अवधि में किया जाने लगा। हमने मांग की कि राइड स्वीकार करने से पहले हमें ग्राहक की ड्रॉप लोकेशन पता होनी चाहिए। साथ ही, एसयूवी पर टैक्स में छूट की भी मांग की गई।

कार्यालय में चर्चा करते अधिकारी—गिग और प्लेटफार्म कामगार
सुनना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी जिसके लिए आपको असल साधनों की जरूरत होती है। | चित्र साभार: टीजीपीडब्ल्यूयू

व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के जरिए हमने विरोध प्रदर्शन के लिए लोगों को इकट्ठा किया। उदाहरण के लिए, जब मार्च 2024 में ज़ोमैटो ने शाकाहारी और मांसाहारी खाने की डिलीवरी के लिए अलग-अलग डिलीवरी समूहों और उनकी अलग यूनिफॉर्म तय किए जाने की घोषणा की, तो इस कदम की बहुत आलोचना हुई। इससे जाति और धर्म के कारण हाशिए पर स्थित और पहले से ही असुरक्षित कामगारों के लिए जोखिम बढ़ने का खतरा था। देशभर में मांसाहार से जुड़े मामलों में बढ़ती हिंसा और भेदभाव की घटनाओं के मद्देनजर यह एक खतरनाक फैसला था। इसलिए इस मुद्दे पर यूनियनें सोशल मीडिया के जरिए तेजी से सक्रिय हुई और आम जनता, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कामगारों को जुटाकर ज़ोमैटो पर दबाव बनाया। आखिरकार कंपनी को अपनी नीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा।

कानून बनाने की लंबी डगर

हमारे एडवोकेसी के काम की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकारें ताकतवर एग्रीगेटर कंपनियों के दबाव में आकर अक्सर हमारी मांगों को पूरा करने में हिचकिचाती हैं। राजस्थान से लेकर कर्नाटक और हाल ही में तेलंगाना तक, हर जगह कानून बनाने की प्रक्रिया एक लंबी खींचतान रही है।

कई यूनियनों और नागरिक संगठनों की मदद से पहला कानून राजस्थान में बना। उस मसौदे तक पहुंचने की यात्रा बहुत लंबी और कठिन थी। कांग्रेस सरकार का समर्थन मिलने के बाद हमारा पहला काम यह तय करना था कि हमें किन मुद्दों के समाधान चाहिए। डिलीवरी कामगारों की अपनी समस्याएं थीं और ड्राइवरों की अपनी। अर्बन कंपनी जैसी कंपनियों के साथ काम कर रही महिलाओं की दिक्कतें अलग तरह की थी, जिनमें ग्राहकों द्वारा लैंगिक उत्पीड़न से सुरक्षा और शौचालय की सुविधा का अधिकार जैसी मांगें शामिल थी। हमने कामगारों की केस प्रोफाइल तैयार की, उनकी कहानियों को पढ़ा और उनके द्वारा रखे गए साझा मुद्दों को दर्ज किया। इस तरह सभी मुद्दों को एक जगह इकट्ठा किया गया, साझा बिंदुओं को सामने लाया गया और विशेष मुद्दों की पड़ताल अलग से की गई। इस प्रक्रिया में हमें नैसकॉम और सीआईआई जैसी औद्योगिक संस्थाओं से भारी विरोध का सामना करना पड़ा।

लेकिन आखिरकार, राजस्थान में यह कानून पास हुआ। इस कानून ने कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा, शिकायत निवारण की व्यवस्था और बीमा जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की। हमने राष्ट्रीय नीति के स्तर पर भी एक बड़ी जीत हासिल की। हालांकि सामाजिक सुरक्षा संहिता (जो गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को कानूनन परिभाषित करती है) 2020 में पास हो गई थी, लेकिन पांच साल बाद भी केंद्र सरकार इन कामगारों को ई-श्रम पोर्टल से जोड़ नहीं पाई है। हमने इसमें गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को शामिल करने के लिए जोर दिया और इसे ई-श्रम 2.0 का नाम दिया।

कर्नाटक और तेलंगाना में बने कानून भी कामगारों के वेतन और सामाजिक सुरक्षा पर जोर देते हैं। हर राज्य में बने कानूनों को उस राज्य के मुद्दों और संसाधनों को ध्यान में रखते हुए तैयार करना होता है। हमारा उद्देश्य पूर्ण सामाजिक सुरक्षा हासिल करना है। इसके बाद हमारा अगला कदम कर्मचारी और पार्टनर/यूजर के रिश्ते को बदलने की दिशा में होगा, जो एग्रीगेटर को कामगारों को कोई सुविधा न देने की अनुमति देता है।

लेकिन इस देश में कामगारों के अधिकारों में बड़े बदलाव लाने के लिए संघीय सरकारों और श्रम विभाग को यह समझना होगा कि सामूहिक वार्ता कैसे काम करती है। विचार-विमर्श एक बात है, लेकिन उसे अमली जामा पहनने के लिए असल साधनों की जरूरत होती है। एग्रीगेटर कंपनियां इतनी ताकतवर हैं कि उनके सामने सरकार छोटी नजर आती है। वे अक्सर यह धमकी देते हैं कि वे अपना व्यापार कहीं ओर ले जायेंगे। ऐसे में सवाल उठता कि सरकार कंपनियों के लिए फिक्रमंद है या अपने नागरिकों की आजीविका के लिए।

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लेखक के बारे में
शेख सलाउद्दीन-Image
शेख सलाउद्दीन

शेख सालाउद्दीन इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (आईएफएटी) के सह-संस्थापक और राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे तेलंगाना गिग एंड प्लेटफार्म वर्कर्स यूनियन (टीजीपीडब्ल्यूयू) के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं, जो ऐप-बेस्ड ड्राइवरों, डिलीवरी और घरेलू सेवाओं से जुड़े कामगारों का प्रतिनिधित्व करती है। ड्राइवरों के संगठन के रूप में एक दशक से अधिक के अनुभव के साथ, वे उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कामगारों के अधिकारों की एडवोकेसी कर रहे हैं। सालाउद्दीन भारत में गिग और प्लेटफार्म कामगारों की सामूहिक शक्ति को मजबूत करने और उनकी आवाज को बुलंद करने का काम करते हैं।

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